बंगनामा: वाराणसी की गंगा में हुगली की याद…

बनारस के घाटों पर समय बिताकर कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से. बंगनामा की चालीसवीं क़िस्त.

छत्तीसगढ़: ग्राम सभा के जिस आदेश से ‘धर्मांतरित ईसाइयों’ के प्रवेश पर रोक लगाई गई, वही नदारद

जून 2025 में छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के कई आदिवासी इलाक़ों के गांवों में ग्राम सभा में पारित एक प्रस्ताव का हवाला देते हुए ईसाई पादरियों और ‘धर्मांतरित ईसाइयों’ के प्रवेश पर रोक लगाने वाले होर्डिंग लगाए गए थे. हाईकोर्ट ने इस रोक को असंवैधानिक नहीं माना. बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता को पेसा नियमों के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास जाने की सलाह दी.

एमपी: केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंसा, एबीवीपी-आरएसएस कार्यकर्ताओं पर आरोप, पीड़ित छात्रों को कारण बताओ नोटिस

सागर स्थित डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में बीते पांच दिनों के भीतर दो हिंसा की घटनाएं देखी गई हैं, जिसे लेकर एआईएसएफ के छात्रों ने एबीवीपी और आरएसएस कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया है. इस मामले को लेकर पुलिस ने मारपीट और बलवा से संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज की है. वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन ने पीड़ित छात्रों को ही छात्रावास से 'क्यों न निकाला जाए' इस संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

न्यू इंडिया में ही ‘स्कूली छात्र’ के रोबोट बनाने का दावा राष्ट्रीय सुरक्षा के ‘ख़तरे’ में तब्दील हो सकता है

जिस तरह से नए आईटी नियमों की गाज 'प्रिय नेता' के ख़िलाफ़ पोस्ट किए जाने वाले चुटकुलों पर गिर रही है, उससे स्पष्ट है कि यह मोदी सरकार के सेंसरशिप राज के शुरुआती दिन हैं... आगे-आगे देखिए होता है क्या.

बीहड़, अटपटे, अबूझ होते जा रहे संसार में कविता ही आख़िरी मकान है

विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.

सालभर में दिल्ली की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरी रेखा गुप्ता सरकार?

दिल्ली की भाजपा सरकार भले ही खुद को ‘वादों की नहीं, बल्कि काम की सरकार’ बता रही हो, लेकिन महिला समृद्धि योजना से लेकर बुज़ुर्गों की पेंशन बढ़ाने तक के अधूरे वादों को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी के कई इलाकों में लोग बिजली-पानी, ख़राब सड़कें और कूड़े की समस्याओं से भी जूझ रहे हैं.

गृह मंत्रालय का ‘सहयोग’ पोर्टल मोदी सरकार की डिजिटल सेंसरशिप की बानगी है

द वायर ने अब तक सार्वजनिक न किए गए सरकारी 'सहयोग' पोर्टल (आईटी इंटरमीडियरी) का यूज़र मैनुअल, जिसमें केंद्र सरकार का ऑनलाइन कंटेंट हटाने का पूरा तरीका बताया गया है, का विश्लेषण किया है. मैनुअल बताता है कि कैसे ऑनलाइन कंटेंट हटाने के आदेश एकतरफा होते हैं, जहां हितधारकों में सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के बीच बात हो रही है और मूल कंटेट लिखने या बनाने वाला नदारद है.

…जब प्रकाश बदलता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.

‘बैचलर्स किचन’ स्वाद, स्मृति और जीवन के छोटे-छोटे सच नए अंदाज़ में पेश करती है

पुस्तक समीक्षा: विनीत कुमार की 'बैचलर्स किचन' निजी और सार्वजनिक स्पेस के बीच किए जाने वाले पितृसत्तात्मक विभाजन को प्रभावी रूप से चुनौती देती है. एक बैचलर व्यक्ति की रसोई को केंद्र में रखकर यह कृति उस प्रचलित धारणा को विघटित करती है, जिसके अनुसार रसोई किसी जेंडर विशेष का स्वाभाविक क्षेत्र माना जाता है.

‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी’: भारतीय लोकतंत्र का थर्मामीटर बरास्ता राजस्थान

पुस्तक समीक्षा: दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’ पत्रकारीय अनुभवों का रोज़नामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. यह भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का अहसास देती है.

बोधगया का संघर्ष जारी: ‘मंदिरों पर हिंदुओं का नियंत्रण, तो महाबोधि महाविहार का पूर्ण प्रबंधन बौद्धों के हाथ में क्यों नहीं?’

बौद्ध संगठनों ने बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 को खत्म करने और महाबोधि महाविहार का पूर्ण प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की मांग उठाई है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब अन्य धर्मस्थल अपने समुदाय के अधीन हैं, तो महाबोधि महाविहार अपवाद क्यों है.

गुजरात: केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र से जातीय हिंसा का आरोप, एबीवीपी से जुड़े छात्रों पर इल्ज़ाम

केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात के एक दलित छात्र ने कुछ छात्रों, जिनमें कई एबीवीपी से जुड़े बताए जा रहे हैं, पर जातीय हिंसा और जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाया है. विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे दो गुटों की झड़प बताया है, जबकि पीड़ित छात्र ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हुए, यूजीसी की नई गाइडलाइन को लागू करना जरूरी बताया है.

कभी विपक्ष को कुछ न समझने वाली मोदी सरकार अब उससे कैसे पार पाएगी

बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?

अमूर्तन दृष्टि का स्वयंप्रतिष्ठ रूपायन होता है, उसे सिर्फ़ कौशल से समझाया नहीं जा सकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.

‘शायद मेरा मौन ही मेरा आख़िरी विरोध हो…’

पांच सालों से जेल में क़ैद, 'देशद्रोह' होने के तमगे में दबा अब्दुल मन्नान कभी 'प्रतिरोध की भाषा' पर पीएचडी थीसिस लिखा रहा था. आज अदालती कार्रवाइयों में फंसे इस 'स्कॉलर' को लगने लगा था कि असली प्रतिरोध 'बोलने' में नहीं, बल्कि इस ज़हर को ख़ामोशी से पी जाने में है जो आपको हर रोज़ पिलाया जाता है. पढ़िए अशअर नज्मी की कहानी 'अन्याय का शिलालेख'.

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