इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के प्रचार के लिए इन्फ्लुएंसर्स पर कितना ख़र्च हुआ, सरकार ने नहीं दी जानकारी

सरकार ने ई20 पेट्रोल के प्रचार पर करदाताओं का पैसा ख़र्च किया है या नहीं- इस बारे में आरटीआई के ज़रिये जानकारी मांगी गई, पर सरकार ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया. सरकारी तेल कंपनियों ने एक ही तरह के सवालों पर अलग जवाब दिए. जहां भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का हवाला देकर जानकारी नहीं दी, वहीं इंडियन ऑयल ने कहा कि ‘मांगी गई जानकारी काल्पनिक प्रकृति की है.’

नया वर्ष एक पंचांग की घटना भर है, उससे अधिक कुछ नहीं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन लग रहा है. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.

बंगनामा: शबार चाइते भालो… झोलार गुड़

अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं. बंगाल के इस स्वाद को जानिए बंगनामा की इस क़िस्त में.

एंजेल चकमा की मौत: क्या भारतीयता के सुरक्षा कवच के बिना भारत में जीवित रहना संभव नहीं?

हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.

लेखकों की अलमारी से: किन किताबों ने पढ़ने वालों का मन मोहा…

साल 2025 के विदा होते वक़्त में रचनाकारों और चिंतकों ने उन किताबों को याद किया जो उनके भीतर ठहर गईं. इस श्रृंखला में लोकप्रिय और अल्पचर्चित पुस्तकों के ज़रिये साहित्य, स्मृति, राजनीति और मानवीय संवेदना के उन सूत्रों को टटोला गया है, जो पाठक और लेखक दोनों को गहराई से समृद्ध करते हैं.

संस्मरण: मनरेगा श्रमिकों की उम्मीद बन गया था…

नरेगा का लागू होना देश के श्रमिक इतिहास में पहली घटना थी जब महिलाओं को भी पुरुषों के समान मज़दूरी मिलने लगी थी. बेबस और लाचार ग्रामीण दलित आदिवासी महिलाओं में एक अदृश्य राजनीतिक, सामाजिक सौदेबाज़ी की ताक़त का संचार तेज़ी से हुआ था. अब सरकार ने उनकी उम्मीद छीन ली है.

ज्ञान की गर्दन और हिंदुत्व की तलवार

दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.

सरकारी अनुमोदन के भरोसे साहित्य अकादेमी की ‘स्वायत्तता’!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.

हिरेन जोशी: संकट में मोदी के ‘संकटमोचक’ की साख

पीएमओ के 'क्राइसिस मैनेजर' कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी के क़रीबी हिरेन जोशी को लेकर अटकलों का बाज़ार गरम है, कहीं उन्हें पद से हटाने की चर्चा है तो कहीं 'सट्टेबाज़ी घोटाले' में उनका नाम लिया जा रहा है. लेकिन वे हैं कौन और देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय की धुरी कैसे बने?

‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

बास्केटबॉल कोर्ट में हार्दिक व अमन की मौत का जवाब कौन देगा?

हरियाणा के दो युवा खिलाड़ियों का बास्केटबॉल कोर्ट में जान गंवा देना व्यवस्थागत विफलता है. इन दुर्घटनाओं को लेकर खेल विभाग की जांच के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है. इन दोनों निर्मम घटनाओं से यह साफ दिखाई दे रहा है कि व्यवस्थाएं संवेदनहीन और ग़ैर-ज़िम्मेदार हो चुकी हैं.

क्रिसमस से पहले हिंसा और हमले: क्या ईसाई भारत के लोग नहीं हैं?

ईसाइयों के ख़िलाफ़ अभियान पिछले सालों में तेज़ होता चला जा रहा है. भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 2.3% ईसाई हैं. पिछले कई दशकों से भारत की आबादी में उनका हिस्सा लगभग यही रहा है. फिर धर्मांतरण से ईसाइयों की जनसंख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का ख़तरा क्यों सबको वास्तविक जान पड़ता है?

विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे: जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब, तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा…

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कवि-कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वे कई दिनों से एम्स रायपुर में भर्ती थे. उनकी सादगीपूर्ण भाषा और मानवीय संवेदनाओं से भरी रचनाओं ने हिंदी साहित्य को विशिष्ट पहचान दी.

नेल्ली के पीड़ितों ने 42 साल इंतज़ार किया, लेकिन उन्हें अब भी इंसाफ़ नहीं मिला

नेल्ली के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि जो लोग बड़े पैमाने पर हिंसा झेल चुके हैं, उनमें से कई लोग अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने आज तक किसी को भी इस हद तक बेसहारा नहीं छोड़ा है, जैसा इन लोगों के साथ हुआ है.

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