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लालू और नीतीश दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: उपेंद्र कुशवाहा

विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी महागठबंधन से नाराज़ रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने बसपा और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ नया मोर्चा बनाया है. उनके अनुसार जनता नीतीश कुमार के 15 वर्षों के कुशासन से मुक्ति चाहती है, वहीं राजद नीत गठबंधन में भी मुख्यमंत्री पद का मज़बूत चेहरा नहीं है.

Patna: Bihar Rashtriya Lok Samata Party (RLSP) president Upendra Kushwaha addresses a press conference at the Party office, in Patna, Friday, Nov 09, 2018. (PTI Photo)(PTI11_9_2018_000084B)

उपेंद्र कुशवाहा (फोटो: पीटीआई)

पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी महागठबंधन में नाराज चल रहे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी (रालोसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बाद पिछले हफ्ते को मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर एक नया मोर्चा बनाने की घोषणा की थी.

पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा का कहना था कि राज्य के सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों में ‘अबकी बार शिक्षा वाली सरकार’ के वादे के साथ मोर्चा बनाया जाएगा, जो राज्य में विकास और रोजगार सृजन के एक नए युग की शुरूआत करेगा.

कुशवाहा ने नीतीश कुमार के 15 साल और पूर्ववर्ती लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के डेढ़ दशक के शासन काल पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया था कि दोनों के शासनकाल में न तो भ्रष्टाचार को खत्म करने और न ही स्वास्थ्य एवं शिक्षा में सुधार लाने के लिए कुछ पर्याप्त किया गया.

समाचार एजेंसी ‘भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में लालू और नीतीश को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार देते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि उनकी पार्टी का गठबंधन न तो किसी के वोट काटने के लिए, न ही किसी को परोक्ष रूप से समर्थन देने के लिए है, बल्कि यह बिहार की जनता को एक सार्थक विकल्प देने के लिए है.

कुशवाहा ने कहा, ‘बिहार की जनता नीतीश कुमार के 15 वर्षों के कुशासन से मुक्ति चाहती है. दूसरी ओर, राजद नीत गठबंधन में भी मुख्यमंत्री पद का चेहरा मजबूत नहीं है और लोग इनके 15 साल के शासन के इतिहास को भी याद करते हैं. ऐसे में दोनों जनता में विश्वास पैदा करने में विफल रहे हैं.’

उन्होंने कहा कि लोग नीतीश के साथ भी नहीं हैं और न ही वे राजद के साथ जाना चाहते हैं क्योंकि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ऐसे में प्रदेश की जनता एक विकल्प की तलाश में हैं.

उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा चुनाव के लिए बसपा और जनवादी सोशलिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन से पहले रालोसपा राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा थी.

महागठबंधन से अलग होने के बारे में एक सवाल के जवाब में उन्होंने साफ-साफ कहा कि वर्तमान नीतीश कुमार की सरकार को हटाने के लिए राजद का वर्तमान नेतृत्व काफी नहीं है और उसने मुख्यमंत्री पद के लिए जो चेहरा (तेजस्वी यादव) पेश किया है, उसमें वह क्षमता नहीं है.

उन्होंने कहा कि अगर महागठबंधन की ओर से नेतृत्व में परिवर्तन होता तो कुछ हो सकता था, क्योंकि हमें ऐसा नेतृत्व चाहिए जो नीतीश कुमार के सामने टिक सके, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ .

कुशवाहा ने कहा, ‘ऐसे में बुरी तरह से हारने की बजाय हमने बेहतर समझा कि जनता के समक्ष एक सार्थक विकल्प पेश किया जाए.’

महागठबंधन से असंतुष्ट चल रहे कुशवाहा ने 24 सितंबर को पटना में आयोजित रालोसपा की एक आपात बैठक के दौरान कहा था कि राजद ने जिस नेतृत्व (तेजस्वी) को खड़ा किया है उसके पीछे खडे़ रहकर प्रदेश में परिवर्तन लाना संभव नहीं.

उन्होंने तब कहा था कि सीटों की संख्या (आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा) का मामला उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. बिहार की जनता चाहती है कि नेतृत्व ऐसा हो जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने ठीक से खड़ा हो सके. इतनी आकांक्षा और अपेक्षा जरूर थी. आज लोग जो भी सोचें पर अभी भी हमारे मन में है कि राजद अगर तय करे कि वह अपना नेतृत्व बदल देगी तो मैं अपने लोगों को समझा लूंगा.

गौरतलब है कि राजद ने एकतरफा निर्णय लेते हुए बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता और पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले तेजस्वी यादव को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया है .

उस समय यह पूछे जाने पर कि क्या वह महागठबंधन के भीतर इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ गए थे, कुशवाहा ने इससे इनकार करते हुए कहा, ‘गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े घटक कांग्रेस को देखें. तेजस्वी के सवाल पर वहां अभी भी संशय है. इसके अलावा, हाल ही में जीतन राम मांझी ने भी इसी मुद्दे पर मतभेद के कारण महागठबंधन छोड़ दिया और एनडीए में चले गए.’

पटना और दिल्ली में एनडीए के नेताओं के साथ कथित तौर पर बातचीत के बारे में पूछे जाने पर कुशवाहा ने बचते हुए कहा कि महागठबंधन नेतृत्व को लेकर समय पर निर्णय लेने में असमर्थ था. हमें बिहार की बेहतरी के लिए कदम उठाना था.

दिसंबर 2017 तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अधीन मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री के रूप में कार्य कर चुके कुशवाहा ने कटाक्ष करते हुए आरोप लगाया कि ऐसा लगता है कि भाजपा नीतीश कुमार सरकार को नियंत्रित करने के साथ साथ उसका महागठबंधन में भी दखल है.

यह पूछने पर कि उनके गठबंधन से विपक्षी मतों का विभाजन होने से सत्तारूढ़ एनडीए को फायदा होगा, रालोसपा अध्यक्ष ने कहा, ‘उनका गठबंधन न तो किसी का वोट काटने के लिए, न ही किसी को परोक्ष रूप से समर्थन देने के लिए है, बल्कि यह सिर्फ बिहार की जनता को एक सार्थक विकल्प देने के लिए है.’

रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी से गठबंधन को लेकर कोई बात होने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, ‘अभी तक लोजपा ने अपना रुख पूरी तरह से स्पष्ट नहीं किया है. चिराग पासवान अगर एनडीए से बाहर आने की घोषणा करते हैं तभी बात होगी. लेकिन निश्चित तौर पर अगर लोजपा साथ आए तो हम जनता को मजबूत विकल्प दे सकते हैं.’

उन्होंने कहा कि हम समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर अपने गठबंधन को और मजबूत बनाएंगे.

उन्होंने कहा कि राजद और जदयू दोनों ने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कोई ठोस काम नहीं किया. ऐसे में हम पढ़ाई, कमाई, दवाई, सिंचाई, सुनवाई और कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध बेहतर सरकार देने का वादा करते हैं.

2015 के विधानसभा चुनाव में रालोसपा, एनडीए का हिस्सा थी और बसपा अकेले चुनावी मैदान में थी. तब रालोसपा ने 23 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जिसमें उसके दो उम्मीदवार जीते थे और राज्य के कुल वोट के हिसाब से यह 2.56 फीसदी था.

वहीं, बसपा ने 228 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जिसमें एक को भी जीत नहीं मिली. राज्य स्तर पर बसपा का वोट प्रतिशत 2.7 फीसदी था तथा अधिकांश सीटों पर उसके प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाए थे.

हालांकि कुशवाहा के इस राजनीतिक कदम के चलते उनकी ही पार्टी के सदस्य खुश नहीं हैं और पार्टी छोड़ रहे हैं. पिछले ही हफ्ते पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भूदेव चौधरी ने राजद का दामन थम लिया था.

इसके बाद रालोसपा के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव और मुख्य प्रवक्ता माधव आनंद ने पार्टी के बसपा के साथ जुड़ने पर नाराजगी जताते हुए अपना रास्ता अलग कर लिया.

आनंद ने कहा कि पार्टी ने गलत कदम उठाकर अपने आस्तित्व समाप्ति का जोखिम उठाया है, और इसलिए वह अपने पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दोनों त्याग रहे हैं.

इस बारे में पूछे जाने पर कुशवाहा ने कहा, ‘मैंने दूसरे किनारे तक पहुंचने के इरादे से समुद्र में अपनी नाव डाली है पर बीच में छोड़कर जो जाना चाहते हैं तो उनका स्वागत है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)