राजनीति

मध्य प्रदेश: उपचुनावों में भाजपा और कांग्रेस में से किसका खेल बिगाड़ेगी बसपा

उपचुनावों में अमूमन न उतरने वाली बसपा इस बार मध्य प्रदेश की 28 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर उसका काफ़ी प्रभाव भी है, ऐसे में उसकी दावेदारी के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बसपा सुप्रीमो मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ. (फोटो: पीटीआई)

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बसपा सुप्रीमो मायावती और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ. (फोटो: पीटीआई)

तीन नवंबर को बिहार विधानसभा चुनावों के दूसरे चरण के मतदान के साथ-साथ मध्य प्रदेश में भी 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों के लिए मतदान होगा.

यह तय करेगा कि सात महीने पहले बनी भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार सत्ता में रहेगी या फिर कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस फिर से सत्ता में वापसी करेगी.

बता दें कि मार्च माह में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक 22 विधायक कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे जिससे कांग्रेस सरकार गिर गई थी और भाजपा ने सरकार बना ली थी.

बाद में तीन और कांग्रेसी विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया जबकि तीन विधायकों का निधन हो गया था. इस तरह विधानसभा की 28 रिक्त सीटों पर मतदान है.

कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने ही सभी सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. कांग्रेस छोड़कर आए सभी 25 विधायकों को भाजपा ने टिकट दिया है. लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बीच के इस सत्ता-संघर्ष को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने रोचक बना दिया है.

बसपा भी सभी 28 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. हालांकि 230 सदस्यीय विधानसभा में बसपा की ताकत केवल दो विधायकों तक सीमित है. इसलिए पहली नजर में तो बसपा दोनों ही दलों के लिए कोई बड़ी चुनौती पेश करती नहीं दिखती, लेकिन अगर सभी सीटों पर बसपा की ताकत का आकलन करें तो तस्वीर जुदा नजर आती है.

28 में से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल अंचल से हैं. अमूमन उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे ग्वालियर-चंबल अंचल में दलित मतदाताओं के बीच बसपा की अच्छी पकड़ मानी जाती है.

आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं. इन 16 में से 11 सीटें ऐसी हैं जिन पर कभी न कभी बसपा ने जीत दर्ज की है जबकि एक सीट ऐसी भी है जिस पर वह 2018 के विधानसभा चुनाव में 50 हजार से अधिक वोट लाकर दूसरे पायदान पर रही थी.

इस तरह कुल मिलाकर 12 सीटों पर बसपा का खासा प्रभाव रहा है.

2018 के विधानसभा चुनावों में इन सीटों पर बसपा के प्रदर्शन की बात करें, तो पोहरी में वह 52,736 वोट पाकर दूसरे पायदान पर थी और महज 7,918 वोट से चुनाव हारी थी.

जौरा में भी 41,014 वोट पाकर दूसरे पायदान पर रही. दोनों ही जगह भाजपा को उसने नीचे धकेल दिया था. करैरा और सुमावली में उसे क्रमश: चालीस हजार और तीस हजार से ज्यादा वोट मिले थे और मामूली अंतर से तीसरे पायदान पर थी.

इनके अलावा ग्वालियर-चंबल की जिन 18 सीटों पर चुनाव नहीं हैं, उन पर भी बसपा को अच्छा खासा वोट मिला था. विधानसभा में जो दो सीटें उसके पास हैं, उनमें से एक ग्वालियर-चंबल की भिंड सीट भी है.

बसपा के मामले में प्रदेश में प्रचलित है कि अगर वह जीतती नहीं है तो कांग्रेस-भाजपा के जीतने वाले प्रत्याशियों का खेल बिगाड़ती है.

जिन 16 सीटों पर चुनाव हैं, 2018 में उनमें से कुल 7 सीटें ऐसी थीं जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच हार-जीत के अंतर से अधिक वोट बसपा को मिला था. तब भाजपा ने नुकसान उठाया था और संयोगवश वह 7 सीटों से ही सत्ता से दूर रह गई थी.

उस समय भाजपा को नुकसान इसलिए उठाना पड़ा था क्योंकि एट्रोसिटी एक्ट में संशोधन के चलते अंचल का दलित उससे नाराज था. वहीं, कांग्रेस को पसंद न करने वाला भाजपा समर्थक दलित बसपा की ओर चला गया था.

साथ ही, शिवराज के सवर्ण विरोधी बयान से नाराज सवर्ण जो कि भाजपा का परंपरागत वोट बैंक हैं और कांग्रेस को पसंद नहीं करता, उसने भी कई जगह बसपा पर दांव लगा दिया था.

बहरहाल, यह उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अहम है और एक-एक सीट जीतना महत्वपूर्ण है.

भाजपा की बात करें तो उसे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए नौ सीटों की जरूरत है, लेकिन जमीन पर उसे तीन प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

पहला, कांग्रेस से आए सभी दलबदलू नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं जिससे कि जनता में उनकी ‘बिकाऊ’ वाली छवि बनने से भाजपा को खतरा होने का अंदेशा है.

दूसरा, सिंधिया के दवाब में सभी सिंधिया समर्थकों को भाजपा ने टिकट तो दे दिया, लेकिन खबरों के मुताबिक पार्टी के आंतरिक सर्वे में उनमें से कई विधायकों की जीत की संभावनाएं संदिग्ध हैं.

तीसरा, सिंधिया समर्थकों को टिकट देने के कारण कई सीटों पर भाजपा का मूल कार्यकर्ता रोष में है. इन्हीं चुनौतियों के चलते भाजपा के लिए एक-एक सीट जीतना महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण हो गया है.

इसी के चलते उसने सिंधिया समर्थक 22 विधायकों के सहारे कांग्रेस की सरकार गिराने के बाद भी कांग्रेस के तीन और विधायक तोड़ लिए थे ताकि जितनी ज्यादा सीटों पर चुनाव हो, भाजपा के लिए 9 सीटें जीतने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाएं.

कांग्रेस की बात करें तो विधानसभा में उसकी सदस्य संख्या 88 है और उसे बहुमत के आंकड़े (116) तक पहुंचने के लिए सभी 28 सीटें जीतनी होंगी. गठबंधन की स्थिति में भी उसे कम से कम 21 सीटें जीतनी है.

इसलिए बसपा अगर चुनावों में उलटफेर करने में कामयाब हो जाती है तो दोनों ही दलों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है.

ग्वालियर-चंबल के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली बताते हैं, ‘बसपा मेहगांव, मुरैना, जौरा और पोहरी, इन चार सीटों पर मुकाबले में है. यहां त्रिकोणीय मुकाबला तय है. एक-दो सीटों पर कोई नया परिवर्तन हो तो बात अलग है.’

चारों सीटों का विश्लेषण करते हुए वे बताते हैं, ‘मेहगांव ओबीसी बहुल सीट है. वहां भाजपा से ठाकुर और कांग्रेस से ब्राह्मण लड़ रहे हैं. बसपा से लोधी मैदान में है. यहां जाटवों (दलित) का मानस ऐसा है कि वह भाजपा को हराने वाले को ही वोट देता है.’

वे आगे कहते हैं, ‘अगर किसी सीट पर कांग्रेस जीतती नहीं दिखती तो वह उसे वोट देता है जिसमें भाजपा को हराने की संभावना हो. अब अगर भाजपा-कांग्रेस के ब्राह्मण-ठाकुर उम्मीदवारों के खिलाफ लोधी-गुर्जर इकट्ठा होकर वोट करते हैं, तो जाटवों का वोट वहीं शिफ्ट होगा और बसपा बाजी मार सकती है.’

मुरैना सीट के संदर्भ में वे कहते हैं, ‘यहां भाजपा-कांग्रेस से गुर्जर आमने-सामने हैं. लेकिन, ब्राह्मण-बनिया यहां अधिक हैं जो गुर्जर को पसंद नहीं करते और पहले भी बसपा को जिता चुके हैं. वहीं, जौरा पर तीन बार बसपा पहले भी जीत चुकी है और 2018 में भी दूसरे नंबर पर थी. वहां ठाकुर, ब्राह्मण और बसपा के बीच मुकाबला है.’

वे आगे बताते हैं, ‘पोहरी में हालत अमूमन 2018 जैसे ही मानिए कि भाजपा-कांग्रेस से किरार-ब्राह्मण आमने-सामने हैं और बसपा से ओबीसी. तब पोहरी में बसपा 50,000 से ज्यादा वोट के साथ दूसरे नंबर पर थी और महज 7,000 वोट से हारी थी.’

कई और सीटों पर बसपा की संभावना को धक्का इसलिए भी लगा है क्योंकि कांग्रेस ने उसके मजबूत संभावित उम्मीदवारों को तोड़कर अपने चुनाव चिह्न पर मैदान में उतार दिया है.

उदाहरण के लिए, करैरा से कांग्रेस ने उन प्रागीलाल जाटव को टिकट दिया है जो पिछले दो चुनाव बसपा से लड़े थे और 2018 में 40,000 से अधिक वोट हासिल किए थे.

अंबाह में बसपा के पूर्व विधायक और पिछला चुनाव लड़े सत्यप्रकाश सखवार को भी कांग्रेस ने टिकट दिया है. सुमावली सीट पर कड़ी टक्कर देने वाले मानवेंद्र गांधी को भी कांग्रेस ने तोड़ लिया है.

तो दूसरी तरफ बसपा ने भी टिकट न मिलने के चलते बागी हुए कांग्रेसियों पर दांव लगाकर कांग्रेस के माथे पर बल डाल दिया है. भांडेर से उसने दिग्विजय सरकार में गृहमंत्री रहे महेंद्र बौद्ध और बड़ा मलहरा में पूर्व मंत्री अखंड प्रताप सिंह को टिकट दिया है.

बहरहाल बसपा, भाजपा और कांग्रेस में से किसका ज्यादा खेल बिगाड़ सकती है?

इस पर चंबल से ताल्लुक रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक लोकेंद्र सिंह कहते हैं, ‘बसपा अगर जीतती भी है तो मुश्किल से एकाध सीट ही जीत पाएगी क्योंकि उनके पास एकाध ही दमदार उम्मीदवार बचा है. जो दमदार थे, वे पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गए हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘वोट काटने की स्थिति में कांग्रेस को अधिक नुकसान हो सकता है क्योंकि कुछ इलाके ऐसे हैं जहां बसपा का प्रभाव है. जब बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो वहां एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस को चुनता है. वहीं, पिछले कुछ समय में भाजपा की जो दलित विरोधी छवि बनी है, उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में दलितों का एक हिस्सा भाजपा से छिटककर बसपा के करीब पहुंचा था. अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो वह भी कांग्रेस का ही रुख करता.’

खेल बिगाड़ने वाली बात पर देव श्रीमाली कहते हैं, ‘चंबल की 16 सीटों पर पूरा जाति का खेल है इसलिए जातीय समीकरणों के आधार पर देखें तो अलग-अलग सीट पर बसपा अलग-अलग दल को नुकसान पहुंचा सकती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘उदाहरण के तौर पर मुरैना जिले की दिमनी सीट की बात करें तो वहां बसपा प्रत्याशी ब्राह्मण है और भाजपा का भी, तो वहां वह ब्राह्मण का खेल बिगाड़ेगी. कई सीटों पर कांग्रेस का खेल इस आधार पर बिगाड़ेगी कि दलित वोटर का रुझान किधर जाता है? अगर लोगों को भ्रम हो जाए कि बसपा जीत रही है, तो कांग्रेस का दलित वोट खिसक-कर बसपा में बंट जाएगा और सीधा भाजपा को फायदा होगा.’

इस संबंध में मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा मिला-जुला जवाब देते हैं. वे कहते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में बसपा का प्रभाव है लेकिन कांग्रेस को अधिक नुकसान नहीं होगा. नुकसान होगा तो भाजपा-कांग्रेस, दोनों ही दलों को होगा. लेकिन, मतदाता समझ रहा है कि बसपा को दिया वोट भाजपा को लाभ पहुंचाएगा इस लिहाज से बसपा का वोट हमें प्रभावित करेगा इसकी उम्मीद लगभग शून्य है.’

जबकि भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘प्रतिस्पर्धा तो कांग्रेस और बसपा के बीच में है, नंबर दो लेकर. दोनों का जनाधार एक ही प्रकार का है. इसलिए बसपा द्वारा हमारा खेल बिगाड़ने का तो सवाल ही नहीं है.’

गौर करने वाली बात यह भी है कि बसपा अब तक उपचुनावों में अपने उम्मीदवार खड़ा करने से परहेज करती आई थी, लेकिन इस बार वह मैदान में है. इसलिए इसके भी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं.

जानकारों का मानना है कि जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर पिछले कुछ समय से बसपा प्रमुख मायावती के फैसले भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं, उसी कड़ी में भाजपा की शह पर ही मायावती ने उपचुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे हैं ताकि कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सके.

ग्वालियर-चंबल अंचल के सामाजिक कार्यकर्ता और ग्वालियर के आईटीएम विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष जयंत सिंह तोमर कहते हैं, ‘बसपा का उद्देश्य है कि दलित और पिछड़े वर्ग का जो थोड़ा-बहुत वोट कांग्रेस की तरफ जा रहा था, उसे अपनी ओर शिफ्ट करके भाजपा को फायदा पहुंचाए. बसपा जीतने के लिए उतर ही नहीं रही, वह कांग्रेस को हराने के लिए उतर रही है.’

वह इसका कारण भी बताते हैं, ‘बसपा का टिकट आवंटन देखिए. जौरा में बसपा के सबसे मजबूत नेता थे मनीराम धाकड़, जो पिछले चुनाव में दूसरे पायदान पर थे और उससे पहले विधायक भी रह चुके हैं लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया. अगर मनीराम को टिकट मिलता तो भाजपा-कांग्रेस को मुश्किल होती, मनीराम जीत भी सकते थे.

वे आगे कहते हैं, ‘ऐसे ही दिमनी में एक गुर्जर को टिकट दिया है जबकि वहां गुर्जर वोट बैंक महज आठ-दस हजार है. उसमें बसपा का 14 हजार बहुजन मत भी जोड़ लें तो भी संख्या 24 हजार होती है जिसमें जीत संभव नहीं. तो निष्कर्ष यही निकलता है कि बसपा, कांग्रेस का वोट अपनी तरफ शिफ्ट करने के लिए मैदान में है.’

लोकेंद्र भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाली बात से इत्तेफाक रखते हैं लेकिन कारण दूसरा बताते हैं. वे कहते हैं, ‘बसपा उपचुनाव नहीं लड़ती. फिर भी इस बार मैदान में उतरी है तो इसलिए ही कि कांग्रेस को लाभ न मिल सके क्योंकि जिस तरह राजस्थान में कांग्रेस ने बसपा विधायकों और मध्य प्रदेश में उसके मजबूत नेताओं को तोड़ा, उससे मायावती चिढ़ी हुई हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘तभी तो सबसे पहले टिकट फाइनल करने वाली बसपा का चुनाव प्रचार कहीं दिख नहीं रहा है. संगठन गायब है. जबकि भाजपा-कांग्रेस जमीन से लेकर डिजिटल माध्यम तक सक्रिय हैं. अब उम्मीदवार व्यक्तिगत स्तर पर कैसे बसपा को जीत दिलाएगा, समझना मुश्किल है. समझ यही आता है कि बसपा जीतना ही नहीं चाहती है, बस नुकसान पहुंचाना चाहती है.’

बसपा के उपचुनाव लड़ने के पीछे भाजपा का हाथ होने की बात पर रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘बसपा चुनावी मैदान में है. पूरी ताकत से लड़ रही है. हमारी खिलाफत कर रही है, तो हमारी खिलाफत करने वाली हमारी ‘बी’ टीम होगी क्या? उल्टा, बसपा तो कमलनाथ सरकार के साथ गठबंधन में थी और उसे ‘बी’ टीम हमारी बता रहे हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘अमूमन बसपा उपचुनाव नहीं लड़ती लेकिन पिछले दिनों कांग्रेसी नेताओं की बगावत के बाद कांग्रेस का जनाधार खिसकने से बसपा मजबूत हुई है. ऊपर से राजस्थान के प्रकरण के बाद मायावती नाराज हैं और उनकी कांग्रेस से ठन गई है तो बसपा का कार्यकर्ता कांग्रेस से बदला लेने की ताक में बैठा है. सीधी-सी बात है कि इसलिए उसने उपचुनाव लड़ने का फैसला किया है.’

हालांकि बसपा के मैदान में उतरने के पीछे एक कारण यह भी माना जा रहा है कि उसके प्रभाव क्षेत्र वाले अंचल की करीब आधी सीटों पर चुनाव है.

अगर वह मैदान में नहीं उतरती तो उसका कट्टर समर्थक मतदाता, जो हमेशा उसे वोट करता है, कहीं तो वोट डालेगा. वह भाजपा को पसंद नहीं करता, इसलिए बसपा की गैर मौजूदगी में कांग्रेस की ओर जाएगा.

बसपा को डर है कि कहीं वह हमेशा के लिए कांग्रेस की तरफ शिफ्ट न हो जाए. इसलिए वह एक डमी की तरह अपने वोट बैंक को बचाए रखने के लिए मैदान में उतर आई है.

बसपा के चुनावी इरादों और रणनीति पर बात करने के लिए बसपा प्रदेशाध्यक्ष रमाकांत पिप्पल से बात करने के प्रयास किए गए, लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)