Judiciary

हम इन दिनों अधिकता के प्रकोप के मारे हुए हैं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हम निस्संदेह अधिकता के समय में जी रहे हैं. चीज़ें बहुत अधिक हो गई हैं और उनके दाम भी. महंगाई बढ़ रही है, विषमता भी. हत्या, बलात्कार, हिंसा आदि में बढ़ोतरी हुई है. पुलिस द्वारा जेल में डाले गए और सुनवाई न होने के मामले भी बढ़े हैं. न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च स्तर पर सत्ता के प्रति भक्ति और आसक्ति बढ़ी है. 

मद्रास हाईकोर्ट ने ‘जय भीम’ के अभिनेता सूर्या, निर्देशक ज्ञानवेल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द की

तमिल फिल्म ‘जय भीम’ पर कथित तौर पर वन्नियार समुदाय को ग़लत तरीके से दिखाकर उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा था. फिल्म साल 1995 में तमिलनाडु में हिरासत में यातना और एक ‘कोरवार’ आदिवासी समुदाय के व्यक्ति की मौत की सच्ची घटना पर आधारित कहानी है.

छत्तीसगढ़ मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय न्याय और बंधुत्व के सिद्धांत के उलट लगता है

छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों की हत्या पर एफआईआर तब दर्ज की थी, जब उनके परिजनों ने याचिका दायर की, फिर उसने विसंगतियों से भरी जानकारियां दीं, याचिकाकर्ताओं को गवाही दर्ज होने से पहले हिरासत में लिया गया, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर विश्वास करते हुए न्याय के लिए उस तक पहुंचे लोगों को दंडित करने का फैसला दिया.

कपिल सिब्बल बोले- सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची, वकीलों ने की अवमानना कार्यवाही की मांग

वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों को लेकर कहा कि यदि आपको लगता है कि जज हमेशा क़ानून के अनुसार निर्णय लेते हैं, तो आप ग़लत हैं. राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मामले कुछ चुनिंदा जजों को दिए जाते हैं और निर्णय का क्या होगा, यह कोई भी बता सकता है.

गुजरात और छत्तीसगढ़ संबंधी फैसलों पर पीपुल्स ट्रिब्यूनल ने कहा- बेहद अन्यायपूर्ण

वीडियो: बीते दिनों 2002 के गुजरात दंगों और 2009 में छत्तीसगढ़ में हुए गोमपाड नरसंहार मामले पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की रोशनी में सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायिक समुदाय ने ‘नागरिक स्वतंत्रता पर न्यायिक हमले’ नामक पीपुल्स ट्रिब्यूनल का आयोजन किया गया था. इस बारे में सुमेधा पाल की रिपोर्ट.

अदालत कम लोग पहुंचते हैं, अधिकतर आबादी मौन रहकर पीड़ा सहती है: प्रधान न्यायाधीश

भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने न्याय तक पहुंच को ‘सामाजिक उद्धार का उपकरण’ बताते हुए कहा कि आधुनिक भारत का निर्माण समाज में असमानताओं को दूर करने के लक्ष्य के साथ किया गया था. लोकतंत्र का मतलब सभी की भागीदारी के लिए स्थान मुहैया कराना है. सामाजिक उद्धार के बिना यह भागीदारी संभव नहीं होगी. 

देश में मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं: अमर्त्य सेन

कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान नोबेल सम्मानित अर्थशास्त्री ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका अक्सर विखंडन के ख़तरों की अनदेखी करती है, जो डराने वाला है. एक सुरक्षित भविष्य के लिए न्यायपालिका, विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन होना ज़रूरी है, जो भारत में नदारद है. यह असामान्य है कि लोगों को सलाखों के पीछे डालने के लिए औपनिवेशिक क़ानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी के आठ साल के कार्यकाल का सार- बांटो और राज करो

‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ और ‘सबका साथ-सबका विकास’ सरीखे नारे देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने शासन में इस पर अमल करते नज़र नहीं आते हैं.

न्याय से इनकार करने से अंतत: अराजकता फैलेगी: सीजेआई रमना

श्रीनगर में हुए एक समारोह में सीजेआई एनवी रमना ने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ज़रूरी है कि लोग महसूस करें कि उनके अधिकारों और सम्मान को मान्यता दी गई है और उन्हें संरक्षित किया गया है. उन्होंने जोड़ा कि हम अपनी अदालतों को समावेशी और सुलभ बनाने में बहुत पीछे हैं. अगर इस पर तत्काल ध्यान नहीं देते हैं, तो न्याय तक पहुंच का संवैधानिक आदर्श विफल हो जाएगा.

भारत के लोकतंत्र और मीडिया को बचाने की एक गुहार…

आज जब हम एक ऐसे ख़तरे से रूबरू हैं जहां सचमुच अपने लोकतंत्र को खो सकते हैं, हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि इस बात पर यक़ीन रखें कि हम इस तबाही से ख़ुद को बचा सकते हैं.

भारत को बचाने की लड़ाई हम में से हरेक को लड़नी होगी

भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले हम सभी लोगों के सामने यह चुनने का रास्ता है कि या तो हम इंसाफ़ की एक साझी सोच की दिशा में काम करें, उस दर्द और नफ़रत को दूर करने के लिए, जो हमारी सारी सामूहिक स्मृतियों को निगल रहे हैं, या फिर इन हालात को और बिगड़ने दें.

न्याय मिलना तभी संभव है जब पर्याप्त अदालतें और बुनियादी संरचना हो: सीजेआई रमना

देश के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने एक कार्यक्रम में कहा कि हमारी न्यायपालिका पर काम का बोझ है. देश के विभिन्न हिस्सों में न्यायिक अवसंरचना अपर्याप्त है. भारतीय न्यायपालिका और ख़ासकर निचली अदालतों को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा लंबित मामलों का है.

न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायाधीश करते हैं, यह धारणा ग़लत है: एनवी रमना

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना ने कॉलेजियम प्रणाली का बचाव करते हुए कहा कि न्यायिक नियुक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले जनता के विश्वास को बनाए रखने के मक़सद से होते हैं. न्यायाधीशों की नियुक्ति लंबी परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से होती है, जहां कई हितधारकों के साथ विचार-विमर्श किया जाता है.

ममता बनर्जी ने विपक्षी नेताओं को लिखा- विपक्ष को दबाने के लिए एजेंसियों का सहारा ले रही भाजपा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ग़ैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर एकजुट एवं सैद्धांतिक विपक्ष बनाने का संकल्प लेने की अपील की है. उन्होंने कहा कि सभी ‘प्रगतिशील ताक़तों’ को साथ आने और ‘भाजपा के दमनकारी शासन’ से लड़ने की ज़रूरत है.

आंध्र प्रदेशः तीन राजधानियों पर कोर्ट के फ़ैसले पर मुख्यमंत्री बोले- न्यायपालिका ने अपनी सीमा लांघी

मामला आंध्र प्रदेश की तीन राजधानी बनाने का है, जिस पर हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य विधायिका राजधानी स्थानांतरित करने, उसका विभाजन करने संबंधी अर्हता नहीं रखती. वहीं, मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी का कहना कि उनकी सरकार तीन अलग-अलग राजधानी स्थापित कर विकेंद्रीकरण की योजना पर आगे बढ़ेगी.