पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.
कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के प्रमुख प्रतीक जैन के घर ईडी की छापेमारी के दौरान पहुंची सीएम ममता बनर्जी ने आरोप लगाया केंद्रीय एजेंसी उनकी पार्टी से संबंधित हार्ड डिस्क, आतंरिक दस्तावेज़ और संवेदनशील डेटा ज़ब्त करने की कोशिश कर रही थी, जिसे वे अपने साथ ले आईं. हालांकि, ईडी का आरोप है कि बनर्जी ने पीएमएलए के तहत चल रही जांच और कार्रवाई में बाधा डाली.
आज जो कहानी गढ़ी जा रही है, वह एक ख़तरनाक भ्रम पर टिकी है. सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक आरएसएस को 'राष्ट्र' के बराबर रखकर, मीडिया सरकार को आलोचना से बचाने की कोशिश कर रहा है. यह एक धोखा है. आरएसएस एक ग़ैर-सरकारी संगठन है, भाजपा राजनीतिक दल है. नरेंद्र मोदी संविधान के एक निर्वाचित सेवक हैं. इनमें से कोई भी 'देश' नहीं है.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत सरकार ने 32 देशों में सात बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने पर 13 करोड़ रुपये से अधिक ख़र्च किए. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस महंगे कूटनीतिक अभियान से भारत को कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय समर्थन या रणनीतिक लाभ मिला?
माओवाद ख़त्म किए जाने के सरकारी दावों के बीच छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र अब निवेश का नया केंद्र बनकर उभर रहा है. हालांकि स्थानीय आदिवासी उनके जंगल और ज़मीन छिन जाने को लेकर आशंकित हैं.
सरकार ने ई20 पेट्रोल के प्रचार पर करदाताओं का पैसा ख़र्च किया है या नहीं- इस बारे में आरटीआई के ज़रिये जानकारी मांगी गई, पर सरकार ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया. सरकारी तेल कंपनियों ने एक ही तरह के सवालों पर अलग जवाब दिए. जहां भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का हवाला देकर जानकारी नहीं दी, वहीं इंडियन ऑयल ने कहा कि ‘मांगी गई जानकारी काल्पनिक प्रकृति की है.’
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन लग रहा है. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.
अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं. बंगाल के इस स्वाद को जानिए बंगनामा की इस क़िस्त में.
हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.
एक जनवरी को विनोद कुमार शुक्ल नवासी वर्ष के हो जाते. यह निर्दोष और निष्कलंक जीवन था. छल, प्रपंच और बाज़ार से परे.
साल 2025 के विदा होते वक़्त में रचनाकारों और चिंतकों ने उन किताबों को याद किया जो उनके भीतर ठहर गईं. इस श्रृंखला में लोकप्रिय और अल्पचर्चित पुस्तकों के ज़रिये साहित्य, स्मृति, राजनीति और मानवीय संवेदना के उन सूत्रों को टटोला गया है, जो पाठक और लेखक दोनों को गहराई से समृद्ध करते हैं.
नरेगा का लागू होना देश के श्रमिक इतिहास में पहली घटना थी जब महिलाओं को भी पुरुषों के समान मज़दूरी मिलने लगी थी. बेबस और लाचार ग्रामीण दलित आदिवासी महिलाओं में एक अदृश्य राजनीतिक, सामाजिक सौदेबाज़ी की ताक़त का संचार तेज़ी से हुआ था. अब सरकार ने उनकी उम्मीद छीन ली है.
दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.
पीएमओ के 'क्राइसिस मैनेजर' कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी के क़रीबी हिरेन जोशी को लेकर अटकलों का बाज़ार गरम है, कहीं उन्हें पद से हटाने की चर्चा है तो कहीं 'सट्टेबाज़ी घोटाले' में उनका नाम लिया जा रहा है. लेकिन वे हैं कौन और देश के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालय की धुरी कैसे बने?