भरत सिंह भारती: भोजपुरी लोक-संगीत की लंबी साधना को मिला पद्मश्री सम्मान

करीब सात दशकों से भोजपुरी लोक-संगीत को साधते आ रहे भरत सिंह भारती को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. पूरबी गायन की व्याकरण-रचना से लेकर लोक-संगीत की शुद्ध परंपरा को बचाए रखने तक, उनकी यात्रा लोकप्रियता से दूर एक सतत सांस्कृतिक साधना की कहानी है.

पूर्व-राग: लेखक के निर्माण की यात्रा के बहाने जीवन की कुछ सीख

पुस्तक समीक्षा: जयशंकर जी की डायरी ‘पूर्व-राग’ एक लेखक के बनने की अंतर्कथा के रूप में ही नहीं एक लेखक की पढ़ने-लिखने के प्रति अपार आस्था और समर्पण के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. एक लेखक को वह दृष्टि प्राप्त करने के लिए पर्याप्त रियाज़ करना पड़ता है, ठीक किसी संगीतकार या अन्य किसी भी कला साधक की तरह. ये नोट्स उसी सतत अभ्यास के बीच लिखे गए आत्म-साक्षात्कार के क्षण हैं.

सच की जगह कहां बची हुई है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.

केंद्र द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार रद्द किए जाने के बाद स्टालिन ने 7 भाषाओं में साहित्यिक पुरस्कारों की घोषणा की

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर के नए पुरस्कारों की घोषणा की है. यह घोषणा दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कारों को अचानक रद्द किए जाने के जवाब में की गई है. ‘सेम्मोझी साहित्य पुरस्कार’ नाम से दिए जाने वाला यह सम्मान शुरुआती चरण में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, बांग्ला और मराठी भाषाओं में हुए साहित्यिक कार्यों के लिए दिया जाएगा.

लेखकों की अलमारी से: कैलाश बनवासी और लवली गोस्वामी की पसंद…

'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में लवली गोस्वामी और कैलाश बनवासी बताते हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया. आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास, कहानी और कविता के ज़रिये वे समकालीन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य की रचनात्मक यात्रा पर रोशनी डालते हैं.

स्वामीनाथन की जीवनी: ‘मैं मनुष्य के लिए चित्र नहीं बनाता, मैं मनुष्य की तरह चित्र बनाता हूं’

पुस्तक समीक्षा: स्वामीनाथन की जीवनी का अद्भुत आकर्षण यह भी है कि इससे गुज़रते हुए आप स्वयं को स्वामीनाथन के पास बैठा, उन्हें काम करता देखना शुरु कर देते हैं. जिन्हें स्वामीनाथन की समकालीनता मिली उसे तो सराहा ही जा सकता है. मगर जिनका समय स्वामीनाथन के समय के साथ नहीं था, वे इस जीवनी में स्वामीनाथन की सघन उपस्थिति को अपनी उपस्थिति में घोल सकते हैं.

श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि निहत्था लड़ रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.

बंगनामा: बांकुड़ा से परिचय

बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.

भोपाल साहित्य उत्सव: दक्षिणपंथी समूह के विरोध की आशंका के चलते बाबर संबंधी किताब पर परिचर्चा रद्द

भोपाल में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान बाबर पर लिखी एक नई पुस्तक पर होने वाली परिचर्चा को पुलिस द्वारा दक्षिणपंथी समूहों के संभावित विरोध प्रदर्शनों की चेतावनी के बाद रद्द कर दिया. किताब के लेखक का कहना है कि सबसे चिंताजनक बात यह रही कि प्रदेश के संस्कृति मंत्री ने किताब का एक भी पन्ना पढ़े बिना ही सार्वजनिक रूप से इस सत्र की निंदा की.

लेखकों की अलमारी से: कौन-सी किताबों ने ममता कालिया का मन मोहा…

'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया अपनी ‘अलमारी’ खोलते हुए बताती हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया. आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास, कहानी और कविता के ज़रिये वे समकालीन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य की रचनात्मक यात्रा पर रोशनी डालती हैं.

राही मासूम रिज़ा और ‘आधा गाँव’ की पूरी कहानी…

राही मासूम रिज़ा बीसवीं सदी में उर्दू के ज़हीनतरीन लिखने वालों में थे. अगले बरस उनकी जन्म-शती मनाई जाएगी. इक्कीसवीं सदी के शुरू में किए गए एक से अधिक सर्वेक्षणों में उनके 'आधा गाँव' को बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के दस बेहतरीन उपन्यासों शुमार किया गया. इस विस्तृत लेख में जानिए रिज़ा साहब की ज़िंदगी की झलक और इस किताब के सामने आने की कहानी.

विरोध, न्याय और दया को उभारने वाला नए ज़माने का सिनेमा

हम सभी जिस नफ़रत, अन्याय और डर के ज़हरीले धुंध में घिरे हुए हैं, उसे चीरते हुए 2025 में कुछ बेहतरीन फिल्में आईं, जिन्होंने मानवता का संदेश दिया. इन फ़िल्मों ने अन्याय, दुख तथा विरोध का प्रतिकार किया और जोखिम उठाते हुए सच बोलने की हिम्मत दिखाई. प्रस्तुत है हर्ष मंदर की 2025 की पसंदीदा भारतीय फिल्में.

प्रेमचंद को याद करते हुए…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.

कुलपति द्वारा कथाकार के अपमान को क्या केवल उन्हीं का अपमान मानना चाहिए?

अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्वायत्तता की, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करेंगे और सतहीपन का विरोध करेंगे. इस विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है. किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है. जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?

हिंदी का विश्व: साहित्य, अनुवाद और वैश्विक पहचान का जायज़ा

अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के प्रमुख साहित्यकारों से बातचीत के ज़रिये यह पड़ताल की गई कि वर्तमान में हिंदी की स्थिति क्या है, अनुवाद की भूमिका कितनी निर्णायक है और हिंदी किस हद तक वैश्विक भाषा के रूप में उभर पाई है. उनके विचार हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं.

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