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‘हैदराबाद से गोरखपुर के लिए 73 हजार रुपये में एम्बुलेंस ली थी, पर भाई पहुंचने से पहले ही चल बसे’

गोरखपुर ज़िले के भटहट क्षेत्र के एक गांव के रहने वाले राजेंद्र और धर्मेंद्र निषाद हैदराबाद में काम करते थे, जहां लॉकडाउन के दौरान राजेंद्र की तबियत बिगड़ी और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया. गांव की ज़मीन गिरवी रख और क़र्ज़ लेकर किसी तरह उन्हें घर लाया जा रहा था, जब उन्होंने गांव के रास्ते में दम तोड़ दिया.

A civic worker disinfecting an ambulance in Mumbai on April 15 (Photo: PTI)

(फोटो: पीटीआई)

‘मेरे भाई हैदराबाद में पेंट पॉलिश करते थे. मै भी उनके साथ रहते हुए मजदूरी करता था. दो हफ्ते पहले वह बीमार हुए. मै उन्हें लेकर आधा दर्जन अस्पताल में घूमता रहा, सभी दवा दे देते लेकिन भर्ती नहीं करते. आखिर में मुझसे कहा गया कि भाई कुछ दिन के ही मेहमान है, घर ले जाओ. गांव में जमीन रेहन रखकर पैसा मंगाया. हैदराबाद से गोरखपुर के लिए 73 हजार रुपये में एम्बुलेंस ठीक किया और भाई को लेकर चल दिया लेकिन गांव से 25 किलोमीटर पहले ही मेरे भाई की जान चली गई. एम्बुलेंस में मेरी आंखों के सामने मेरा भाई मर गया.’

मोबाइल पर बोलते-बोलते धर्मेंद्र निषाद का गला रुंध गया. कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने कहा, ‘भाई की अंत्येष्टि करने के बाद विधवा भाभी और बहन के साथ गांव के स्कूल में क्वारंटीन कर दिया गया हूं. विधि-विधान भी नहीं कर पा रहा हूं. मेरे भाई की हैदराबाद में कोविड-19 जांच हुई थी औररिपोर्ट निगेटिव आई थी. इसके बावजूद पूरे परिवार और मुझ मदद करने वाले लोगों को स्कूल में क्वारंटीन कर दिया गया है.’

23 वर्षीय धर्मेंद्र गोरखपुर जिले के भटहट क्षेत्र के समदार बुजुर्ग गांव के रहने वाले हैं. उनके बड़े भाई 35 वर्षीय राजेंद्र निषाद की 30 मार्च को एम्बुलेंस से गोरखपुर लाते समय गांव से करीब 25 किलोमीटर पहले ही मौत हो गई.

धर्मेंद्र निषाद तीन भाई और दो बहन हैं. पिता पहले ही गुजर चुके हैं. राजेंद्र अपने पीछे पत्नी, दो बेटियां और एक छह साल के बेटे को छोड़ गए हैं.

राजेंद्र निषाद डेढ़ दशक से हैदराबाद में श्रीरामनगर क्षेत्र में मजदूरी कर जीवन निर्वाह कर रहे थे. धर्मेंद्र भी आठ वर्ष पहले उनके साथ हैदराबाद चला गया और मजदूरी करने लगा. दोनों वहां पेंट-पॉलिश का काम करते थे. मंझला भाई 27 वर्षीय जोगेंद्र विजयवाड़ा में बढ़ई का काम करते हैं.

धर्मेंद्र और राजेंद्र को हैदराबाद में एक दिन की मजदूरी 550 से 600 रुपये तक मिलती थी. ये दोनों पांच और मजदूरों के साथ चार हजार रुपये महीने के किराये पर एक छोटे-से कमरे में रहते थे. सभी मिलकर कमरे का किराया देते थे.

धर्मेंद्र के परिवार के पास गांव में ढाई बीघा खेत है जिसमें एक बीघा वे पहले ही बहन की शादी और घर की मरम्मत के लिए रेहन पर रख चुके थे. बाकी में तीनों भाई बांटकर खेती करते थे लेकिन जब इससे गुजारा मुश्किल होने लगा तो एक-एक कर तीनों बाहर मजदूरी करने चले गए. गांव के घर में बूढ़ी मां, तीनों भाइयों की पत्नियां व बच्चे रहते हैं.

Gorakhpur Hyd Migrant Workers (2)

राजेंद्र निषाद.

राजेंद्र तीन महीने पहले गांव से हैदराबाद गए थे. यहां जाने के बाद उन्हें एक फोड़ा हुआ जिसका वे इलाज करा रहा था. इस बीच कुछ दिन तक उन्हें बुखार रहा. इसी दौरान लॉकडाउन हो गया.

करीब एक पखवाड़े पहले तबियत और खराब हुई तो धर्मेंद्र उन्हें कई अस्पतालों में ले गए. जांच में उन्हें टायफाइड और तपेदिक का मरीज बताया गया. इसी बीच उसकी सांस भी फूलने लगी.

धर्मेंद्र 18 अप्रैल को राजेंद्र को लेकर गर्वनमेंट जनरल एंड चेस्ट हास्पिटल में गए जहां उन्हें तीन दिन तक भर्ती रखा गया. यहीं पर उनकी कोविड-19 की जांच भी करवाई गई.

जांच निगेटिव आने के बाद 20 अप्रैल को उन्हें दवा और होम क्वारंटीन करने की सलाह देकर वापस भेज दिया गया. जब तबियत में ज्यादा सुधार नहीं हुआ, तो फिर अस्पताल ले जाया गया.

इस बार निजी अस्पताल में दिखाया, जहां 23 अप्रैल को एक्सरे और खून की जांच हुई. रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने बताया कि राजेंद्र को लंबे समय से टीबी है, हालत काफी बिगड़ गई है और वह अब कम समय का मेहमान हैं.

धर्मेंद्र ने बताया कि वह आधा दर्जन अस्पतालों में भाई को लेकर गए थे, केवल दो अस्पतालों ने भर्ती किया. बाकी सभी दवा देकर घर जाने को कहते. अस्पतालों में 30 हजार रुपये खर्च हो गए. भाई और उनकी सारी कमाई खर्च हो गई.

उन्होंने बताया कि गांव से मंगाए पैसे भी खर्च हो गए. जब डॉक्टरों ने कहा कि राजेंद्र ज्यादा दिन नहीं बचेंगे तब वह हिम्मत हार गए और घर फोन कर इस बात की जानकारी दी.

इसके बाद बाकी बचे खेत को रेहन रख और कर्ज लेकर करीब एक लाख रुपये जुटाकर उसके पास भेजे गए. इसमें से धर्मेंद्र ने 73 हजार रुपये में एम्बुलेंस बुक की और 28 अप्रैल को राजेंद्र को लेकर घर के लिए निकल पड़े.

29 अप्रैल को दोपहर बाद गोरखपुर की सीमा नौसढ़ पहुंचे जहां उनकी थर्मल स्कैनिंग हुई. अस्पताल के पर्चे देखकर उन्हें जाने दिया गया.

इस बीच गांव के कुछ लोगों ने सलाह दी कि गांव जाने के पहले बीआरडी मेडिकल कॉलेज में राजेंद्र को भर्ती करा दिया जाए. गांव के कुछ लोग और राजेंद्र की पत्नी व बहन मेडिकल कॉलेज गेट पर पहुंच गए.

उधर धर्मेंद्र नौसढ़ से कुछ आगे बढ़े ही थे कि राजेंद्र ने दम तोड़ दिया. बीआरडी मेडिकल कॉलेज पहुंच धर्मेंद्र की भाभी और बहन को किसी तरह एम्बुलेंस में बिठा वे लोग वे लोग गांव के लिए निकले.

इसके बाद भटहट पुलिस चौकी पर एम्बुलेंस को रोक लिया गया. पुलिस ने प्रशासन को सूचित किया तो सभी को भटहट प्राथमिक स्वास्थ केंद्र ले जाया गया.

इससे एक दिन पहले दिल्ली से एक एम्बुलेंस में गोरखपुर के एक प्रवासी मजदूर को जांच के बाद कोविड-19 पॉजिटिव पाया गया था, इसी के चलते गोरखपुर जिला प्रशासन खासा सतर्क था.

प्रशासनिक अधिकारी और चिकित्सक तस्दीक करना चाहते थे कि राजेंद्र या धर्मेंद्र कोविड-19 संक्रमित तो नहीं है. जब राजेंद्र का मृत्यु बाद लार का नमूना लेना संभव नहीं हुआ तो पुलिस कस्टडी में धर्मेंद्र को गांव जाने की इजाजत दी गई.

Gorakhpur Hyd Migrant Workers (1)

गांव के स्कूल में बने क्वारंटीन सेंटर में धर्मेंद्र निषाद.

रात नौ बजे राजेंद्र का अंतिम संस्कार हुआ और इसके बाद धर्मेंद्र, उनकी विधवा भाभी और बहन को गांव के स्कूल में क्वारंटीन कर दिया गया है. साथ ही जो ग्रामीण बीआरडी मेडिकल कॉलेज गए थे, उन्हें भी क्वारंटीन किया गया है.

अब धर्मेंद्र क्वारंटीन सेंटर से ही गांव के एक बगीचे, जहां राजेंद्र का अंतिम संस्कार हुआ है, वहां मृत्यु के बाद किए जाने वाले विधि-विधान करने जाते हैं.

उनके साथ ग्राम पंचायत का एक कर्मचारी भी जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि धर्मेंद्र के आस-पास कोई न रहे. क्वारंटीन सेंटर और बगीचे को दिन में दो बार सेनेटाइज किया जाता है. क्वारंटीन सेंटर पर छह अन्य लोग भी रह रहे हैं.

धर्मेंद्र कहते हैं कि बड़े भाई के निधन और मंझले भाई के लॉकडाउन में फंसे होने के बाद इस समय वही घर के एकमात्र पुरुष सदस्य है, जिसे सब इंतजाम देखना-करना है लेकिन वे क्वारंटीन सेंटर में पड़े हुए हैं.

वे सवाल करते हैं, ‘जब भाई कोविड-19 पॉजिटिव नहीं थे, तो मेरे परिवार के साथ यह क्यों हो रहा है?’

उन्हें भाई को खोने के गम के साथ-साथ उसके छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, परिवार पर हुए एक लाख रुपये से अधिक के कर्ज को चुकाने की चिंता भी है.

उन्हें डर है कि वह रेहन पर रखे खेत को छुड़ा नहीं पाएंगे और उनकी जमीन हमेशा के लिए हाथ से जाती रहेगी.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)