सच की जगह कहां बची हुई है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.

मोदी के भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ सरकारी बदला: ज़मींदोज़ हुआ परवीन फ़ातिमा का घर

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.

एआर रहमान की टिप्पणी पर विवाद: क्या देश असहज सच्चाइयों को सुनने से डर रहा है?

जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को आईना दिखाने पर दंडित किया जाता है, तब समस्या वो दर्पण नहीं है क्योंकि उस पर तो दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ देने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारने की, स्वीकार को ग़द्दारी मानने की. हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं,

दिल्ली में बैठक से पहले लद्दाख का संदेश: ‘केंद्र शासित प्रदेश मॉडल विफल, हमें सम्मानजनक लोकतंत्र चाहिए’

साक्षात्कार: केंद्र सरकार 4 फरवरी को लद्दाख के प्रमुख संगठनों से बातचीत करने जा रही है. सितंबर 2025 की हिंसा के बाद बदले हालात में लेह एपेक्स बॉडी और केडीए साझा मसौदे के साथ बैठक में शामिल होंगे. द वायर हिंदी से बातचीत में केडीए संयोजक सज्जाद करगिली कहते हैं कि केंद्र शासित प्रदेश का मॉडल विफल हो चुका है और लद्दाख को पूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार चाहिए.

जम्मू-कश्मीर: पुलिस ने राष्ट्रीय अख़बारों के पत्रकारों को ‘समन’ किया, एक से बॉन्ड पर साइन करने को कहा गया

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार बशारत मसूद और हिंदुस्तान टाइम्स के श्रीनगर स्थित संवाददाता आशिक हुसैन को उनकी ख़बरों के संबंध में 'तलब' किया. मसूद को एक उनकी कथित ग़लती के लिए एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को भी कहा गया, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया.

बरेली: ख़ाली घर को मदरसे में बदलने का आरोप, मकान मालकिन बोलीं- दी थी नमाज़ की इजाज़त

उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में एक ख़ाली पड़े घर में नमाज़ अदा करने के कारण 12 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया. शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि इस घर को मदरसे में तब्दील किया जा रहा था. हालांकि उस घर की मालकिन ने कहा है कि उन्होंने स्थानीय लोगों को अपने घर में नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी थी.

लोकपाल की सालाना रिपोर्ट तीन साल से संसद में क्यों पेश नहीं की गई हैं?

पिछले तीन वर्षों से लोकपाल की वार्षिक रिपोर्ट संसद के पटल पर नहीं रखी गई हैं. वर्तमान लोकपाल के लगातार निवेदन के बावजूद राष्ट्रपति ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया. अंततः वार्षिक रिपोर्ट को डाक से भेजा गया, और शीतकालीन सत्र के पहले ही राष्ट्रपति कार्यालय ने इसे स्वीकार भी किया. लेकिन फिर भी यह संसद में पेश नहीं की गई. क्या पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बनी यह संस्था ही अब जवाबदेही तलाश रही है?

श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि निहत्था लड़ रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.

बंगनामा: बांकुड़ा से परिचय

बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.

शिक्षा का मक़सद सवाल करने की आज़ादी सीखना है, गुरु शिष्य परंपरा इसके उलट है

भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है.

जब आज्ञा मानने को नैतिक गुण मान लिया जाता है, तब सत्ता जवाबदेही से मुक्त हो जाती है

लोकतंत्र केवल तब नहीं ढहते जब चुनावों में धांधली होती है; वे तब भी क्षीण होते हैं जब आज्ञाकारिता भागीदारी का स्थान ले लेती है, जब मतभेद को अवैध ठहराया जाता है, और जब सत्ता से प्रश्न पूछना ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, ज़िम्मेदारी के रूप में नहीं.

संघ के सपने की पड़ताल: ‘अखंड भारत का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं’

योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों व आयोजनों के ज़रिये ‘अखंड भारत’ की अवधारणा को नए सिरे से सार्वजनिक किया जा रहा है. इतिहासकार इसे तथ्यहीन और राजनीतिक नारा बताते हैं, जो हिंदुत्व की वैचारिक परियोजना, इतिहास की पुनर्व्याख्या और धार्मिक राष्ट्रवाद से गहराई से जुड़ा है.

क़िस्सा कुलगुरु के हाथों लेखक के अपमान का

कोई व्यक्ति जब एक लोकतांत्रिक परिवेश में बोलता है, वह यह शर्त कैसे लगा सकता कि उसे सुना ही जाए. आप बोलिए, मगर सुनने का अधिकार श्रोताओं के पास सुरक्षित रहता है: यह अधिकार संवैधानिक है. न सुनना भी इक तरह की अभिव्यक्ति ही है. मनोज रूपड़ा भी कुलपति के विषय से भटके हुए भाषण को न सुनकर अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे थे.

बरसों तक ट्रायल नहीं, फिर जुर्म के कबूलनामे का प्रस्ताव: एक ही पटकथा को दोहराती एनआईए

एनआईए के प्रभावित करने वाले दोषसिद्धि आंकड़ों को लेकर कई आरोपियों, उनके वकीलों और यहां तक ​​कि एजेंसी से जुड़े रहे एक व्यक्ति ने द वायर से बात की और बताया कि क्यों एनआईए के इतने सारे मामले आरोपियों के कबूलनामों के साथ उन्हें दोषी मान लिए जाने के साथ ख़त्म होते हैं.

राही मासूम रिज़ा और ‘आधा गाँव’ की पूरी कहानी…

राही मासूम रिज़ा बीसवीं सदी में उर्दू के ज़हीनतरीन लिखने वालों में थे. अगले बरस उनकी जन्म-शती मनाई जाएगी. इक्कीसवीं सदी के शुरू में किए गए एक से अधिक सर्वेक्षणों में उनके 'आधा गाँव' को बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के दस बेहतरीन उपन्यासों शुमार किया गया. इस विस्तृत लेख में जानिए रिज़ा साहब की ज़िंदगी की झलक और इस किताब के सामने आने की कहानी.

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