कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मोहन भागवत ने राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा वाले दिन को भारत का असली स्वतंत्रता दिवस बताया था. तब समझ में नहीं आया, पर अब आ रहा है कि उनका आशय प्रबंधक-चौकीदार रामभक्तों को चोरी आदि करने की स्वतंत्रता से था. ज़ाहिर है यह स्वतंत्रता की अधिक समावेशी अवधारणा है: जिस स्वतंत्रता में चोरी करने की स्वतंत्रता शामिल न हो वह अधूरी स्वतंत्रता ही मानी जाएगी!
अभिनेता अजय देवगन की नई फिल्म 'चौहान' के ट्रेलर में पैलेट गन को सीमित नुकसान वाला बताया गया है, जिसे लेकर इसकी आलोचना हो रही है. कश्मीर में पैलेट गन पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने राज्य की हिंसा झेली है और अब बॉलीवुड उनके दर्द का मज़ाक उड़ा रहा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2010-16 के बीच जम्मू-कश्मीर में लगभग 10,000 लोग पैलेट गन से घायल हुए, कई अपाहिज और कई ने आंखों की रोशनी गंवा दी.
पुस्तक समीक्षा: पुरुषोत्तम अग्रवाल की 'मजबूती का नाम महात्मा गांधी' गांधी को देवता नहीं बनाती, न ही उन्हें गिराकर खड़ा होना चाहती है. वह पाठक को एक मुश्किल जगह पर छोड़ देती है, जहां गांधी पूरी तरह सही भी नहीं हैं, पूरी तरह ग़लत भी नहीं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर आप संविधान सभा की याद करें, तो स्पष्ट है कि उसमें सबसे अधिक सदस्य हिंदू थे. हिंदू समाज ने ही मुख्यतः लोकतंत्र को स्वीकार और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक-भाषायी बहुलता का एहतराम किया था. क्या अब उसका हिंदुत्व से प्रेरित-प्रभावित बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को तजकर भारतीय राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है?
मिदनापुर ज़िले का तामलुक पहली नज़र में बंगाल के किसी भी अन्य आम शहर जैसा लगता है, मगर इतिहास बताता है कि लगभग 2500 वर्ष पूर्व तामलुक की जगह पर बंगाल की खाड़ी पर स्थित था ताम्रलिप्त नामक पोत-नगर, जिसने उस युग में उत्तर तथा पूर्वी भारत के वाणिज्यिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बंगनामा की अड़तालीसवीं क़िस्त.
पुस्तक समीक्षा: 'मैं बरबाद होना चाहती हूं' मलिका अमर शेख की आत्मकथा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश ज़रूर देती दिखती है कि भारतीय समाज में बेटियों को इस लायक ज़रूर बनाया जाए कि वह अपने सिर पर बनी रहने वाली छत ज़रूर खरीद सकें, ताकि उन्हें खदेड़े जाने पर उलटकर पति के ही यहां अथवा अन्य किसी के यहां शरण न लेनी पड़े.
कभी-कभार में इस सप्ताह वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी अपने 'उत्तरकाल' की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, 'मुझे किसी तरह की मुक्ति की तलाश नहीं है, न भवचक्र से, न जन्मचक्र से. संसार बहुत तेज़ी से बदल गया और रहा है- वह निरंतर क्रूर-निष्करुण-असह्य होता जाता है पर उसमें, फिर भी, सचाई और विवेक, ईमानदारी और सुंदरता, अर्थ और संभावनाएं बची हुई हैं. मैं इस बचे हुए को अलक्ष्य नहीं करना चाहता.'
पुस्तक अंश: देखा जाए तो हर तरह का ज्ञान आखिरकार वैज्ञानिक ज्ञान रह जाता है. फलसफे की ज़रूरत महज़ विज्ञान की समझ बढ़ाने की रह जाती है. कई दार्शनिक इस सरलीकरण को खारिज करते हैं. उनका मानना है कि हर दार्शनिक सवाल को वैज्ञानिक तरीकों से देखा या समझा नहीं जा सकता है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कॉकरोच जनता पार्टी को तरह-तरह से व्याख्यायित, संदेहास्पद बताने की कोशिशें हो रही हैं. यह होना ऐसे पिछले आंदोलन आदि के हश्र के अनुभव की रोशनी में, अस्वाभाविक और अतर्किक नहीं है. लेकिन भारत के युवाओं की निष्क्रियता और राजनीतिक दृष्टि के अभाव से क्षुब्ध-असंतुष्ट हम जैसे कुछ बूढ़ों को इस पहल से कुछ उम्मीद बंध रही है.
जो सैको की किताब 'द वंस एंड फ्यूचर रायट' पहले फ्रेंच में प्रकाशित हुई. भारत में भी यह उम्मीद की जा रही थी कि इसका भारतीय संस्करण - अंग्रेज़ी में - जल्द ही पाठकों के हाथों में होगा. हालांकि, अब लगभग तय है कि इसका भारतीय संस्करण पाठकों तक नहीं पहुंचेगा.
द वायर उर्दू के संपादक फ़ैयाज़ अहमद वजीह मक़बूल शायर बशीर बद्र को याद करते हुए लिखते हैं कि 'सादा लफ़्ज़ों की मीनाकारी उनके यहां इस क़दर है कि उन्हें उर्दू शायरी का ‘गोल्डस्मिथ’ और ‘ज़रगर’ कहते हुए मेरे सामने उस कुम्हार की सूरत आ जाती है जो कच्ची मिट्टी के साथ रक्स करते हुए अपनी आंखों के सुनहरे जादू जगाता है. बशीर बद्र इसी जादू के शायर हैं.'
पुस्तक अंश : एक ग्रन्थ के रूप में इसकी क्रमागत उन्नति के इतिहास के बावजूद जो सम्भावित प्रश्न इक्कीसवीं सदी के ‘महाभारत’ के श्रोता अथवा पाठक पूछ सकते हैं वह यह है कि, ‘क्या यह विभाजनकारी सामाजिक प्रथाओं को न्यायोचित ठहराता है?’ और यदि ऐसा है तो क्या हमें इसे एक राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए?
दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने शीर्ष साहित्यिक सम्मानों का नाम बदलकर आरएसएस और भाजपा से जुड़े व्यक्तियों के नाम पर रखा है. वीडी सावरकर और अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर पुरस्कार के नामकरण के साथ ही अकादमी ने सर्वोच्च सम्मान ‘हिंदी अकादमी शलाका सम्मान’ के नाम में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम जोड़ा है.
पुस्तक समीक्षा: महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनें बटोरकर उससे बनी एक तस्वीर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. मगर आख़िर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.
कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हमारे यहां हुए विउपनिवेशीकरण के अध्ययन में उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद पश्चिम अपने विचारों को सारे संसार में मनवाने में सफल हुआ है. विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ में पूरी तरह औपनिवेशिक है.