हिंदी का विश्व: साहित्य, अनुवाद और वैश्विक पहचान का जायज़ा

अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के प्रमुख साहित्यकारों से बातचीत के ज़रिये यह पड़ताल की गई कि वर्तमान में हिंदी की स्थिति क्या है, अनुवाद की भूमिका कितनी निर्णायक है और हिंदी किस हद तक वैश्विक भाषा के रूप में उभर पाई है. उनके विचार हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं.

जब रंगमंच सत्ता से टकराता है: भारतीय लोकतंत्र की आलोचनात्मक कथा है ‘मंच प्रवेश’

पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.

नया वर्ष एक पंचांग की घटना भर है, उससे अधिक कुछ नहीं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन लग रहा है. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.

बंगनामा: शबार चाइते भालो… झोलार गुड़

अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं. बंगाल के इस स्वाद को जानिए बंगनामा की इस क़िस्त में.

लेखकों की अलमारी से: किन किताबों ने पढ़ने वालों का मन मोहा…

साल 2025 के विदा होते वक़्त में रचनाकारों और चिंतकों ने उन किताबों को याद किया जो उनके भीतर ठहर गईं. इस श्रृंखला में लोकप्रिय और अल्पचर्चित पुस्तकों के ज़रिये साहित्य, स्मृति, राजनीति और मानवीय संवेदना के उन सूत्रों को टटोला गया है, जो पाठक और लेखक दोनों को गहराई से समृद्ध करते हैं.

विभाजन से आज तक: ‘अन्य’ बनाए जाने की निरंतरता

पुस्तक अंश: बलवंत कौर अपनी पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ में लिखती हैं, '1992 में मस्जिद का ढांचा गिराते समय भी अतीत में हुए अन्याय और उत्पीड़न का कथानक रचकर न सिर्फ़ इस कृत्य को जायज़ ठहराया गया बल्कि धार्मिक विभाजन का विरोध कर पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला लेने वाले और नये बन रहे लोकतंत्र में आस्था दिखाने वाले मुसलमानों को भी उसी अतीत के उत्पीड़न के तर्क के आधार पर प्रताड़ित किया गया. यहां तक कि 'समय-समय पर उन्हें

संविधान, समाजवाद और नव-फ़ासीवाद: प्रभात पटनायक की किताब के बहाने भारत का विश्लेषण

प्रभात पटनायक की नई पुस्तक 'सोशलिज़्म एंड द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' के ज़रिए हर्ष मंदर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक समाजवाद, नव-उदारवाद के संकट और नव-फ़ासीवाद के उभार का गहन विश्लेषण करते हैं. यह लेख संविधान में निहित समतावादी मूल्यों को पुनः हासिल करने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है.

आदिवासी समाज को कट्टर बनाकर उसमें धर्म की लड़ाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है: जसिंता केरकेट्टा

कवि, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को उनके सृजन के अतिरिक्त देश के आदिवासियों की स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संवादों-परिसंवादों के लिए भी जाना जाता है. वे मानती हैं कि आदिवासियों की निगाह से देश अपनी परवाह करते हुए अपने आसपास और देश-दुनिया और प्रकृति की परवाह करने का नाम है और इसमें संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं है. उनसे बातचीत.

सरकारी अनुमोदन के भरोसे साहित्य अकादेमी की ‘स्वायत्तता’!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.

‘मतलब हिन्दू’ अपने कथ्य में नहीं व्यंजना में खुलता है

पुस्तक समीक्षा: लब्ध चित्रकार-गद्यकार अखिलेश लिखते हैं, 'अम्बर पाण्डेय का 'मतलब हिन्दू' उपन्यास अपने कथ्य-कहानी और उसके प्रवाह के साथ ही अपनी भाषा के कारण मुझे अद्वितीय लगा. कहानी एक युवक की है जो ब्राह्मण है और उसके जीवन में आए उन लम्हों की है, जब उसने निस्संकोच अपना ब्राह्मणत्व त्यागा. जो मुझे भाया वह उपन्यास की हिंदी भाषा है, जो अपने में लोक समेटे है.'

‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

ईश्वर का उन्मूलन: धर्म, सत्ता और दासता पर पेरियार की तीखी वैचारिक चुनौती

पुस्तक अंश: धर्म और धर्म-शास्त्र के निर्माण का एकमात्र उद्देश्य बौद्धिकता और आजादी को नष्ट करना और लोगों को मूर्ख और दास बनाना है. यह उस समय चलन में आया, जब मनुष्य आदिम अवस्था में रहा करता था; कमोबेश जानवरों की तरह. जिस प्रकार लोग भूत-प्रेत और आत्माओं से भयभीत रहते थे, ठीक वही डर धर्म और धार्मिक शास्त्र भी पैदा करते थे.

विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे: जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब, तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा…

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कवि-कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वे कई दिनों से एम्स रायपुर में भर्ती थे. उनकी सादगीपूर्ण भाषा और मानवीय संवेदनाओं से भरी रचनाओं ने हिंदी साहित्य को विशिष्ट पहचान दी.

किसी पुरस्कार या सम्मान का मान ऊंचा रखना हमेशा देने वाले के हाथ में होता है, पाने वाले के नहीं: कथाकार शिवमूर्ति

लब्धप्रतिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति को पिछले दिनों अवध का प्रतिष्ठित 'माटी रतन' सम्मान दिया गया. उन्हें आम तौर पर दलितों-वंचितों, स्त्रियों और गांवों के ऐसे कथाकार के रूप में जाना जाता है, जो अपनी रचनाओं में क़िस्सागोई की शैली में मानव जीवन की साधारणता के असाधारण आख्यान रचता है. पेश है उनसे लंबी बातचीत के मुख्य अंश.

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