पुस्तक अंश: ईरान और अमेरिका के कटु रिश्तों का इतिहास पुराना है. ईरान के तेल पर अपना और पश्चिम का अधिकार जमाए रखने के लिए अमेरिका ने जो हिंसक, आपराधिक और घृणास्पद काम किए हैं उनकी सूची लम्बी है. सी.आई.ए. की दस्तावेज़ से ही अब पक्के प्रमाण उपलब्ध हैं कि ईरान के राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री की सत्ता पलटने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने जनरल फ़ज़लुल्लाह जाहिदी और सेना को पांच मिलियन डॉलर दिए थे. उस समय ईरान में कम्युनिस्ट पार्टी
पुस्तक समीक्षा: रोहिंग्या जनसंहार की भयावह पृष्ठभूमि में मय्यू अली की किताब ‘इरैडिकेशन’ केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि मिटा दिए जाने के ख़िलाफ़ कविता का प्रतिरोध है. यह पुस्तक बताती है कि नफ़रत कैसे जन्म लेती है और स्मृति, भाषा व साहस किस तरह अस्तित्व को बचाने का आख़िरी सहारा बनते हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: 'कविता क्या है?’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’
स्मृति शेष: 'चौरंगी' का रखवाला अपनी कथा से बाहर चला गया है. लेकिन उसके खोले हुए दरवाज़े अब भी खुले हैं. मणि 'शंकर' मुखर्जी केवल अपनी पुस्तकों को नहीं, एक दृष्टि को छोड़ गए हैं. उन्होंने सिखाया कि साधारण जीवन के भीतर भी महाकाव्य छिपे होते हैं. होटल की लॉबी और दफ्तर की मेज़ के भीतर भी मनुष्य की पूरी कथा दर्ज हो सकती है.
बनारस के घाटों पर समय बिताकर कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से. बंगनामा की चालीसवीं क़िस्त.
विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.
स्मृति शेष: शंकर का साहित्य इस अर्थ में अद्वितीय है कि वह अमूर्त समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को जीवंत मानवीय अनुभवों और ठोस सामाजिक परिस्थितियों में रूपांतरित कर देता है. उनके निधन के साथ एक ऐसे लेखक का अवसान हुआ, जिसने भारतीय शहरी आधुनिकता की जटिलताओं- वर्ग, आकांक्षा, नैतिक द्वंद्व और मानवीय अकेलेपन को सशक्त भाषा और संवेदना प्रदान की.
2026 के ब्रिटिश एकेडमी फिल्म अवॉर्ड्स (बाफ्टा) में भारत की एकमात्र नामित मणिपुरी भाषा की फीचर फिल्म ‘बूंग’ ने ‘बेस्ट चिल्ड्रेन एंड फैमिली फिल्म’ श्रेणी में पुरस्कार जीत लिया. फिल्म की निर्देशक लक्ष्मीप्रिया देवी ने कहा कि बूंग एक ऐसी जगह की कहानी है जो बेहद अशांत है, जिसे भारत में लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया गया और जिसका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हुआ. हम प्रार्थना करते हैं कि मणिपुर में शांति लौटे.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.
पुस्तक समीक्षा: विनीत कुमार की 'बैचलर्स किचन' निजी और सार्वजनिक स्पेस के बीच किए जाने वाले पितृसत्तात्मक विभाजन को प्रभावी रूप से चुनौती देती है. एक बैचलर व्यक्ति की रसोई को केंद्र में रखकर यह कृति उस प्रचलित धारणा को विघटित करती है, जिसके अनुसार रसोई किसी जेंडर विशेष का स्वाभाविक क्षेत्र माना जाता है.
पुस्तक समीक्षा: दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’ पत्रकारीय अनुभवों का रोज़नामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. यह भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का अहसास देती है.
पुस्तक समीक्षा: जयप्रकाश नारायण का असाधारण जीवन बार-बार पढ़े जाने, सुनाए जाने और दोहराए जाने योग्य है. किताब 'क्रांति का सपना' जेपी की नहीं, हमारे समय की भी जीवनी है. आज जब असहमति को अवरोध और आलोचना को राष्ट्रविरोध के रूप में देखा जाने लगा है, तब जेपी की राजनीति और भी प्रासंगिक हो उठती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.
पांच सालों से जेल में क़ैद, 'देशद्रोह' होने के तमगे में दबा अब्दुल मन्नान कभी 'प्रतिरोध की भाषा' पर पीएचडी थीसिस लिखा रहा था. आज अदालती कार्रवाइयों में फंसे इस 'स्कॉलर' को लगने लगा था कि असली प्रतिरोध 'बोलने' में नहीं, बल्कि इस ज़हर को ख़ामोशी से पी जाने में है जो आपको हर रोज़ पिलाया जाता है. पढ़िए अशअर नज्मी की कहानी 'अन्याय का शिलालेख'.
1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.