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सुप्रीम कोर्ट ने 10% ईडब्ल्यूएस कोटा को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की पीठ को भेजा

शीर्ष अदालत ने सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाले अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की पीठ को भेजते हुए कहा कि इसमें क़ानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन्हें बड़ी पीठ द्वारा तय किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बीते बुधवार को सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने वाले संविधान संशोधन अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच जजों की पीठ के पास भेज दिया.

कोर्ट ने कहा कि इसमें कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल हैं, इसलिए इसे बड़ी पीठ द्वारा तय किया जाना चाहिए.

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस सुभाष रेड्डी और बीआर गवई की पीठ ने कहा, ‘याचिकाकर्ताओं की दलील है कि यह संविधान संशोधन संवैधानिक भावना के विपरीत है और केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. हमारा मानना है कि इसमें कानून से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल हैं और इसे पांच जजों की पीठ द्वारा तय किया जाना चाहिए.’

पिछले साल जनवरी, 2019 में संसद द्वारा पारित 103वें संशोधन अधिनियम के जरिये संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में खंड(6) को शामिल करके आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रवाधान किया गया था.


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जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने ईडब्ल्यूएस कोटे की वैधता को चुनौती देते हुए दायर की गईं याचिकाओं पर सुनवाई करने के बाद 31 जुलाई 2019 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. कोर्ट को ये तय करना था कि इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाएगा या नहीं.

लाइव लॉ के मुताबिक, पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 145 (3) के तहत संविधान की विवेचना कर कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों को लेकर फैसला करने के लिए पांच जजों की पीठ होनी चाहिए.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के नियमों में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गईं याचिकाओं पर कम से कम पांच जजों की पीठ द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए और यदि याचिका में कानून के सवाल न जुड़े हों तो ये पांच जजों से कम की पीठ द्वारा भी तय किया जा सकता है.

इस आधार पर कोर्ट ने कहा कि इस मामले को पांच जजों की बड़ी पीठ द्वारा सुना जाना चाहिए क्योंकि यह समानता के विषय से जुड़ा हुआ है और इस संबंध में यह फैसला भी लिया जाना है कि आरक्षण को लेकर क्या सरकार 50 फीसदी की सीमा को पार कर सकती है.