प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का कार्यकाल खत्म हुए एक साल से ज़्यादा हो चुका है और उसकी अध्यक्ष को पद छोड़े हुए भी क़रीब दो महीने बीत चुके हैं. बीजद सांसद सस्मित पात्रा ने सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने का आग्रह करते हुए कहा कि नए अध्यक्ष की नियुक्ति पूरी करने और नई परिषद के गठन के लिए तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए, क्योंकि यह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और मीडिया की जवाबदेही को मज़बूत करने के
देश के 'प्रिय नेता' के लिए हंसी इतनी बड़ी चुनौती बन गई है कि 'सक्षम प्राधिकारियों' को उन्हें दिखाने वाले कार्टून को ब्लॉक करने का आदेश देना पड़ रहा है.
द वायर का इंस्टाग्राम अकाउंट मोदी सरकार पर व्यंग्यात्मक कार्टून को लेकर भारत में सोमवार शाम क़रीब दो घंटे तक ब्लॉक रहा. मंत्रालय ने ज़िम्मेदारी इनकार किया, जबकि मेटा द्वारा ‘ग़लती’ की बात सामने आई. बिना पूर्व सूचना की गई इस कार्रवाई ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल सेंसरशिप पर सवाल खड़े किए हैं.
अमेरिका के प्रतिष्ठित अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट ने कर्मचारियों के लगभग एक-तिहाई हिस्से की छंटनी करते हुए स्पोर्ट्स सेक्शन और कई विदेशी ब्यूरो बंद कर दिए हैं. आलोचकों का कहना है कि यह क़दम न सिर्फ पत्रकारिता, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को भी कमज़ोर करेगा.
मीडिया पर निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने आरोप लगाया है कि अडानी समूह 2017 से खोजी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ दीर्घकालिक, महंगे और डराने वाले मुक़दमे दायर कर रहा है. संस्था ने इन मामलों को प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर ख़तरा बताया है.
बीबीसी से अपने लगभग तीन दशक के कार्यकाल (1964-94) के दौरान मार्क टली ने भारतीय उपमहाद्वीप की शायद ही ऐसी कोई बड़ी घटना हो जिसे उन्होंने कवर न किया हो. मार्क टली ने अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए जो साख बनाई वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है.
अडानी एंटरप्राइजेज की सहायक कंपनी एएमजी मीडिया नेटवर्क्स लिमिटेड ने आईएएनएस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में शेष 24 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदकर उस पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है. इससे पहले समूह ने दिसंबर 2023 में 50.50 प्रतिशत की बहुलांश हिस्सेदारी हासिल की थी, जिसे जनवरी 2024 में बढ़ाकर 76 प्रतिशत कर दिया गया था.
पत्रकार संगठनों ने श्रीनगर के पत्रकारों पर हाल ही में हुई पुलिस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है और अधिकारियों से इसे तुरंत रोकने का आग्रह किया है. वहीं, हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय में इस संबंध में सख़्त रुख़ अपनाते हुए कहा गया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सामान्य ख़बरों को लेकर पत्रकारों को तलब कर 'हद पार कर दी है.' अखबार ने यह भी जोड़ा कि वह केवल अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा देश के प्रमुख अख़बारों- इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स के कश्मीर ब्यूरो में काम करने वाले पत्रकारों को तलब किए जाने के बाद अब द हिंदू के पत्रकार पीरज़ादा आशिक को भी पुलिस ने थाने मिलने बुलाया है. वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों तथा प्रेस संगठनों ने पुलिस कार्रवाई की निंदा की है.
जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार बशारत मसूद और हिंदुस्तान टाइम्स के श्रीनगर स्थित संवाददाता आशिक हुसैन को उनकी ख़बरों के संबंध में 'तलब' किया. मसूद को एक उनकी कथित ग़लती के लिए एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को भी कहा गया, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया.
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारत और पाकिस्तान की सरकारों द्वारा एक-दूसरे के न्यूज़ वेबसाइट को अपने देश में लगातार ब्लॉक किए जाने पर गहरी चिंता जताते हुए अपील की है कि वे एक दूसरे की समाचार वेबसाइटों पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाएं और सीमा-पार पत्रकारिता की पहुंच बहाल करें.
असम सरकार की तरफ से नए साल के उपहार के तौर पर पत्रकारों को मोबाइल फोन दिए गए थे, जिसे द टेलीग्राफ के उमानंद जैसवाल और द इकोनॉमिक टाइम्स के बिकाश सिंह ने वापस लौटा दिया. अधिकारियों ने बताया है कि 2,200 से अधिक पंजीकृत पत्रकारों को मोबाइल फोन उपहार के रूप में दिए जाने हैं.
एक जनवरी को केरल में भाजपा का मुखपत्र माने जाने वाले मलयालम दैनिक ‘जन्मभूमि’ ने प्रतिद्वंद्वी अख़बार ‘चंद्रिका’ का संपादकीय पेज छाप दिया. ‘चंद्रिका’ भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) का आधिकारिक मुखपत्र है. जन्मभूमि के कन्नूर ब्यूरो प्रमुख ने कहा कि ऐसा प्रिंटिंग प्रक्रिया के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी के चलते हुआ.
'फ्री स्पीच कलेक्टिव' की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े 40 हमलों में से 33 में पत्रकारों को निशाना बनाया गया. उत्पीड़न के 19 मामलों में से 14 पत्रकारों से जुड़े थे. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सर्वाधिक उल्लंघन गुजरात में दर्ज हुए, इसके बाद उत्तर प्रदेश और केरल रहे.
द वायर के जम्मू-कश्मीर संवाददाता जहांगीर अली का मोबाइल फोन बिना किसी कानूनी आधार के ज़ब्त किया जाना पत्रकारों को डराने की कोशिश है. जम्मू-कश्मीर पुलिस की यह कार्रवाई मीडिया की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है.