कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.
पुस्तक समीक्षा: विनीत कुमार की 'बैचलर्स किचन' निजी और सार्वजनिक स्पेस के बीच किए जाने वाले पितृसत्तात्मक विभाजन को प्रभावी रूप से चुनौती देती है. एक बैचलर व्यक्ति की रसोई को केंद्र में रखकर यह कृति उस प्रचलित धारणा को विघटित करती है, जिसके अनुसार रसोई किसी जेंडर विशेष का स्वाभाविक क्षेत्र माना जाता है.
पुस्तक समीक्षा: दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’ पत्रकारीय अनुभवों का रोज़नामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. यह भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का अहसास देती है.
पुस्तक समीक्षा: जयप्रकाश नारायण का असाधारण जीवन बार-बार पढ़े जाने, सुनाए जाने और दोहराए जाने योग्य है. किताब 'क्रांति का सपना' जेपी की नहीं, हमारे समय की भी जीवनी है. आज जब असहमति को अवरोध और आलोचना को राष्ट्रविरोध के रूप में देखा जाने लगा है, तब जेपी की राजनीति और भी प्रासंगिक हो उठती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.
पांच सालों से जेल में क़ैद, 'देशद्रोह' होने के तमगे में दबा अब्दुल मन्नान कभी 'प्रतिरोध की भाषा' पर पीएचडी थीसिस लिखा रहा था. आज अदालती कार्रवाइयों में फंसे इस 'स्कॉलर' को लगने लगा था कि असली प्रतिरोध 'बोलने' में नहीं, बल्कि इस ज़हर को ख़ामोशी से पी जाने में है जो आपको हर रोज़ पिलाया जाता है. पढ़िए अशअर नज्मी की कहानी 'अन्याय का शिलालेख'.
1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.
प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने गाज़ा पर बर्लिनाले जूरी की टिप्पणी को ‘चौंकाने वाला’ और 'निराशाजनक' बताते हुए 2026 के महोत्सव में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उनकी फिल्म ‘इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वन्स’ क्लासिक्स सेक्शन में चुनी गई थी.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.
स्मृति शेष: ज्ञानरंजन दो टूक थे. उन्हें जो काम करना है, उसके लिए फिर उसे पूरा करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते थे. एक स्थानीय पत्रिका को अपने सीमित संसाधनों से पांच दशक तक निकालते रह सकना, उसे देश के कोने-कोने के प्रबुद्ध और विचारवान पाठकों की अनिवार्य पत्रिका बना देना, ज्ञान जी की रचनात्मकता का बड़ा आयाम है.
नेटफ्लिक्स पर आने वाली नीरज पांडे की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर लखनऊ में एफआईआर दर्ज होने के बाद नेटफ्लिक्स द्वारा फिल्म के टीज़र समेत सभी प्रचार सामग्री हटा ली गई है. निर्देशक नीरज पांडे ने लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए माफ़ी भी मांगी है.
मुंबई पुलिस की अनुमति न मिलने का हवाला देते हुए मुंबई के काला घोड़ा आर्ट्स फ़ेस्टिवल ने आनंद तेलतुम्बड़े की पुस्तक पर होने वाली चर्चा रद्द कर दी है. आयोजकों के इस फैसले पर लेखकों और वक्ताओं ने नाराज़गी जताई है. तेलतुम्बड़े ने इसे बेतुका हस्तक्षेप कहा है.
'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में कवयित्री सविता सिंह अपनी ‘अलमारी’ खोलते हुए बताती हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.
चंडीगढ़ के आर्ट कॉलेज ऑडिटोरियम में एल्सव्हेयर फाउंडेशन द्वारा आयोजित 'मैं तुम हूं, तुम मैं हो' नाम से हुए कहानी पाठ में चेमेगोइयां समूह से जुड़े सदस्य सिर्फ़ कहानियां नहीं सुना रहे थे. यह इतिहास को इंसानियत की भाषा में पढ़ना था. यह याद दिलाना था कि हम सब हिंसक हो सकते हैं. पर हम सब मानवीय भी हो सकते हैं. चुनाव हमेशा हमारे हाथ में रहता है.