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महाराष्ट्र की जेलों में मौत के बाद हो रहे हैं क़ैदियों के कोरोना टेस्ट

महाराष्ट्र की जेलों में अब तक 269 बंदी कोरोना संक्रमित पाए गए हैं. जेल विभाग का कहना है कि जिन क़ैदियों में कोरोना के लक्षण दिखे, सिर्फ उन्हीं का टेस्ट किया गया. हालांकि यह आईसीएमआर के दिशानिर्देशों के विरुद्ध है, जो संक्रमित के संपर्क में आने वालों और बिना लक्षणों वाले लोगों के भी अनिवार्य टेस्ट की बात कहता है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

मुंबईः महाराष्ट्र की तीन अलग-अलग जेलों में चार कैदियों की मौत के बाद उनके कोरोना टेस्ट कराने के मामले सामने आए हैं.

हालांकि, इन जेलों ने मृतकों के संपर्क में आए अन्य कैदियों या जेल स्टाफ का पता लगाने (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग) के लिए किसी तरह का कोई टेस्ट नहीं किया.

महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सुनील रामानंद द्वारा इन तीनों जेलों में हुई चार मौतों के मामलों में तैयार हलफनामे के जरिए इसका पता चला है.

राज्य की 60 में से कम से कम 10 जेलों में कोरोना का अत्यधिक प्रकोप है और 269 कैदियों में पहले ही कोरोना संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है.

ये मामले ऐसे समय में दर्ज हुए हैं, जब जेल प्रशासन यह पुख्ता दावा कर चुका था कि जेलों को कोरोना मुक्त रखने के लिए अत्यधिक सावधानी बरती जा रही है.

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) और मानवाधिकार वकील अर्चना रुपवेट और आफरीन खान द्वारा दायर की गई जनहित याचिका के जवाब में 15 जून को यह हलफनामा दर्ज किया गया.

जेल विभाग इससे पहले कह चुका है कि जिन कैदियों में कोरोना के लक्षण दिखाई दिए, सिर्फ उन्हीं कैदियों का कोरोना टेस्ट किया गया.

यह इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशानिर्देशों के विरुद्ध है, जिसमें कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों और बिना लक्षणों वाले लोगों के अनिवार्य टेस्ट की बात कही गई है.

18 मई को जारी आईसीएमआर के प्रोटोकॉल में कहा गया है कि पांच से दस दिन के बीच टेस्ट किए जाने की जरूरत है. जेल प्रशासन ने आठ जून को अपने जवाब में कहा था कि सभी कैदियों के स्वैब हासिल कर उनका टेस्ट करना संभव जरूरी नहीं है.

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एसएस शिंदे की पीठ ने पिछली सुनवाई में जेल विभाग से जेल में फॉलो किए जा रहे टेस्टिंग प्रोटोकॉल की जानकारी पेश करने को कहा था.

याचिकाकर्ताओं ने जेल में टेस्टिंग की कमी और आईसीएमआर प्रोटोकॉल की अवहेलना करने को लेकर चिंता जताई थी.

जेल में हुई इन चार मौतों में से एक 80 साल के बुजुर्ग थे, जो 15 फरवरी 2019 से यरवदा सेंट्रल जेल में थे.

प्रशासन के मुताबिक, उन्हें सांस लेने में दिक्कत और उल्टी की शिकायत के बाद सात मई को सासून अस्पताल में भर्ती कराया गया था. दो दिन बाद उनकी मौत हो गई. उनकी मौत के बाद किए गए टेस्ट में पता चला कि वह कोरोना संक्रमित थे.

हाईकोर्ट में पेश किए गए हलफनामे के मुताबिक, उनके कोरोना संक्रमित होने का पता चलने के बाद जेल प्रशासन ने जेल में किसी का टेस्ट नहीं किया. अब तक सिर्फ एक ही व्यक्ति का कोरोना टेस्ट हुआ है और वह वही 80 साल के मृतक थे.

एडीजीपी रामानंद का कहना है कि 13 जून तक 4,466 कैदियों की स्क्रीनिंग की गई.

इसी तरह इस साल 24 अप्रैल को तलोजा सेंट्रल जेल में बंद 53 साल के एक व्यक्ति को नौ मई को जेजे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उसी दिन उस व्यक्ति की मौत हो गई थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि मौत का कारण कोरोना के साथ निमोनिया  प्रकार था. उनकी तबियत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया था जहां उसी दिन उनकी मौत हो गई. इस मामले में भी जेल प्रशासन ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग या टेस्ट नहीं किए.

27 मई को 33 साल के एक अन्य कैदी ने तलोजा जेल में आत्महत्या कर ली थी. उनके मरने के बाद किए गए टेस्ट में कैदी में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई.

तलोजा जेल में दो कैदियों की मौतें हुईं लेकिन प्रशासन ने सिर्फ दो ही टेस्ट किए, जो उन दोनों मृतक के थे. जेल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने तलोजा सेंट्रल जेल में 2,217 कैदियों की स्क्रीनिंग की थी.

जेल प्रशासन द्वारा अन्य कैदियों के कोरोना टेस्ट नहीं कराए जाने से संक्रमण के प्रसार का पता लगाने का कोई तरीका ही नहीं है.

ऐसा ही एक मामला धुले जिला के अस्पताल से सामने आया था, जहां 23 साल के एक कैदी की मौत हो गई थी. वह नौ मई से 12 मई तक ही जेल में रहा.

जेल प्रशासन के मुताबिक, उसमें कुछ लक्षण थे. एक दिन बाद उसकी मौत हो गई. डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक नशे की वजह से उसकी मौत हुई है.

हलफनामे में कहा गया है कि कैदी की मौत के बाद ही उनके कोरोना संक्रमित होने का पता चला.

जिन जेलों में मौतें हुई हैं, उनके अलावा अन्य किसी भी जेल में कैदियों के सही अनुपात में टेस्ट नहीं किए गए हैं.

मई के अंत में जारी किए गए जेल के आंकड़ों के अनुसार, ठाणे सेंट्रल जेल में 2,908 कैदी बंद हैं, जिनमें से सिर्फ 11 कैदियों के ही अब तक स्वैब लिए गए हैं. इनमें से दो लोग कोरोना संक्रमित पाए गए हैं.

एडीजीपी रामानंद ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया है कि जिस जेल की क्षमता 1,105 कैदियों को रखने की हैं वहां पर 263 फीसदी ऑक्यूपेंसी दर है.

एडीजीपी ने अदालत में कहा कि ठाणे सेंट्रल जेल में अत्यधिक भीड़ है. पुलिस अधीक्षक ने ठाणे कलक्टर से एक अस्थाई जेल खोलने का आग्रह किया है. हालांकि अभी तक कोई भी अस्थाई जेल नहीं खोली गई है.

बता दें कि महाराष्ट्र की जेलें देश की सर्वाधिक भीड़भाड़ वाली जेलों में से एक हैं. मई महीने में मुंबई की आर्थर रोड जेल के 72 कैदियों और 26 कर्मचारियों के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी.

ये मामले सामने आने के बाद महाराष्ट्र राज्य में विभिन्न जेलों में बंद अंडरट्रायल कैदियों ने महाराष्ट्र  सरकार और राज्य द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति के सदस्यों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की थी.

उनका कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने 23 मार्च को दिए उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन किया, जिसमें कोविड-19 संक्रमण के मद्देनज़र जेलों में भीड़भाड़ से बचने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चार से छह सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की श्रेणियों का निर्धारण करने के लिए उच्च स्तरीय समितियों का गठन करने का निर्देश दिया गया था.

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