केंद्र सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 10 वर्ष से अधिक समय से 10,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं. इनमें 558 मामले 20 वर्षों से अधिक समय से और 26 मामले 30 वर्षों से लंबित हैं. वहीं, देश के 25 उच्च न्यायालयों में 30 वर्षों से अधिक समय से 80,000 से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सत्तारूढ़ भाजपा को 'गुंडों से भरी पार्टी' बताते हुए कहा कि भारत में लोकतंत्र पर गंभीर ख़तरा मंडरा रहा है क्योंकि न्यायपालिका पर एक बड़ा 'सवालिया निशान' लगा हुआ है. उन्होंने कहा कि जिन संस्थाओं पर लोकतंत्र को ज़िंदा रखने और यह सुनिश्चित करने का ज़िम्मा था कि किसी एक व्यक्ति की तानाशाही न हो, वे इसमें नाकाम रहीं.'
सुप्रीम कोर्ट की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) समिति द्वारा प्रस्तावित प्रारंभिक मसौदे में कहा गया है कि एआई सिस्टम केवल सहायक भूमिका में काम करेंगे और वे किसी विधिवत नियुक्त न्यायिक अधिकारी द्वारा न्यायिक अधिकार के स्वतंत्र प्रयोग का न तो स्थान ले सकेंगे और न ही उसे प्रभावित या कमज़ोर कर सकेंगे.
दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर की गई अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को आपराधिक अवमानना का दोषी माना और 6 महीने के साधारण कारावास की सज़ा सुनाई है. अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर न्यायपालिका की गरिमा से खिलवाड़ बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इससे पहले पाहुजा ने न्यायपालिका को 'तानाशाही' बताते हुए विवादित टिप्पणी की थी.
जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडियाकर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले होते हैं और कई बार उनकी लिंचिंग तक हो जाती है और जहां आरोपियों के ख़िलाफ़ केस दर्ज नहीं होते या ठीक से जांच नहीं होती - उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के बजाय उन मामलों में हस्तक्षेप करता दिख रहा है, जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं के समूह पर फैसला सुनाते समय की, जिनमें बढ़ते हेट स्पीच की समस्या से निपटने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई थी. अदालत ने कहा कि यह तर्क कि हेट स्पीच का क्षेत्र विधायी रूप से खाली है, भ्रामक है. मौजूदा आपराधिक क़ानून का ढांचा, जिसमें भारतीय दंड संहिता और अन्य संबंधित क़ानूनों के प्रावधान शामिल हैं, इन कृत्यों से पर्याप्त रूप से निपटता है.
हाल ही में केंद्रीय क़ानून मंत्रालय ने संसद में बताया था कि सीजेआई के दफ्तर को 2016 से 2025 के बीच मौजूदा जजों के ख़िलाफ़ 8,630 शिकायतें मिली थीं. यह डेटा खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही उपलब्ध कराया था. पर अदालत ने अब दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि वह न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार या दुराचार से जुड़ी शिकायतों के बारे में अलग-अलग रिकॉर्ड नहीं रखता.
भारतीय न्यायिक व्यवस्था दोहरे संकट से गुज़र रही है. एक ओर न्यायिक क्षेत्र को कम बजट मिलता है और दूसरी ओर उपलब्ध बजट का पूरा और प्रभावी उपयोग नहीं हो पा रहा. नतीजा यह है कि पुलिस, जेल, न्यायालय, क़ानूनी सहायता, फॉरेंसिक और मानवाधिकार संस्थाएं, सभी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं.
वर्तमान में हम भारतीय बेहद यक़ीन के साथ कहते हैं कि देश में कोई सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा 'संविधान की आत्मा' है. हालांकि याद रखने योग्य बात यह है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.
किसी इंसान पर जूता फेंकना तिरस्कार का चरम है. चमड़े का वह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि समानता के उस विचार पर लक्षित था, जो संविधान की आत्मा है. ऐसा लगा जैसे मनु का भूत राष्ट्र को फुसफुसाकर याद दिला रहा हो कि जातिगत पदानुक्रम आज भी जीवित है, भले ही आकाश धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगा हो.
बेंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त रहे और अब भाजपा नेता भास्कर राव ने भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर वकील राकेश किशोर द्वारा जूता फेंकने का ज़िक्र करते हुए कहा था कि भले ही यह क़ानूनी रूप से और बेहद ग़लत हो, मैं इस उम्र में नतीजों की परवाह किए बिना, एक रुख अपनाने और उस पर चलने के साहस की प्रशंसा करता हूं. आलोचना के बाद उन्होंने इसके लिए माफ़ी मांग ली.
हिंदुत्व समर्थक सोशल मीडिया हैंडल लगातार सीजेआई बीआर गवई पर ‘एंटी-हिंदू’ होने के आरोप लगा रहे हैं, जातिवादी तस्वीरें साझा कर रहे हैं और यहां तक कि सीजेआई पर हुए हमले की निंदा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी आलोचना कर रहे हैं. एक एआई वीडियो में तो सीजेआई के गले में मिट्टी का घड़ा टंगा दिखाया गया है. यह वही प्रतीक है जो सदियों से दलितों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है.
अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के.आर. ने अटॉर्नी जनरल से उस अधिवक्ता के खिलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है, जिसने सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की थी. कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत अवमानना केस के लिए अटॉर्नी जनरल से अनुमति लेना आवश्यक है.
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने कहा कि उन्हें अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं है. उन्होंने दावा किया कि यह कदम ईश्वर की प्रेरणा से उठाया. किशोर ने गवई पर ‘सनातन धर्म’ के अपमान का आरोप लगाया है.