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उड़ीसा हाईकोर्ट का सरकार को निर्देश, सुनिश्चित करें कि डॉक्टर पढ़ने लायक दवा का पर्चा लिखें

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा है कि चिकित्सा पेशवर, चिकित्सा-क़ानूनी मामलों में शामिल डॉक्टर अपनी जांच और टिप्पणी पढ़ने लायक लिखें, इसके लिए उनमें जागरूकता लाने के लिए उचित क़दम उठाए जाएं.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

कटक: उड़ीसा उच्च न्यायालय ने डॉक्टरों की ‘अपठनीय’ लिखावट पर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार से एक परिपत्र जारी करने को कहा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे पठनीय और खासतौर पर बड़े अक्षरों में वे मरीज को प्रिस्क्रिप्शन (दवा का पर्चा) लिखें.

अदालत ने कहा, ‘चिकित्सा पेशवर, चिकित्सा-कानूनी मामलों में शामिल डॉक्टर अपनी जांच और टिप्पणी पढ़ने लायक लिखें, इसके लिए उनमें जागरूकता लाने के लिए उचित कदम उठाए जाएं.’

उच्च न्यायालय ने कहा कि यह जरूरी है कि डॉक्टरों का पूरा समुदाय आगे बढ़कर दवा के पर्चे को अच्छी लिखावट में लिखने की कोशिश करे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उड़ीसा उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक आदेश जारी किया, जिसमें सरकारी अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ काम करने वाले डॉक्टरों को आसानी से पढ़े जा सकने वाले पर्चे, खासतौर पर बड़े अक्षरों में लिखने की सलाह दी गई है.

अदालत की ओर से यह भी कहा गया है कि एक डॉक्टर को दवाई के पर्चे में अस्पष्टता या उसकी व्याख्या न हो पाने की कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए.

जस्टिस एसके पाणिग्रही ने यह टिप्पणी नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्स्टेंस (एनडीपीए) एक्ट, 1985 के तहत गिरफ्तार हुए एक शख्स कृष्णा मंडल की जमानत की अर्जी सुनते हुए की थी.

बेहरामपुर जेल में बंद इस शख्स ने अपनी बीमार पत्नी के साथ रहने के लिए अंतरिम जमानत मांगी थी. यह महिला गायनेकोलोजिका (प्रसूति रोग), हृदय संबंधी और हीमैटोलॉजिकल (खून से संबंधित) जटिलटाओं से पीड़ित हैं.

महिला का इलाज ब्रह्मपुर के एमकेसीजी अस्पताल में चल रहा है. हालांकि, जमानत आवेदन के साथ दिए गए मंडल की पत्नी के मेडिकल दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान अदालत ने डॉक्टर द्वारा लिखे दवा के पर्चे और डॉक्टर की लिखावट को अस्पष्ट और अपठनीय पाया था.

अदालत को इन्हें पढ़ने में मुश्किल का सामना करना पड़ा था. अदालत ने पाया कि अपठनीय पर्चे मरीज के इलाज में देरी का कारण बन सकते हैं और उसके प्राणघातक नतीजे हो सकते हैं.

जस्टिस पाणिग्रही ने कहा, ‘कई मौके पर फार्मासिस्ट को दवा का पर्चा पढ़ने में समस्या आती है. यहां तक कि कुछ डॉक्टर अपनी ही लिखावट नहीं पढ़ पाते हैं.’

अदालत ने भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार एवं नैतिकता) संशोधन अधिनियम-2016 को उद्धृत करते हुए कहा कि यह अनिवार्य है कि प्रत्येक डॉक्टर दवा को उसके जेनेरिक नाम में और बड़े अक्षरों में लिखे.

अदालत ने कहा कि इस संबंध में महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में विशेष परिपत्र के जरिये कुछ कोशिश की गई हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)