पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.
पुस्तक समीक्षा: श्रीनाथ राघवन की 'इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया' स्वयं को एक 'समग्र' राजनीतिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती है. लेखक का दावा है कि किताब इंदिरा गांधी के शासन को 'परिवर्तन के युग' के रूप में समझती है. हालांकि, इंदिरा गांधी पर लिखी ढेरों किताबों की तुलना में यह कोई नया परिप्रेक्ष्य देने से चूक जाती है.
पुस्तक समीक्षा: ऑर्नित शानी और रोहित डे की किताब स्थापित करती है कि संविधान कोई क़ानूनी दस्तावेज़ भर नहीं, बल्कि जनता की कल्पना और संघर्ष का जीवित इतिहास है. यह इतिहास याद दिलाता है कि संविधान सभा के बाहर भी एक और असेंबली है, जो कभी विरोध के नारे के रूप में, कभी किसी विश्वविद्यालय की दीवार पर लिखी इबारत में, तो कभी संविधान की प्रस्तावना दोहराती भीड़ में, जारी है.
पुस्तक समीक्षा: अभिषेक चौधरी की 'बिलीवर्स डिलेमा: वाजपेयी एंड द हिंदू राइट्स पाथ टू पावर' बताती है कि अटल बिहारी वाजपेयी उदार राजनीति व लोकतांत्रिक आदर्शों में अडिग दिखना चाहते थे, पर उनकी पार्टी और उत्तराधिकारियों ने उन्हें बार-बार उस जगह धकेला जहां उनके शब्द खोखले पड़ते गए. इस द्वंद्व ने न केवल भाजपा की दिशा बदली बल्कि भारतीय राजनीति को भी हिंदुत्व की ओर झुका दिया.
स्मृति शेष: सीएसडीएस के संस्थापकों में से एक समाजविज्ञानी धीरूभाई शेठ ने कभी अपनी चिंतन प्रक्रिया में अप्रिय तथ्यों को कलम से बचकर निकलने नहीं दिया. उन्होंने आज़ाद भारत में घट रहीं घटनाओं का कथा वाचक बनने के बजाय उनकी चालक शक्तियों तथा सामाजिक-आर्थिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया.