यूजीसी नियम: लोकतांत्रिक समाज में समानता और न्याय के प्रति बैर-विरोध क्यों?

लोकतांत्रिक भागीदारी, समानता की भावना और समावेशी समाज बनाने की दिशा में अहम यूजीसी की नियमावली पर इतना हंगामा क्यों हुआ? क्या किसी भी क़ानून के दुरुपयोग की छिटपुट आशंकाओं के आधार पर उस क़ानून द्वारा बेहतरी लाने की कोशिश को ही ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए?

एप्स्टीन फाइल्स में पीएम मोदी का कथित उल्लेख, कांग्रेस ने लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव पेश किया

अमेरिकी यौन अपराधी जेफ़्री एप्स्टीन से जुड़ी बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदर्भ आने के बाद कांग्रेस ने इस पर तत्काल चर्चा की मांग करते हुए लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव पेश किया. अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेज़ों के अनुसार, 2017 से 2019 के बीच भारतीय कारोबारी अनिल अंबानी अमेरिकी राजनीतिक पहुंच से जुड़े मामलों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं पर चर्चाओं को लेकर एप्स्टीन के संपर्क में थे.

महात्मा गांधी बीते वक़्त के अवशेष हैं या भविष्य की संभावना?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.

बंगनामा: मनसा देवी की गाथा अधूरे समावेश की कहानी है

बंगाल के कुछ हिस्सों में पूजी जाने वाली मनसा देवी की गाथा से देश के आदिवासी तथा देशज सांस्कृतिक परंपराओं दोनों का ही मुख्य सामाजिक धारा में लड़खड़ाते, बाधित, और अधूरे समावेश की कहानी समझ सकते है. शिव की पुत्री होकर भी वह सवर्ण जातियों की श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकतीं क्योंकि उनकी माता अनार्य हैं, क्योंकि वह परलोक की नहीं, इसी धरती और जंगल की हैं, आदिवासी हैं.

30 जनवरी: महात्मा का शहादत दिवस सत्य और अहिंसा के लिए कहीं ज़्यादा चिंतित होने का वक़्त है

जिन सत्य व अहिंसा के बल से महात्मा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, उसे लड़ा व जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में देश का संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई, आज की सत्ताओं द्वारा उनको उनकी धुरी पर सर्वथा विपरीत दिशा में घुमाकर लोकतंत्र व संविधान से दुश्मनी साधी जा रही है.

जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए जारी यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए जारी यूजीसी के नए दिशानिर्देशों पर रोक लगा दी है. अदालत ने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए बनाए गए इन नियमों के दुरुपयोग होने की संभावना है. ये नए विनियएम अब 19 मार्च तक स्थगित रहेंगे.

मार्क टली: बीबीसी की आवाज़ और भरोसेमंद पत्रकारिता का एक दौर

बीबीसी से अपने लगभग तीन दशक के कार्यकाल (1964-94) के दौरान मार्क टली ने भारतीय उपमहाद्वीप की शायद ही ऐसी कोई बड़ी घटना हो जिसे उन्होंने कवर न किया हो. मार्क टली ने अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए जो साख बनाई वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है.

माधव गाडगिल: पर्यावरण के संरक्षक का जाना

स्मृति शेष: यूरोप व अमेरिका का पर्यावरण आंदोलन प्रकृति को मनुष्य से अलग कर संरक्षित करने का हिमायती रहा है. माधव गाडगिल को भारत के लिए संरक्षण का यह मॉडल इसलिए उपयुक्त नहीं लगता था क्योंकि यहां के वन कभी निर्जन नहीं रहे.

‘मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूं…’

इस ‘गणतंत्र’ के बंदियों को सुप्रीम कोर्ट के कथनानुसार व संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार कभी हासिल होगा? ‘जेल अपवाद है व ज़मानत नियम,’ यह धरातल पर फलीभूत कभी होगा या जेलों के यातनागृह में बंदियों को पीसकर भ्रष्ट अधिकारियों के पौ-बारह होते रहेंगे? स्वतंत्र पत्रकार और पटना की बेऊर जेल में विचाराधीन बंदी रूपेश कुमार सिंह का लेख.

सच की जगह कहां बची हुई है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.

मोदी के भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ सरकारी बदला: ज़मींदोज़ हुआ परवीन फ़ातिमा का घर

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.

एआर रहमान की टिप्पणी पर विवाद: क्या देश असहज सच्चाइयों को सुनने से डर रहा है?

जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को आईना दिखाने पर दंडित किया जाता है, तब समस्या वो दर्पण नहीं है क्योंकि उस पर तो दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ देने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारने की, स्वीकार को ग़द्दारी मानने की. हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं,

दिल्ली में बैठक से पहले लद्दाख का संदेश: ‘केंद्र शासित प्रदेश मॉडल विफल, हमें सम्मानजनक लोकतंत्र चाहिए’

साक्षात्कार: केंद्र सरकार 4 फरवरी को लद्दाख के प्रमुख संगठनों से बातचीत करने जा रही है. सितंबर 2025 की हिंसा के बाद बदले हालात में लेह एपेक्स बॉडी और केडीए साझा मसौदे के साथ बैठक में शामिल होंगे. द वायर हिंदी से बातचीत में केडीए संयोजक सज्जाद करगिली कहते हैं कि केंद्र शासित प्रदेश का मॉडल विफल हो चुका है और लद्दाख को पूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार चाहिए.

जम्मू-कश्मीर: पुलिस ने राष्ट्रीय अख़बारों के पत्रकारों को ‘समन’ किया, एक से बॉन्ड पर साइन करने को कहा गया

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार बशारत मसूद और हिंदुस्तान टाइम्स के श्रीनगर स्थित संवाददाता आशिक हुसैन को उनकी ख़बरों के संबंध में 'तलब' किया. मसूद को एक उनकी कथित ग़लती के लिए एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को भी कहा गया, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया.

बरेली: ख़ाली घर को मदरसे में बदलने का आरोप, मकान मालकिन बोलीं- दी थी नमाज़ की इजाज़त

उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में एक ख़ाली पड़े घर में नमाज़ अदा करने के कारण 12 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया. शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि इस घर को मदरसे में तब्दील किया जा रहा था. हालांकि उस घर की मालकिन ने कहा है कि उन्होंने स्थानीय लोगों को अपने घर में नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी थी.