हम अपनी मां की अस्थियों को गंगासागर में विसर्जित करने आए थे. असीम व्यथा के शोर में केवल खोने का आर्तनाद नहीं होता; और भी स्वर मिले होते हैं— एक संसार के टूटने की निष्ठुर प्रतिध्वनि, एक अंग के विच्छिन्न हो जाने की अनंत चीख, सैकड़ों अधूरी मुरादों और अफ़सोस. लहरें इन सबको समेट ले जाती हैं. बंगनामा की इकत्तीसवीं क़िस्त.
पुस्तक-अंश: वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग की नवीनतम कृति 'साहित्य का मनोसंधान' साहित्य और मनोजगत के संबंधों को केंद्र में रखते हुए साहित्य पर समसामयिक दृष्टि से विचार करती है. वे यह भी जोड़ती हैं कि राष्ट्र को अपने तरीके से परिभाषित करने की छूट, एक स्वतंत्र देश में, कम से कम लोकतंत्र में हर नागरिक को होती है. लेकिन आज हम नहीं जानते कि कब किस पुस्तक, चित्र, फ़िल्म, वक्तव्य यहां तक कि कार्टून को राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाएगा.
पुस्तक अंश: हमारा स्कूल सुबह दस या ग्यारह बजे से शुरू होता और शाम पांच बजे छुट्टी होती थी. मैं सुबह खाना खाकर निकलता. शाम को घर आने तक बाहर पानी या खाने को छूता भी नहीं था. महाड के बाज़ार में जलावन की लकड़ी बेचने आने वाले हमारी जाति के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि मैं ब्राह्मणों के लड़कों के साथ स्कूल जाता हूं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कविता और संगीत एकांत में आपके सबसे विश्वसनीय और अनाक्रामक शांत सहचर हो सकते हैं. वे आपके एकांत को अपने ढंग से सामुदायिक बना सकते हैं; आपको बाहर और अंदर की, जानी-अनजानी, विपुल और बहुल दुनिया से जोड़ सकते हैं.
अशोक वाजपेयी जिन्हें पत्रकारिता का अग्रदूत कह रहे हैं, वे केवल वाग्वीर हैं, कर्मवीर नहीं. उनकी बोली में पक्षपातपूर्ण उग्रता अधिक है. वे इस डरावने राजनीतिक दृश्य की कोई तार्किक व्याख्या नहीं करते. इन पत्रकारों और राजनीतिक दलों के अधैर्य में काफी समानता है. ये केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के पक्ष में हल्ला बोल रहे हैं और लोगों को तमाशबीन बना रहे हैं.
साहित्य अकादेमी सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव पर यौन उत्पीड़न के आरोपों और दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद कई लेखक संगठनों व महिला संगठनों ने उनकी बरख़ास्तगी की मांग की है. पटना में होने वाले ‘उन्मेष 2025’ साहित्य उत्सव के बहिष्कार की अपील भी हो रही है.
राजा जवाहिर सिंह से दोस्ती के बाद सारंगढ़ का महल एल्विन और उनकी गोंड पत्नी कोसी का दूसरा घर बन गया था. वेरियर एल्विन ने अपने प्रथम पुत्र का नाम रखा था जवाहर. अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि यह उनके मित्र के नाम पर था, 'इसी नाम के अधिक मशहूर व्यक्ति पर नहीं '.
हिंंदी पखवाड़े के अंतर्गत हमने हिंदी की कुछ लेखिकाओं से हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श को लेकर परिचर्चा की. उनके जवाब हिंंदी साहित्य में स्त्री की उपस्थिति की मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं, नये प्रश्न भी दे जाते हैं.
'जब भी कोई नया माध्यम आता है तो यही आशंका जताई जाती है कि पुराने माध्यम चलन से बाहर हो जाएंगे. लेकिन टीवी और कंप्यूटर जैसे जितने भी नए माध्यम आए, वे किताब के ही अलग-अलग रूप बने, न कि प्रतिद्वंद्वी. प्रिंट हमेशा अपनी जगह रहेगा. साहित्य की जगह हमेशा बनी रहेगी.'
पुस्तक समीक्षा: फ़रीद ख़ां के कविता संग्रह 'गीली मिट्टी पर पंजों के निशान' की कविताएं किसी भावावेश में लिखी गई हैं या किसी योजनाबद्ध तरीके से, मगर ये कविताएं हमारे समय का इतिहास रचती हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मुक्तिबोध की सभी कविताएं, एक तरह से, अपने विषय-वस्तु और उसकी असह्य जटिलता के कारण, उनके बीहड़ अदम्य शिल्प के कारण, अधूरी रहने को अभिशप्त थीं. उनका जीवन भी अधूरा ही रहा आया.
अवध में उर्दू शायरी के लखनऊ स्कूल की 18वीं शताब्दी के अंत से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक की बुलंदी किसी से छिपी नहीं है. मगर जब यह स्कूल आसमान चूम रहा था, तब भी उसमें सब हरा-हरा ही नहीं था. उस दौर में अवध दरबार में उर्दू शायरी की अनेक नामी शख़्सियत की परवरिश जरूर हुई, लेकिन ‘शेखचिल्ली’ भी कुछ कम नहीं थे.
पुस्तक समीक्षा: विवेक कुमार शुक्ल के उपन्यास में उस 'अमरपुर' की कथा है जो कभी बेग़मपुर हुआ करता था. इसमें उठाये गये सवाल और बहस उपन्यास को अमरपुर से बाहर लाकर राष्ट्रीय फलक तक इसका विस्तार करते हैं. यह समकालीन दौर की कई बहसों को एकसाथ समेटता है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: लोकतंत्र और पत्रकारिता के इस अंधेरे समय में जो कुछ ईमान, साहस, निडरता और प्रतिरोध बचा हुआ है, उसके प्रहरी और अग्रदूत कुछ पत्रकार हैं: वे थोड़े हैं और सच बोल-लिख-दिखा रहे हैं. आशय यह भी है कि सच और तथ्यों को जानने की सहज नागरिक इच्छा बिल्कुल ग़ायब नहीं हो गई है.
राजा नरेशचंद्र सिंह अकेले मुख्यमंत्री रहे जो पद की शपथ लेने के लिए काले पीले रंग की टैक्सी में बैठकर राजभवन पहुंचे थे. उन दिनों राज भवन के अंदर किसी टैक्सी का प्रवेश प्रतिबंधित था. राज्यपाल के सचिव ने आग्रह किया कि राजा साहब किसी अन्य वाहन में आ जाएं. लेकिन राजा साहब का तर्क था कि जब मेरे पास कोई वाहन नहीं था, यह टैक्सी सदैव मेरे साथ रही. आज मैं कैसे इसे छोड़ दूं.