कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.
पांच सालों से जेल में क़ैद, 'देशद्रोह' होने के तमगे में दबा अब्दुल मन्नान कभी 'प्रतिरोध की भाषा' पर पीएचडी थीसिस लिखा रहा था. आज अदालती कार्रवाइयों में फंसे इस 'स्कॉलर' को लगने लगा था कि असली प्रतिरोध 'बोलने' में नहीं, बल्कि इस ज़हर को ख़ामोशी से पी जाने में है जो आपको हर रोज़ पिलाया जाता है. पढ़िए अशअर नज्मी की कहानी 'अन्याय का शिलालेख'.
1952 में पांचमुड़ा गांव के रासबिहारी कुंभकार को बांकुड़ा के मिट्टी के घोड़े के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके साथ ही आरंभ हुई बांकुड़ा के घोड़े की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की यात्रा. देश में सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज इम्पोरियम ने इसे अपना प्रतीक चिह्न बनाया, और विदेशों में भी हस्तशिल्प के चाहने वालों के बीच पहुंचा दिया. ऐसे यह सुंदर, लंबी गर्दन वाला कलात्मक मिट्टी का घोड़ा भारतीय हस्तकला का प्रतिनिधि बन गया.
दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी में आयोजित ‘समता उत्सव’ के दौरान इतिहासकार प्रो. एस. इरफ़ान हबीब पर पानी और कूड़ेदान फेंके जाने की घटना सामने आई है. वामपंथी छात्र संगठन आइसा ने आरोप लगाया है कि हमला एबीवीपी से जुड़े कार्यकर्ताओं ने किया. एबीवीपी ने आरोपों को झूठा बताया है.
हिमंता बिस्वा शर्मा बांग्ला भाषी मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो अभियान चला रहे हैं उसे यह कहकर उचित ठहराते हैं कि यह स्थानीय असमिया मुसलमानों के नहीं मात्र घुसपैठियों के विरुद्ध है. अगर मान भी लें कि ये मुस्लिम ठेठ असमिया नहीं हैं, फिर भी उनके ख़िलाफ़ हिंसा के प्रचार और हिंसा की क्या क़ानून इजाज़त देता है?
देश के 'प्रिय नेता' के लिए हंसी इतनी बड़ी चुनौती बन गई है कि 'सक्षम प्राधिकारियों' को उन्हें दिखाने वाले कार्टून को ब्लॉक करने का आदेश देना पड़ रहा है.
हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.
देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.
स्मृति शेष: ज्ञानरंजन दो टूक थे. उन्हें जो काम करना है, उसके लिए फिर उसे पूरा करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते थे. एक स्थानीय पत्रिका को अपने सीमित संसाधनों से पांच दशक तक निकालते रह सकना, उसे देश के कोने-कोने के प्रबुद्ध और विचारवान पाठकों की अनिवार्य पत्रिका बना देना, ज्ञान जी की रचनात्मकता का बड़ा आयाम है.
आतंकवाद के आरोपी अपने मुवक्किलों द्वारा दोषी याचिकाएं देने के बाद भी उनका पक्ष लेने को लेकर वकीलों के पास अलग-अलग कारण हैं, लेकिन वे सब इस बात पर सहमत हैं कि एनआईए ही इन याचिकाओं को बढ़ावा दे रही है और यहां तक कि उसके लिए दबाव भी बना रही है.
जो लोग यह तर्क देते हैं कि 'भारत में अब जातिवाद नहीं होता' या 'हमने कभी पिछड़ों के साथ भेदभाव नहीं किया', उनके लिए अफ्रीकन इतिहासकार चिनुआ अचेबे का यह मत याद रखना ज़रूरी है कि इतिहास को सिर्फ शिकारी की निगाह से न देखें, बल्कि उसे शिकार होने वाले की निगाह से भी देखें, तब असली सच्चाई समझ में आती है.
सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन पर राज्यों से विचार का आग्रह किया, लेकिन निर्देश देने से इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की ट्रेड यूनियनों और न्यूनतम मजदूरी पर टिप्पणियों ने अर्थशास्त्रियों, श्रमिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों में तीखी असहमति और बहस को जन्म दिया है.
1784 में भीषण अकाल के वक़्त अवध सूबे के नवाब आसफुद्दौला की हुकूमत ने लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो क़दम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी. इसने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की.
गणतंत्र दिवस पर उत्तर प्रदेश के बागपत के बड़ौत नगर पालिका परिसर में भाजपा नेता और राज्यमंत्री केपी मलिक ने एक ‘संविधान पार्क’ का उद्घाटन किया था. हालांकि वहां लगी संविधान की प्रस्तावना की प्रतिकृति से समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द गायब हैं. प्रशासन इसे मूल प्रस्तावना बता रहा है, लेकिन विशेषज्ञ और स्थानीय लोग इसे संविधान की भावना के ख़िलाफ़ मानते हुए बदलाव की मांग कर रहे हैं.