लखनऊ की अदालत ने टीवी पत्रकार अंजना ओम कश्यप के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का आदेश दिया है. पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की याचिका में आरोप है कि 14 अगस्त को प्रसारित आज तक का कार्यक्रम विभाजनकारी, भड़काऊ और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ था, जो दो समुदायों में दुश्मनी पैदा करने का प्रयास करता है.
संकर्षण ठाकुर का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उन शब्दों का मौन हो जाना है जो समाज की गंध और सच्चाई को पकड़ते थे. पटना की मिट्टी से निकले इस पत्रकार ने कश्मीर से बिहार तक कथाओं को दर्ज किया. उनका लेखन पत्रकारिता के लिए अमिट धरोहर है.
भारत के दिग्गज पत्रकार और लेखक संकर्षण ठाकुर का लंबी बीमारी के बाद 63 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. द टेलीग्राफ के संपादक ठाकुर ने बिहार और कश्मीर समेत कई अहम विषयों पर गहरी रिपोर्टिंग की. नेताओं और पत्रकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए निडर, संवेदनशील और लोकतांत्रिक भारत का मज़बूत पैरोकार बताया है.
नगालैंड के उपमुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता वाई. पैटन बीते सप्ताह हॉर्नबिल टीवी के रिपोर्टर दीप सैकिया को एक जनसभा में सरेआम डांटा और धमकाया था. अब मणिपुर के सेनापति ज़िले में उन पर गोली चलाई गई. उनकी हालत स्थिर है, लेकिन गोली अभी भी उनके शरीर में फंसी हुई है.
नगालैंड के उपमुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यंथुंगो पैटन ने एक जनसभा में हॉर्नबिल टीवी के रिपोर्टर को अपने सामने बैठने से मना करते हुए कहा कि वे उनके सवाल 'बर्दाश्त नहीं करेंगे'. फिर सरेआम कुछ लोगों से उन्हें इलाके से खदेड़ने के लिए कहा. स्थानीय पत्रकारों और मीडिया संगठनों ने मंत्री के कृत्य की निंदा की है.
दक्षिणी गाज़ा के नासिर अस्पताल पर सोमवार को इज़रायली मिसाइलों के हमले में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई, जिनमें पांच पत्रकार भी शामिल हैं. इसी महीने हुए एक हमले में गाज़ा में ही कई मीडियाकर्मी मारे गए थे, जिनमें से पांच अल जज़ीरा के लिए काम करते थे. उस समय इज़रायल ने दावा किया था कि वे हमास से जुड़े थे.
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्राइवेसी कानून में पत्रकारों को छूट, डेटा सुरक्षा, आरटीआई संशोधन, स्रोत की सुरक्षा, सहमति, और न्यूज़रूम स्वतंत्रता समेत 35 सवाल मंत्रालय को भेजे हैं. यह सवाल क़ानून के जनहित पत्रकारिता पर संभावित असर और सुरक्षा उपायों पर केंद्रित हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त को द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, सलाहकार संपादक करण थापर और सभी कर्मचारियों को बीएनएस की धारा 152 के तहत गुवाहाटी पुलिस द्वारा दर्ज केस में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण दिया है. तीन महीनों में असम पुलिस द्वारा संस्थान के ख़िलाफ़ राजद्रोह क़ानून के तहत दर्ज किया गया दूसरा ऐसा मामला है.
असम सरकार द्वारा द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और इससे जुड़े पत्रकारों के ख़िलाफ़ राजद्रोह क़ानून के इस्तेमाल को लेकर पत्रकारों ने आक्रोश जताया है. कई अख़बारों ने अपने संपादकीय में इसे प्रेस की आज़ादी पर अंकुश लगाने के लिए सत्ता का खुलेआम दुरुपयोग बताया है.
असम पुलिस द्वारा द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और सलाहकार संपादक करण थापर को तलब करने के लिए इस्तेमाल की गई एफआईआर कई दिनों की मशक्कत के बाद अंततः बुधवार (20 अगस्त) को मिल सकी, जिसमें वायर से जुड़े कई पत्रकारों और स्तंभकारों को नामजद किया गया है.
भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में गिरावट और पत्रकारों के ख़िलाफ़ हिंसा और धमकी के मामलों के बारे में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने कहा है कि 'भारत में एक जीवंत प्रेस और मीडिया इको सिस्टम है, जिसे विदेशी संगठनों से मान्यता की आवश्यकता नहीं है.'
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया व इंडियन वुमेन प्रेस कॉर्प्स ने द वायर और उसके पत्रकारों के ख़िलाफ़ असम पुलिस द्वारा की एफआईआर पर निराशा व्यक्त की. साथ ही बीएनएस की कठोर धारा 152 को 'प्रेस को चुप कराने का हथियार' बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की. उक्त मामले इसी धारा के तहत दर्ज किए गए हैं.
गुवाहाटी अपराध शाखा ने राज्य पुलिस द्वारा दर्ज एक नए ‘राजद्रोह’ मामले में द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को समन भेजा है. हालांकि, इसमें एफआईआर की तारीख, कथित अपराध की कोई जानकारी नहीं है और न ही एफआईआर की प्रति दी गई है.
असम में मानवाधिकारों के उल्लंघन और बांग्ला भाषी मुसलमानों के 'अमानवीयकरण' पर असम ट्रिब्यून को अपना कॉलम भेजने के कुछ ही घंटों बाद वरिष्ठ पत्रकार पेट्रीशिया मुखीम को अखबार ने बताया कि प्रबंधन इस लेख को प्रकाशित नहीं करेगा. पेट्रीशिया ने कहा कि यह बताया जाना कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है, तानाशाही शासन की निशानी है.
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 'द वायर' के स्वामित्व वाले 'फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म' के सदस्यों और संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को बीएनएस की धारा 152 के तहत असम पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की है.