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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: narendramodi.in)

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं

कोविड महामारी के इस भीषण संकट के समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जबावदेही का यही एक काम कर सकते हैं कि वे अपनी कुर्सी छोड़ दें.

(फोटो: रॉयटर्स)

केवल सरकार विफल नहीं हुई हैं, हम मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों के गवाह बन रहे हैं…

संकट पैदा करने वाली यह मशीन, जिसे हम अपनी सरकार कहते हैं, हमें इस तबाही से निकाल पाने के क़ाबिल नहीं है. ख़ाससकर इसलिए कि इस सरकार में एक आदमी अकेले फ़ैसले करता है, जो ख़तरनाक है- और बहुत समझदार नहीं है. स्थितियां बेशक संभलेंगी, लेकिन हम नहीं जानते कि उसे देखने के लिए हममें से कौन बचा रहेगा.

(फोटो: पीटीआई)

कोविड-19 से हुईं मौतें आम मौत नहीं हत्याएं हैं, जिसकी ज़िम्मेदार मोदी सरकार है

अगर भाजपा सरकार को कोविड की दूसरी लहर के बारे में पता नहीं था, तब यह लाखों को इकट्ठा कर रैली कर रही थी, या संक्रमण के प्रकोप को जानते हुए भी यह रैली कर रही थी, दोनों ही सूरतें बड़ी सरकारी नाकामी की मिसाल हैं. पता नहीं था तो ये इस लायक नहीं है कि गद्दी पर रहें और अगर मालूम था तो ये इन हत्याओं के लिए सीधे ज़िम्मेदार हैं.

(फोटो: रॉयटर्स)

पत्थर के सनम जिन्हें हमने ख़ुदा जाना

आज हमें जो क्षोभ हो रहा है, उसका कारण सरकार से की गई अपेक्षाएं हैं, जिन पर खरी उतरने में वो पूरी तरह नाकाम रही. ऐसा दस साल पहले भी होता तो हम इतने ही त्रस्त होते, पर मुद्दा ये है कि जिन्हें हमने ख़ुदा समझा, वे परीक्षा की घड़ी आई, तो मिट्टी के माधो साबित हुए. बेशक दूसरे भी नालायक ही थे, पर कोई उन्हें ‘तारणहार’ कहता भी नहीं था!

(फोटोः रॉयटर्स)

वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए आपत्तिजनक मैसेज के लिए एडमिन ज़िम्मेदार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

कोर्ट ने वॉट्सऐप ग्रुप के एक एडमिन के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर ख़ारिज की, जिसमें आरोप था कि एक मेंबर द्वारा महिला पर आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने पर उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की. अदालत ने कहा कि महज़ एडमिन होने मात्र से ये साबित नहीं होता है कि मैसेज में उनकी सहमति शामिल थी.

दमोह के अस्पताल में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल (बाएं सफ़ेद कपड़ों में और बीमार मां के लिए ऑक्सीजन की मांग करता युवक (पीली टी-शर्ट में).  (साभार: वीडियोग्रैब/ट्विटर)

मध्य प्रदेश: बीमार मां के लिए ऑक्सीजन मांगने पर केंद्रीय मंत्री ने युवक से अभद्रता की

गुरुवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल मध्य प्रदेश के दमोह में एक युवक के बीमार मां के लिए ऑक्सीजन की मांग करने पर उसे ‘दो थप्पड़ मारने’ की बात कहते नज़र आए थे. इस युवक की कोरोना संक्रमित मां अस्पताल में भर्ती थीं.

शंख घोष. (फोटो साभार: ट्विटर)

शंख घोष: हममें से कोई पूर्ण नहीं, सब आंशिक ही हैं…

स्मृति शेष: कवि भविष्य देख सकता है क्योंकि उसके पास जो सामने है उसके आवरण को चीरकर अंदर झांक पाने का साहस होता है. जो आज बंगाल को लील जाने को खड़ा है और जिसके सामने बंगाल साधनविहीन नज़र आ रहा है, वह शंख बाबू को आज से बीस वर्ष पहले ही दिख गया था.

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कोरोना वायरस ने कैसे बदली सेक्स वर्कर्स की ज़िंदगी

वीडियो: कोरोना महामारी आ जाने से देश में कई व्यापार ठप हो गए हैं. भारत में सेक्स-वर्क ग़ैरक़ानूनी नहीं है, लेकिन कोरोना वायरस ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया है, जिसके चलते दिल्ली के जीबी रोड की सेक्स वर्कर काफ़ी परेशान हैं और वो दिल्ली सरकार से मांग कर रही हैं कि अगर इसके अलावा भी कोई काम मिले तो वो करने को तैयार हैं.

(फोटो साभार: अमेज़न डॉट इन)

रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व: संघ की संरचना और तौर-तरीकों की पड़ताल

पुस्तक समीक्षा: पढ़े-लिखे शहरियों और लेफ्ट-लिबरल तबकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर जो धारणा रही है वह यह है कि संघ बहुत ही पिछड़ा संगठन है. बद्री नारायण की किताब ‘रिपब्लिक ऑफ हिंदुत्व: हाउ द संघ इज़ रिशेपिंग इंडियन डेमोक्रेसी’ दिखाती है कि संघ ने इसके उलट बड़ी मेहनत से अपनी छवि तैयार की है.

(फोटो साभार: अरिजीत)

बाबा साहेब के सपनों को साकार करने के लिए जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध मुहिम तेज़ करनी होगी

कोई भी राजनीतिक दल जाति व्यवस्था के अंत का बीड़ा नहीं उठाना चाहता है, न ही कोई सामाजिक आंदोलन इस दिशा में अग्रसर है. बल्कि, जाति आधारित संघों का विस्तार तेज़ी से हो रहा है. यह राष्ट्र एवं समाज के लिए एक घातक संकेत है.

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क्यों हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के ख़िलाफ़ थे आंबेडकर?

वीडियो: बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के विचारों और उनकी कल्पना के समाज के विषय पर प्रोफेसर इरफ़ान हबीब और असिस्टेंट प्रोफेसर लक्ष्मण यादव से द वायर की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी की बातचीत.

(प्रतीकात्मक फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मुस्लिमों के उत्पीड़न की वजह अब ध्रुवीकरण नहीं, उन्हें अपमानित ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर करना है

देश के नेता विगत कोई बीस सालों के अथक प्रयास से समाज का इतना ध्रुवीकरण पहले ही कर चुके हैं कि आने वाले अनेक वर्षों तक उनकी चुनावी जीत सुनिश्चित है. फिर कुछ लोग अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और उन्हें अपमानित करने के लिए जोशो-ख़रोश से क्यों जुटे हुए हैं?

(प्रतीकात्मक फोटो: द वायर)

ममता बनर्जी: धर्मोन्माद की दुंदुभि के बीच स्त्री शक्ति का पर्याय

वैसे यह देश सुबह-शाम तक स्त्री महिमा का गायन करता है, लेकिन सच में यहां की न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका, मीडिया और जन लोक… सबके सब पूरी ताक़त से स्त्रियों के विरोध में जुट पड़ते हैं. फिर भले वह सोनिया हो, वसुंधरा राजे हो या फिर ममता बनर्जी… वे विवेकहीन लोक का प्रहार झेलती ही हैं.

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रोल ही निभाना हो तो मैं मर्द का रोल भी निभा सकती हूं: रिचा चड्ढा

वीडियो: ‘ओए लकी लकी ओए’, ‘मसान’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘फुकरे’ ज ‘शकीला’ जैसी फिल्मों में अभिनय की छाप छोड़ने वाली रिचा चड्ढा कुछ समय पहले आई फिल्म ‘मैडम चीफ़ मिनिस्टर’ को लेकर चर्चा में हैं. रिचा चड्ढा से दामिनी यादव की बातचीत.

न​रसिंहानंद सरस्वती. (फोटो: फेसबुक)

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने डासना मंदिर के पुजारी की गिरफ़्तारी की मांग की

इससे पहले धार्मिक नेता और ग़ाज़ियाबाद के डासना देवी मंदिर के प्रमुख पुजारी नरसिंहानंद सरस्वती के ख़िलाफ़ मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को कथित तौर पर आहत करने के लिए राजधानी दिल्ली में आप विधायक और दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष अमानतुल्ला ख़ान द्वारा बीते तीन अप्रैल को प्राथमिकी दर्ज कराई गई है.