प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने गाज़ा पर बर्लिनाले जूरी की टिप्पणी को ‘चौंकाने वाला’ और 'निराशाजनक' बताते हुए 2026 के महोत्सव में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उनकी फिल्म ‘इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वन्स’ क्लासिक्स सेक्शन में चुनी गई थी.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.
स्मृति शेष: ज्ञानरंजन दो टूक थे. उन्हें जो काम करना है, उसके लिए फिर उसे पूरा करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते थे. एक स्थानीय पत्रिका को अपने सीमित संसाधनों से पांच दशक तक निकालते रह सकना, उसे देश के कोने-कोने के प्रबुद्ध और विचारवान पाठकों की अनिवार्य पत्रिका बना देना, ज्ञान जी की रचनात्मकता का बड़ा आयाम है.
नेटफ्लिक्स पर आने वाली नीरज पांडे की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर लखनऊ में एफआईआर दर्ज होने के बाद नेटफ्लिक्स द्वारा फिल्म के टीज़र समेत सभी प्रचार सामग्री हटा ली गई है. निर्देशक नीरज पांडे ने लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए माफ़ी भी मांगी है.
मुंबई पुलिस की अनुमति न मिलने का हवाला देते हुए मुंबई के काला घोड़ा आर्ट्स फ़ेस्टिवल ने आनंद तेलतुम्बड़े की पुस्तक पर होने वाली चर्चा रद्द कर दी है. आयोजकों के इस फैसले पर लेखकों और वक्ताओं ने नाराज़गी जताई है. तेलतुम्बड़े ने इसे बेतुका हस्तक्षेप कहा है.
'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में कवयित्री सविता सिंह अपनी ‘अलमारी’ खोलते हुए बताती हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.
चंडीगढ़ के आर्ट कॉलेज ऑडिटोरियम में एल्सव्हेयर फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'मैं तुम हूं, तुम मैं हो' नाम से हुए कहानी पाठ में चेमेगोइयां समूह से जुड़े सदस्य सिर्फ़ कहानियां नहीं सुना रहे थे. यह इतिहास को इंसानियत की भाषा में पढ़ना था. यह याद दिलाना था कि हम सब हिंसक हो सकते हैं. पर हम सब मानवीय भी हो सकते हैं. चुनाव हमेशा हमारे हाथ में रहता है.
बंगाल के कुछ हिस्सों में पूजी जाने वाली मनसा देवी की गाथा से देश के आदिवासी तथा देशज सांस्कृतिक परंपराओं दोनों का ही मुख्य सामाजिक धारा में लड़खड़ाते, बाधित, और अधूरे समावेश की कहानी समझ सकते है. शिव की पुत्री होकर भी वह सवर्ण जातियों की श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकतीं क्योंकि उनकी माता अनार्य हैं, क्योंकि वह परलोक की नहीं, इसी धरती और जंगल की हैं, आदिवासी हैं.
करीब सात दशकों से भोजपुरी लोक-संगीत को साधते आ रहे भरत सिंह भारती को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. पूरबी गायन की व्याकरण-रचना से लेकर लोक-संगीत की शुद्ध परंपरा को बचाए रखने तक, उनकी यात्रा लोकप्रियता से दूर एक सतत सांस्कृतिक साधना की कहानी है.
पुस्तक समीक्षा: जयशंकर जी की डायरी ‘पूर्व-राग’ एक लेखक के बनने की अंतर्कथा के रूप में ही नहीं एक लेखक की पढ़ने-लिखने के प्रति अपार आस्था और समर्पण के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. एक लेखक को वह दृष्टि प्राप्त करने के लिए पर्याप्त रियाज़ करना पड़ता है, ठीक किसी संगीतकार या अन्य किसी भी कला साधक की तरह. ये नोट्स उसी सतत अभ्यास के बीच लिखे गए आत्म-साक्षात्कार के क्षण हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर के नए पुरस्कारों की घोषणा की है. यह घोषणा दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कारों को अचानक रद्द किए जाने के जवाब में की गई है. ‘सेम्मोझी साहित्य पुरस्कार’ नाम से दिए जाने वाला यह सम्मान शुरुआती चरण में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, बांग्ला और मराठी भाषाओं में हुए साहित्यिक कार्यों के लिए दिया जाएगा.
'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में लवली गोस्वामी और कैलाश बनवासी बताते हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया. आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास, कहानी और कविता के ज़रिये वे समकालीन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य की रचनात्मक यात्रा पर रोशनी डालते हैं.
पुस्तक समीक्षा: स्वामीनाथन की जीवनी का अद्भुत आकर्षण यह भी है कि इससे गुज़रते हुए आप स्वयं को स्वामीनाथन के पास बैठा, उन्हें काम करता देखना शुरु कर देते हैं. जिन्हें स्वामीनाथन की समकालीनता मिली उसे तो सराहा ही जा सकता है. मगर जिनका समय स्वामीनाथन के समय के साथ नहीं था, वे इस जीवनी में स्वामीनाथन की सघन उपस्थिति को अपनी उपस्थिति में घोल सकते हैं.