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अमेरिका और तालिबान के बीच ऐतिहासिक समझौता, 14 महीने में अफगानिस्तान छोड़ेंगे नाटो सदस्य

दोहा के एक आलीशान होटल में तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर ने समझौते पर हस्ताक्षर किए वहीं दूसरी ओर से अमेरिका के वार्ताकार ज़लमय खलीलजाद ने हस्ताक्षर किए. मुल्ला बिरादर ने अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में सहयोग के लिए पाकिस्तान के साथ चीन, ईरान और रूस का जिक्र किया. हालांकि, इस दौरान उन्होंने भारत का जिक्र नहीं किया.

कतर के दोहा में समझौते पर हस्ताक्षर के बाद हाथ मिलाते तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर और अमेरिका के वार्ताकार ज़लमय खलीलजाद. (फोटो: रॉयटर्स)

कतर के दोहा में समझौते पर हस्ताक्षर के बाद हाथ मिलाते तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर और अमेरिका के वार्ताकार ज़लमय खलीलजाद. (फोटो: रॉयटर्स)

दोहा/वाशिंगटन/इस्लामाबाद: अमेरिका ने तालिबान के साथ शनिवार को एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए और 14 माह के भीतर अपने सारे सैनिकों को वापस बुलाने की एक रूपरेखा भी पेश की.

इस समझौते के साथ ही तालिबान और काबुल सरकार के बीच भी बातचीत की उम्मीद जगी है जिससे 18 साल से चल रहे संघर्ष के भी खत्म होने के आसार है.

दोहा के एक आलीशान होटल में तालिबान के वार्ताकार मुल्ला बिरादर ने समझौते पर हस्ताक्षर किए वहीं दूसरी ओर से अमेरिका के वार्ताकार ज़लमय खलीलजाद ने हस्ताक्षर किए. इसके बाद दोनों ने हाथ मिलाए. इस दौरान होटल के कॉन्फ्रेंस कक्ष में लोगों ने ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे लगाए.

यह समझौता अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ की देख रेख में हुआ. उन्होंने अलकायदा से संबंध समाप्त करने की प्रतिबद्धता भी तालिबान को याद दिलाई.

समझौता होने से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान के लोगों को नए भविष्य के लिए बदलाव को अपनाने की अपील की थी.

उन्होंने हस्ताक्षर कार्यक्रम की पूर्व संध्या पर कहा, ‘अगर तालिबान और अफगान सरकार अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा कर पाते हैं तो हम अफगानिस्तान में युद्ध खत्म करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ सकेंगे और अपने सैनिकों को घर वापस ला पाएंगे.”

यदि तालिबान समझौते का पालन करता है तो अमेरिका और उसके सहयोगी देश अफगानिस्तान से 14 माह के भीतर अपने बलों को वापस बुला लेंगे. अफगानिस्तान में अभी अमेरिका के करीब 13,000 सैनिक हैं.

नाटो के महासचिव जेन्स स्टोल्टनबर्ग ने समझौते को ‘स्थाई शांति की दिशा में पहला कदम’ करार दिया.

नार्वे के प्रधानमंत्री ने काबुल में संवाददाताओं से कहा,‘शांति का रास्ता लंबा और कठिन है. हमें रुकावटों, विघ्न डालने वालों के लिए तैयार होना होगा,शांति का रास्ता आसान नहीं है लेकिन यह पहला अहम कदम है.’

तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने एएफपी से कहा,‘चूंकि आज समझौते पर हस्ताक्षर हो रहे हैं और हमारे लोग प्रसन्न हैं और जश्न मना रहे हैं, इसलिए हमने देश भर में अपने सैन्य अभियान रोक दिए हैं.’

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मुल्ला बिरादर ने अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में सहयोग के लिए पाकिस्तान के साथ चीन, ईरान और रूस का जिक्र किया. हालांकि, इस दौरान उन्होंने भारत का जिक्र नहीं किया.

जल्द ही तालिबान के नेताओं से मुलाकात करुंगा: ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा कि उनकी ‘जल्द ही’ तालिबान के नेताओं से मुलाकात करने की योजना है.

साथ ही उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध कोई और लड़े, खासतौर से उस क्षेत्र के देश यह लड़ाई लड़ें.

ट्रंप ने व्हाइट हाउस में संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘मैं जल्द ही तालिबान के नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात करुंगा. हम उम्मीद कर रहे हैं कि उन्होंने जो कहा वे उस पर अमल करेंगे, वे आतंकवादियों का खात्मा करेंगे. वे कुछ बहुत बुरे लोगों का खात्मा करेंगे. वे इस लड़ाई को जारी रखेंगे.’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘हमें अफगानिस्तान में आतंकवादियों का सफाया करने में बड़ी सफलता मिली लेकिन इतने वर्षों के बाद अब वक्त आ गया है कि अपने लोगों को घर वापस लाया जाए. हम अपने लोगों को घर लाना चाहते हैं.’

ट्रंप का यह बयान तब आया है जब कुछ घंटों पहले अमेरिका और तालिबान ने दोहा में एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत अमेरिका 14 माह के अंदर अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुला लेगा.

ट्रंप ने कहा, ‘ अमेरिका को हर चीज की जानकारी दी गई है.’

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अफगानिस्तान में बहुत लंबा सफर रहा.

उन्होंने कहा, ‘यह बहुत लंबा सफर रहा. हर किसी के लिए यह मुश्किल सफर रहा. हम व्यापक तौर पर कानून प्रवर्तक समूह हैं. हमारे सैनिक लड़ाके हैं. वे दुनिया के सबसे महान योद्धा हैं.’

उन्होंने कहा, ‘जैसा कि आपको पता है कि हमने सीरिया तथा इराक में आईएस को 100 फीसदी तबाह कर दिया. हमारे पास हजारों कैदी हैं. हमने हजारों आईएस आतंकवादियों को मारा तथा इसी तरह अफगानिस्तान में किया. लेकिन अब यह वक्त है कि कोई और यह काम करें और यह तालिबान होगा तथा आसपास के देश होंगे. अफगानिस्तान के आसपास कई देश हैं जो मदद कर सकते हैं. हम 8,000 मील दूर हैं.’

ट्रंप ने कहा, ‘हम क्षेत्र में अपने सैनिकों की संख्या 8,000 से 8,600 तक कम कर रहे हैं और फिर हम भविष्य में सही वक्त आने पर अंतिम निर्णय लेंगे. यह बहुत ही साहसी समझौता है. काफी बातचीत की गई. वे कई वर्षों से इसे करना चाह रहे थे.’

राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें सच में लगता है कि तालिबान यह दिखाना चाहता है कि वह वक्त की बर्बादी नहीं कर रहा है.

उन्होंने कहा, ‘अगर कुछ खराब होता है तो हम वापस जाएंगे. मैं लोगों को बता दूं कि हम वापस जाएंगे और हम इतनी तेजी से वापस जाएंगे तथा इतने सैनिकों के साथ वापस जाएंगे कि किसी ने कभी नहीं देखा होगा. मुझे उम्मीद है कि इसकी जरूरत न पड़ें.’

एक सवाल का जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा कि तालिबान यह समझौता चाहता था.

उन्होंने कहा, ‘तालिबान यह चाहता था. (अफगानिस्तान के) राष्ट्रपति अशरफ गनी इसमें काफी हद तक शामिल रहे जैसा कि आप जानते ही हैं और अब वह तालिबान से बातचीत कर रहे हैं.’

ट्रंप ने कहा कि तालिबान ने पक्का वादा किया है.

उन्होंने कहा, ‘हम देखेंगे कि समझौते पर कैसे अमल होता है. हमें उम्मीद है कि इस पर अच्छी तरह से अमल होगा. मुझे लगता है कि यह करने में उनका बड़ा फायदा है लेकिन उन्हें आतंकवादियों का खात्मा करना होगा. हमने आतंकवाद के संबंध में जो काम किया, वह बेहद शानदार है तथा अब वक्त है कि हमारे लोग घर लौटें.’

अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8,600 करेगा: अमेरिकी अधिकारी

तालिबान के साथ हुए समझौते के मुताबिक अमेरिका अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या घटाकर 8,600 करने के लिये प्रतिबद्ध है, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि अगर अफगान पक्ष किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहता है तो अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी के लिये बाध्य नहीं है.

युद्ध प्रभावित रहे अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिये अपने प्रयासों और तालिबान के साथ समझौते पर किये गए हस्ताक्षर के तहत अमेरिका अफगानिस्तान में अपने बलों की संख्या शुरू में ही घटाकर 8,600 सैनिकों तक करने के लिये प्रतिबद्ध है. अफगानिस्तान में अभी करीब 13,000 अमेरिकी सैनिक हैं. यह वह स्तर है जिसे अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो बलों के कमांडर, जनरल स्कॉट्स मिलर ने उनके मिशन को पूरा करने के लिये आवश्यक बताया था.

एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कहा कि जवानों की वापसी और समझौता एक समानांतर प्रक्रिया है.

विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और भारत समेत कई अन्य विदेशी राजनयिकों की मौजूदगी में अमेरिका ने दोहा में तालिबान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये.

नाम ना जाहिर करने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, “हमारी वापसी इस समझौते से जुड़ी है और शर्तों पर आधारित है. अगर राजनीतिक समझौता विफल होता है, अगर वार्ता नाकाम होती है तो ऐसी कोई बात नहीं है कि अमेरिका सैनिकों की वापसी के लिये बाध्य है.”

अधिकारी ने कहा, “यह कहने की बात नहीं है कि राष्ट्रपति के पास अमेरिका के कमांडर-इन-चीफ के तौर पर यह विशेषाधिकार नहीं है कि वह कोई भी फैसला कर सकते हैं जो उन्हें हमारे राष्ट्रपति के तौर पर उचित लगता है, लेकिन अफगान पक्ष अगर किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहते हैं या तालिबान समझौते की वार्ता के दौरान बुरा इरादा दिखाता है तो अमेरिका पर कोई बाध्यता नहीं है कि वह अपने सैनिकों को वापस बुलाए.”

सवालों के जवाब में अधिकारी ने कहा कि सैनिकों की वापसी तत्काल नहीं होगी. सैनिकों की संख्या घटाकर 8,600 करना शुरुआती समझौते का हिस्सा है और यह कुछ महीनों में होगा.

अधिकारी ने कहा, “यह तत्काल नहीं हो जाएगा. इसे अमल में लाने में थोड़ा वक्त लगेगा. लेकिन यह मौके पर मौजूद कमांडर की अनुशंसा है, राष्ट्रपति का इरादा है और यह एक समझौता है.”

एक अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के मुताबिक सैनिकों की वापसी पर काम करने का अमेरिकी इरादा समझौते में व्यक्त प्रतिबद्धता के मुताबिक तालिबान की कार्रवाई से जुड़ा है, जिसमें व्यापक आतंकवाद निरोधक प्रतिबद्धताएं भी शामिल हैं क्योंकि यह अमेरिका की प्राथमिक चिंता है….

अधिकारी ने कहा कि जहां तक दीर्घकालिक लक्ष्य की बात है, राष्ट्रपति की महत्वाकांक्षा वहां अंतत: राजनीतिक व्यवस्था बनाने, युद्ध खत्म करने और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की प्रतिबद्धता को खत्म करने की है.

पाकिस्तान ने अमेरिका-तालिबान समझौते का स्वागत किया

अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते का पाकिस्तान ने शनिवार को स्वागत किया और कहा कि वह अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए किसी भी प्रयास का समर्थन जारी रखेगा.

कतर की राजधानी दोहा में शनिवार को अमेरिका और तालिबान ने एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी होगी.

समझौते पर हस्ताक्षर के लिए आयोजित कार्यक्रम में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी भी मौजूद थे.

पाकिस्तान के विदेश विभाग ने बयान जारी कर कहा कि कुरैशी ने इस समझौते का स्वागत किया और कहा कि यह व्यवस्था अफगानिस्तान, क्षेत्र के लिए काफी महत्व रखती है.

बयान में कुरैशी के हवाले से कहा गया है, ‘पाकिस्तान शांतिपूर्ण, स्थिर, एकीकृत, लोकतांत्रिक और समृद्ध अफगानिस्तान का समर्थन जारी रखेगा.’

भारत की सधी प्रतिक्रिया, कहा-शांति के लिए प्रायोजित आतंकवाद का खात्मा जरूरी

अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते पर भारत ने शनिवार को सधी हुई प्रतिक्रिया जतायी और कहा कि उसकी लगातार नीति उन सभी अवसरों का समर्थन करने की रही है जो अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और स्थिरता ला सके तथा आतंकवाद की समाप्ति सुनिश्चित करे.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि एक निकटतम पड़ोसी के तौर पर भारत अफगानिस्तान को सभी तरह का सहयोग देना जारी रखेगा. कुमार ने यह कहकर एक स्पष्ट संकेत दिया कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का है.

कतर में भारत के राजदूत पी कुमारन उस कार्यक्रम में मौजूद राजनयिकों में शामिल थे जहां इस समझौते पर हस्ताक्षर किये गए.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ‘भारत की हमेशा से नीति उन सभी अवसरों का समर्थन करने की रही है जो अफगानिस्तान में शांति, सुरक्षा और स्थिरता ला सकें, हिंसा समाप्त करें और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से संबंध समाप्त कर अफगान के नेतृत्व वाली, अफगान के स्वामित्व वाली और अफगान नियंत्रित प्रक्रिया के जरिये एक दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान लाये.’

वह दोहा में अमेरिका..तालिबान समझौते पर हस्ताक्षर होने और काबुल में अफगान और अमेरिकी सरकारों द्वारा एक संयुक्त घोषणा जारी किये जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे.

भारत अफगानिस्तान में एक महत्वपूर्ण हितधारक रहा है क्योंकि उसने युद्ध प्रभावित देश के पुनर्निर्माण में पहले ही लगभग दो अरब अमरीकी डालर खर्च कर दिये हैं.

कुमार ने कहा, ‘एक निकटतम पड़ोसी के तौर पर भारत अफगानिस्तान सरकार और वहां के लोगों को एक शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और समृद्ध भविष्य के लिए उनकी आकांक्षाओं को साकार करने के लिए सभी तरह की सहायता देना जारी रखेगा जिसमें अफगान समाज के सभी वर्गों के हित संरक्षित हों.’

शांतिपूर्ण समझौते को अंतिम रूप दिये जाने से कुछ दिन पहले भारत ने अमेरिका से कहा था कि हालांकि अफगानिस्तान में शांति के लिए इस्लामाबाद का सहयोग महत्वपूर्ण है लेकिन पाकिस्तान पर इसको लेकर दबाव बनाया जाना चाहिए कि वह अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकी नेटवर्कों पर शिकंजा कसे.

श्रृंगला दो दिवसीय यात्रा पर शुक्रवार को काबुल पहुंचे जिस दौरान उन्होंने अफगान नेतृत्व से एक आत्मनिर्भर, संप्रभु, लोकतांत्रिक, बहुलवादी और समावेशी अफगानिस्तान के लिए भारत का समर्थन दोहराया.

उन्होंने अफगानिस्तान से यह भी कहा कि देश में स्थायी शांति के लिए बाहर से प्रायोजित आतंकवाद का खात्मा जरूरी है. उनका परोक्ष तौर पर इशारा अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों को पाकिस्तान के समर्थन की तरफ था.

विदेश सचिव ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी, मुख्य कार्यकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला, निर्वाचित उप राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब से बातचीत की.

विदेश सचिव ने पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, कार्यवाहक विदेश मंत्री मोहम्मद हारून चकहानसुर एवं कार्यवाहक वित्त मंत्री अब्दुल जादरान से मुलाकात भी मुलाकात की. उन्होंने अलग से अफगान नेताओं, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों से संवाद भी किया.

शांति समझौते पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत ने इसका उल्लेख किया है कि अफगानिस्तान में पूरे राजनीतिक विस्तार ने इसका स्वागत किया है.

अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर होने से एक दिन पहले श्रृंगला काबुल पहुंचे.

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, ‘विदेश सचिव ने अफगान नेतृत्व के साथ अपनी बैठकों में दोनों पड़ोसियों और रणनीतिक साझेदारों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और विकास साझेदारी बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिबद्धता दोहरायी.’

मंत्रालय ने कहा कि श्रृंगला ने एक आत्मनिर्भर, संप्रभु, लोकतांत्रिक, बहुलवादी और समावेशी अफगानिस्तान के लिए भारत के लगातार समर्थन को दोहराया जिसमें अफगान समाज के सभी वर्गों के हितों को संरक्षित हो.

विदेश सचिव ने स्थायी और समावेशी शांति एवं सुलह के लिए अफगान नेतृत्व, अफगान स्वामित्व और अफगान नियंत्रण के लिए भारत के समर्थन को व्यक्त किया.

विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए बाह्य रूप से प्रायोजित आतंकवाद को खत्म करने की जरूरत है.’

अमेरिका, रूस और ईरान जैसी प्रमुख शक्तियां अफगान शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रयासों के तहत तालिबान तक पहुंच बना रही थीं.

भारत का कहना है कि इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी प्रक्रिया से ऐसा कोई ‘अनियंत्रित क्षेत्र’ उत्पन्न नहीं होना चाहिए जहां आतंकवादियों और उनके समर्थकों को फिर से स्थापित होने का मौका मिले.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)