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बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रोफेसर जीएन साईबाबा की पैरोल याचिका ख़ारिज की

माओवादियों के साथ संबंध रखने के मामले में नागपुर जेल में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे जीएन साईबाबा अपनी मां के अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों में हिस्सा लेने के लिए पैरोल का आवेदन दिया था.

GN Saibaba PTI

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जीएन साईबाबा. (फोटो: पीटीआई)

नागपुर: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा को दिवंगत मां के अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों में शामिल होने के लिए आपात पैरोल देने से मंगलवार को इनकार कर दिया.

जस्टिस जेडए हक और जस्टिस एजी घरोटे ने हालांकि नागपुर जेल के प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे किसी दिन साईबाबा को उनके परिवार के सदस्यों के साथ वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए बात कराने का इंतजाम करें.

माओवादियों के साथ संबंध को लेकर महाराष्ट्र के नागपुर केंद्रीय कारागार में आजीवन कारावास काट रहे साईबाबा ने अपनी मां के अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों में शामिल होने के लिए हैदराबाद जाने के वास्ते पैरोल मांगी थी.

उनकी 74 वर्षीय मां की मौत एक अगस्त को हैदराबाद में हो गई थी. वह कैंसर से पीड़ित थीं.

अदालत ने आपात पैरोल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी के बीच साईबाबा को नागपुर से हैदराबाद ले जाने के लिए सुरक्षाकर्मियों की व्यवस्था करना मुश्किल होगा.

सरकार की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक पीके सत्यनाथन ने साईबाबा की याचिका का विरोध किया और तर्क दिया कि अंतिम संस्कार के बाद की अधिकतर रस्में पूरी हो गई हैं.

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने बीते 28 जुलाई को साईबाबा की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. उन्होंने अपने स्वास्थ्य के आधार पर और कैंसर से पीड़ित अपनी मां से मिलने के लिए जमानत देने का आग्रह किया था.

साईबाबा के जमानत याचिका खारिज होने के चार दिन बाद उनकी मां का निधन हो गया था. इसके बाद उन्होंने अपनी मां के अंतिम संस्कार के रस्मों में हिस्सा लेने के लिए पैरोल पर छुट्टी देने का आवेदन दिया था.

हालांकि, नागपुर केंद्रीय जेल के अधिकारियों ने साईबाबा के पैरोल के उस आवेदन को भी खारिज कर दिया था.

साईबाबा 90 प्रतिशत शारीरिक अक्षमताओं के कारण व्हीलचेयर पर हैं.

साईबाबा को मार्च 2017 में गढ़चिरौली कोर्ट द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां (निवारक) अधिनियम (यूएपीए) के तहत माओवादियों से संबंध रखने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली गतिविधियों में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी. उन्होंने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)