‘वॉचमैन’ से तुलना किए जाने पर भड़के पहलाज, आइफा को भेजा क़ानूनी नोटिस

आइफा समारोह में एक एक्ट के दौरान अभिनेता रितेश देशमुख और मनीष पॉल ने सेंसर बोर्ड प्रमुख पहलाज निहलानी का मज़ाक उड़ाया था.

मलयाली लेखक को धमकी: 6 महीने में इस्लाम क़ुबूलो वरना सज़ा के लिए तैयार रहो

केरल साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित मलयाली लेखक केपी रमनउन्नी को मिली एक अनाम चिट्ठी में उनके लेखों से लोगों के आस्था के रास्ते से भटकने का आरोप लगाते हुए ऐसा न करने की चेतावनी दी गई है.

‘बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग बिल्कुल जायज़ है’

भोजपुरी और हिंदी के प्रमुख भाषा वैज्ञानिक एवं आलोचक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह बता रहे हैं कि क्यों बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए.

बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध क्यों हो रहा है?

कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर अमरनाथ बता रहे हैं कि हिंदी की बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल क्यों नहीं किया जाना चाहिए.

‘हिंदुस्तान की सरज़मीं बहुत देर तक नफ़रत बर्दाश्त नहीं कर सकती’

मशहूर शायर और यूपी विधान परिषद सदस्य वसीम बरेलवी ने कहा, हमारी विचारधारा एक है. इतनी भाषाओं, मज़हब, अलग-अलग संस्कृति के बावजूद हम एक थे, एक हैं और हमेशा एक रहेंगे.

38 भाषाओं को संवैधानिक दर्जा देने की मांग पर निश्चित मानदंड तैयार नहीं हुआ

लोकसभा में किरण रिजिजू ने बताया कि भाषा का विकास सामाजिक आर्थिक राजनैतिक विकासों द्वारा प्रभावित होता है, भाषा संबंधी कोई मानदंड निश्चित करना कठिन है.

गोशालाओं में गायों की रोज़ाना मौत और गोभक्ति का पाखंड

भाजपा शासित राज्यों में गोशालाओं में बदइंतज़ामी के चलते लगातार गायों की मौत हो रही है, लेकिन वे गाय के प्रति अपना ‘प्रेम’ उजागर करने में नित नये क़दम बढ़ाते रहते हैं.

‘ये महसूस कराने के लिए धन्यवाद कि मुझे गोरे लोगों के साथ नहीं लिया जा सकता’

अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने एक ट्वीट कर कहा, मुझे गोरे और सुंदर लोगों के साथ फिल्म में नहीं लिया जा सकता क्योंकि मैं सांवला हूं और सुंदर नहीं दिखता.

‘हमारा देश इतना महान है कि हैदर जैसी भारत-विरोधी फिल्म को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता है’

साक्षात्कार: सेंसर बोर्ड अध्यक्ष के रूप में पहलाज निहलानी का ढाई साल का कार्यकाल कई तरह के विवादों में रहा. उनसे बातचीत.

महागुन सोसाइटी मामले को कैसे देखा जाना चाहिए?

महागुन सोसाइटी में हुई मज़दूर वर्ग की हिंसा तो नज़र आती है मगर इस सोसाइटी में रहने वाले संपन्न तबके द्वारा इन मज़दूरों पर की जा रही हिंसा किसी को दिखाई नहीं पड़ती.

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