कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कलाओं को लेकर व्यापक समझ और मानसिकता ख़ासी तंगदिल और कुंद ज़ेहन है. कला के बारे में जो व्यापक चर्चा होती रहती है उसमें उसकी शक्ति को इस पैमाने पर अक्सर मापा जाता है कि उसका क्या व्यापक प्रभाव पड़ा. जिन कलाओं का ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता या जिनमें व्यापक समाज अधिक रुचि नहीं लेता, उनकी उपेक्षा भी होती रहती है.
पश्चिम बंगाल में छात्र आंदोलन की सशक्त परंपरा की जड़ें स्वाधीनता संग्राम तक जाती हैं, पर आज़ादी के बाद जब विदेशी औपनिवेशिक शासन का स्थान स्वदेशी लोकतांत्रिक सरकार ने ले लिया, छात्रों के समक्ष चुनौतियां बदल गईं. यहां छात्र राजनीति की एक विशेषता यह भी रही है कि वह केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रही; खाद्यान्न संकट, श्रम अधिकार, किसानों का शोषण, अंतरराष्ट्रीय राजनीति- ये सभी छात्र आंदोलनों का हिस्सा बने.
दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार के पीछे सिर्फ़ भितरघात नहीं, बल्कि नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना, स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार का मुद्दा और कांग्रेस की रणनीतिक प्रत्याशी चयन की भूमिका भी अहम रही. यह रिपोर्ट इन राजनीतिक समीकरणों और चुनावी नतीजों के पीछे की परतों का विश्लेषण करती है.
क्या भारत में हेट क्राइम के मामलों में न्यायिक विवेक अपराध की प्रकृति से ज़्यादा आरोपी की पहचान से प्रभावित होता है? हर्ष मंदर का तर्क है कि भारतीय न्याय व्यवस्था और राज्य की प्रतिक्रिया में मुस्लिम और हिंदू पहचान वाले आरोपियों के प्रति अलग-अलग मानदंड दिखाई देते हैं.
दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल से मिले खाने के रैपर और पैकेजिंग के आधार पर उन रेस्तरां और कैफे तक पहुंच रही है, जिन्होंने ऐप-आधारित डिलीवरी के जरिए प्रदर्शनकारियों को भोजन भेजा था. कई रेस्तरां मालिकों का आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने उनसे पूछताछ की कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों का 'समर्थन' क्यों किया और उनके ऑर्डर रिकॉर्ड भी खंगाले.
बांकीपुर सरकारी कर्मचारियों, मध्यवर्गीय परिवारों, पुराने पटना के प्रतिष्ठित मोहल्लों और परंपरागत भाजपा समर्थक उच्च जातीय समूहों वाली सीट है. यहां जीतने का अर्थ केवल विरोधी दलों के वोट बटोरना नहीं, भाजपा के सुरक्षित सामाजिक खाते में सेंध लगाना है.
बीते दिनों अयोध्या में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पहुंचने पर सपा के नेता सभा-समारोहों में उत्साह से भाग लेते दिखे, उससे पहले पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में शंकराचार्य से मिलने के बाद एक्स पर 'जो सनातन है, वही समाजवाद है' लिखा था. ये सब घटनाक्रम मिलकर इस धारणा को बल दे रहे हैं कि आगामी चुनाव से पहले अखिलेश भाजपा द्वारा बनाई पार्टी की 'हिंदूविरोधी' छवि बदल देना चाहते हैं.
दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के किलाम गांव में एक ईंट भट्ठे पर दो प्रवासी मज़दूरों की हालिया हत्याओं ने पूरी घाटी में बाहरी मज़दूरों के बीच फिर से डर पैदा कर दिया है. यह डर सिर्फ़ निर्माण या ईंट भट्टों में काम करने वालों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सेब के बागों, बाज़ारों और छोटे-मोटे धंधों में लगे लोगों को भी लगता है कि माहौल अचानक बदल गया है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हर आततायी शासक या संगठन को यह आत्मविश्वास होता है कि क्रूरता-हिंसा-घृणा-झूठ से वे अपराजेय रहेंगे. इस युवा प्रतिरोध ने यह साबित कर दिया है कि वे वेध्य हैं. नागरिकों के और वर्ग देर-सबेर सत्ता से हिसाब मांगेंगे और जवाबदेही पर इसरार करेंगे.
प्रेमचंद आज की तारीख़ में प्रासंगिक हैं क्योंकि वह मान्यताओं पर सवाल उठाने से या फिर संस्था बन गए व्यक्ति की प्रविधियों पर भी आलोचकीय निगाह डालने से परहेज़ नहीं करते. पर इसका अर्थ यह नहीं था कि गांधी के व्यक्तित्व में, देश को लेकर उनकी चिंता में प्रेमचंद को कोई शक था. देखा जाए तो प्रेमचंद पर सबसे अधिक प्रभाव भी उन्हीं का ही पड़ा था.
जंतर-मंतर पर युवाओं का प्रदर्शन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के साथ ख़त्म हो गया था, मगर अब हिंदुत्व और भाजपा समर्थकों द्वारा आंदोलन में शामिल लड़कियों को 'ढूंढकर सबक सिखाने' के प्रयास जारी हैं. इसमें भाजपा समर्थक हैंडल्स के साथ अब सत्ताधारी दल के नेता भी शामिल हो चुके हैं. इसी बीच दिल्ली पुलिस ने एक्स से ऐसे यूज़र्स की जानकारी मांगी हैम वहीं नोएडा पुलिस ने एक महिला प्रदर्शनकारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की है.
प्रेमचंद लिखते हैं, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी.’
प्यारे आंदोलन, तुम्हें हर बार किसी न किसी की कहानी बन जाना है. उसका दर्द, उसकी उम्मीद, उसका गुस्सा, उसकी ज़िद, सब कुछ अपना बना लेना है. कभी किसान बनकर खड़े हो जाते हो, कभी आदिवासी. कभी छात्र बन जाते हो, कभी औरत. पार्टियां विपक्ष में रहते हुए तुम्हें लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर बताती हैं, फिर वही सरकार में आते ही तुम पर लट्ठ भांज देती है.
सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष समेत तमाम भाजपा समर्थक अचानक 'जेंडर-विरोधी अपशब्दों और गालियों' को लेकर बहुत संवेदनशील हो गए हैं. असल में युवाओं की 'ग़लत' भाषा की आलोचना की आड़ में यह नरेंद्र मोदी की छवि बचाने का प्रयास है.
पुस्तक अंश: उन दिनों कोट्टयम की किसी लड़की के लिए आर्किटेक्चर की पढ़ाई कोई मामूली ख़्वाहिश नहीं थी. ग़ुस्से के अपने दौरों और बढ़ती मार-पीट के बीच, मिसेज़ रॉय ने अपनी बेटी से कहा कि अगर वह ठान ले, तो वह जो चाहे, बन सकती है. वे शब्द उनकी बेटी के लिए लाइफ़राफ़्ट बन गए, जो उसे गाढ़े अंधेरों, तूफ़ानी लहरों और जानलेवा भंवर से बचाकर ले आए.