भारत

लोकभाषाओं के बढ़ते जश्न और घटता ओहदा

विश्व में वैज्ञानिक लेखों का दो तिहाई हिस्सा अंग्रेज़ी में लिखा जाता है और बिना अंग्रेज़ी के आजकल विद्यावर्धन नहीं हो सकता. पर यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे लेखों का एक तिहाई, जो भी एक बड़ी संख्या है, दूसरी भाषाओं में है. पर इनमें भारत की बड़ी लोकभाषाएं शामिल क्यों नहीं हैं?

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

हमारे ज़माने में हिंदी के जितने जश्न मनाए जाते हैं, पहले उतने शायद कभी नहीं मनाए जाते थे. वैश्वीकरण के अंतर्गत हिंदी व अन्य भारतीय लोकभाषाओं की विदेश-यात्रा भी शुरू हो गई है.

उनमें प्रवासी लेखन शुरू हो गया है और उनका, विशेष रूप से हिंदी का, देश-विदेश के बड़े विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन भी होता है. यहां तक कि यूएन में हिंदी को स्थान देने की चर्चा सुनी जा चुकी है. नेता लोग हिंदी को समृद्ध करने के प्रति बयान देते रहते हैं.

लोकभाषाओं को बोलने वालों की संख्या भारत की आबादी के साथ-साथ बढ़ती जा रही है. इस हिसाब से हिंदी विश्व की तीसरी या चौथी भाषा मानी जा सकती है.

लेकिन इस शानदार सतह से प्रभावित होकर हम अपने को धोखा न दें- हिंदी दो-तीन पीढ़ियों में लुप्तप्राय भाषा हो सकती है.

हिंदी और भारतीय लोकभाषाएं कर्करोग (कैंसर) की प्रारंभिक अवस्था में हैं – बाहर से सब कुछ ठीक है, लेकिन बीमारी प्राणघातक है.

इस कैंसर का प्रकोप-स्थल शिक्षा है. आजकल ऐसे हिंदी-प्रेमी मुश्किल से दिखते हैं, जो अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के स्कूल में पढ़ाएं. जिसके पास साधन है वह अपने बच्चों का (या कम-से-कम बेटे का तो) अंग्रेज़ी स्कूल में दाखिल कराता है.

जनता के अंग्रेज़ी के प्रति इस लगाव को नेताओं ने भी पहचाना और लोकभाषा स्कूलों को बंद करके उन्हें अंग्रेज़ी मीडियम में परिवर्तित करने से उनको इतना वोट मिलेगा कि कम से कम एक चुनाव में तो जीतेंगे ही!

अगर इस रवैये में परिवर्तन नहीं आएगा और सिर्फ अंग्रेज़ी ही संभावनाओं की भाषा (Aspirational language) रहेगी तो कुछ पीढ़ियों में भारत को आयरलैंड की जैसी स्थिति हो सकती है.

आयरलैंड के पास हज़ार साल तक समृद्ध आयरिश भाषा-साहित्य था. लगभग दो सौ साल पहले आयरलैंड की भाषा आयरिश ही थी. आजकल उस देश की भाषा अंग्रेज़ी है और आयरिश बोलनेवालों की संख्या महज पौने लाख है.

जनसमूह में आयरिश भाषा का इस्तेमाल पासपोर्ट जैसे कुछ प्रतीकात्मक दस्तावेज़ों तक सीमित है.

भारतीय लोकभाषाओं की यह शिक्षोत्पन्न बीमारी क्या है? (1) लोकभाषाओं के विद्यालय अंग्रेजी के मुकाबले कमजोर हैं, (2) लोकभाषाएं वैज्ञानिक उच्च शिक्षा का माध्यम नहीं हैं और उनमें अच्छी नौकरी के अवसर अपेक्षाकृत कम हैं.

(3) लोकभाषा के अनेक समर्थक अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं और यह देखकर बहुत लोग लोकभाषाओं को कूपमंडूक बनाने का साधन मानते हैं.

21वीं सदी विद्या की सदी है. हिंदुस्तान की लोकभाषाओं में वैज्ञानिक लेख हमेशा कम थे. इन लोकभाषाओं में साहित्येतर उच्च शिक्षा नहीं के बराबर है और आजकल भारतीय लोकभाषा-साहित्यों के बारे में मूलभूत वैज्ञानिक अनुसंधानपरक लेख अधिकतर अंग्रेज़ी में प्रकाशित होते हैं.

हालांकि आजकल विश्व में वैज्ञानिक लेखों का दो तिहाई हिस्सा अंग्रेज़ी में लिखा जाता है और बिना अंग्रेज़ी के आजकल विद्यावर्धन नहीं हो सकता, फिर भी याद रखने की बात है कि वैज्ञानिक लेखों की एक तिहाई (जो एक बड़ी संख्या है) दूसरी भाषाओं में है.

और इन भाषाओं में भारत की बड़ी लोकभाषाएं शामिल क्यों नहीं हैं?

औपनिवेशिक परंपरा से भारतीय लोग प्रेरणा के लिए इंग्लैंड या आजकल अमेरिका की ओर देखते हैं. यह ध्यान में रखने की बात है कि इनके अलावा भाषा के प्रयोग में कई और समृद्ध देशों से भी प्रेरणा ली जा सकती है.

यूरोप के दूसरे देशों को देखा जाए. फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े देशों से लेकर फिनलैंड व स्लोवीनिया जैसे छोटे देशों तक हर एक में अधिकतर विश्वविद्यालय अपनी ही भाषाओं में चलते हैं.

इन देशों में सवाल भी नहीं उठता कि अंग्रेज़ी शिक्षा लोकभाषा शिक्षा से अच्छी हो. हां, यह तो अवश्य होता है कि अंग्रेज़ी वैश्विक भाषा होने के कारण अध्ययन का एक अनिवार्य विषय है.

विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते होशियार विद्यार्थी अपनी लोकभाषा के साथ-साथ अंग्रेज़ी में भी माहिर हो जाते हैं. इसके बाद यह भी पूछ लें कि शिक्षा के स्तर पर आंकड़ों में फिनलैंड क्यों विश्व में सबसे कामयाब देश है?

महात्मा गांधी ने कहा है, ‘राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा में नहीं बल्कि किसी अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, वे आत्महत्या करते हैं. इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है.’

हालांकि भारत में उत्तम कोटि के अंग्रेज़ी शिक्षण ने इन बातों को साबित नहीं किया है, फिर भी गांधी जी के इस वाक्य में गहरा सत्य है.

मातृभाषा में न पढ़ सकने से हमारे अंदर के एक भाग की हत्या होती है. मातृभाषा में शिक्षा न पा सकने से मातृभाषा की सुस्त हत्या होती जा रही है. क्या समाज की उन्नति के लिए यह कुर्बानी अनिवार्य है?

शिक्षा की राजनीति एक बात है. इसके अलावा भाषा के प्रति आम जीवन में भी हमारा दायित्व है. उचित अवसर मिलने पर भी अपने अनुभवों को अपनी मातृभाषा में क्यों नहीं व्यक्त करते?

लोकभाषा का इस्तेमाल से क्या हम सचमुच नीच हो जाएंगे. क्यों डरते हैं कि लोग हमें अशिक्षित समझेंगे? लोकभाषा को ऐसे क्यों नहीं बनाए रखते कि लोग उसका रस लें.

जो लोग कई भाषाओं में साहित्य पढ़ते हैं उनको मालूम है कि हर एक भाषा का रस अलग-अलग होता है. यह हमारा दायित्व है कि भविष्य में हमारे बच्चे-पोते भी इन रसों का आस्वादन कर सकें.

(लेखक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हिंदी, उर्दू और बृजभाषा पढ़ाते हैं.)