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धर्म परिवर्तन रोकने के लिए झारखंड सरकार ने विधेयक को मंज़ूरी दी

विधेयक के अनुसार जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने का दोषी पाए जाने पर 3 साल की सज़ा और 50 हज़ार रुपये का ज़ुर्माना देना होगा.

झारखंड मुख्यमंत्री रघुवर दास (फोटो: रघुवर दास की फेसबुक वाल से)

झारखंड मुख्यमंत्री रघुबर दास (फोटो: रघुबर दास की फेसबुक वाल से)

झारखंड में मंगलवार को मुख्यमंत्री रघुबर दास के मंत्रिमंडल ने धर्मांतरण विधेयक-2017 को मंजूरी दे दी है. विधयेक के अनुसार बलपूर्वक या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति या संस्था पर क़ानूनी कार्रवाई होगी.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार सरकार के इस कदम की विपक्ष, धार्मिक संगठनों और आदिवासी कार्यकर्ताओं ने आलोचना की है. झारखंड विधानसभा में 8 अगस्त से शुरू होने वाले मानसून सत्र में इस विधेयक को सदन में पेश किया जाएगा.

बिल ड्राफ्ट के अनुसार दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान है. जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करने के जुर्म में दोषी पाए गए व्यक्ति को 3 साल की सजा और 50 हजार रुपये जुर्माना देना होगा.

अपनी मर्ज़ी से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को स्थानीय उप आयुक्त/कलेक्टर को धर्म परिवर्तन की सूचना और स्थान बताना होगा और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान दिया गया है. कैबिनेट के निर्णय के अनुसार अगर नाबालिग, आदिवासी, अनुसूचित जाति या महिला के खिलाफ जबरन धर्म परिवर्तन का मामला पाया जाता है, तो अपराधी को चार साल तक कारावास और एक लाख रुपये का जुर्माना होगा.

मानसून सत्र में अगर यह विधेयक पास हो गया तो, झारखंड छठा राज्य होगा जहां इस तरह का क़ानून होगा. इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में यह क़ानून पहले से ही है.

झारखंड राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या 26 प्रतिशत है. आदिवासियों में 39 प्रतिशत लोग हिंदू धर्म मानते हैं और 14 प्रतिशत ईसाई धर्म के मानने वाले हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या में 29 प्रतिशत, इस्लाम धर्म के मानने वालों की संख्या में 28.4 प्रतिशत और हिंदू धर्म के मानने वालों की संख्या में 21 प्रतिशत इज़ाफा हुआ है.

सरकार के इस फैसले पर विपक्ष ने कड़ी आलोचना की है. कांग्रेस सचिव आदित्य विक्रम जायसवाल का कहना है कि भाजपा आदिवासियों पर आरएसएस की विचारधारा थोपना चाहती है. यह सिर्फ फूट डालकर राज करने का प्रयास है.

आदिवासी संगठन आदिवासी बुद्धिजीवी मंच (एबीएम) के अध्यक्ष प्रेम चंद मुर्मु का कहना है ‘भाजपा की नियत साफ़ नहीं है. वह आने वाले चुनाव से पहले आदिवासियों में फूट डालकर अपना राजनीतिक एजेंडा साधना चाहती है.

मुर्मु आगे कहते हैं ‘धर्मपरिवर्तन व्यक्ति की खुद की मर्ज़ी से होता है. धर्मपरिवर्तन करने से जाति परिवर्तन नहीं होता. आरक्षण जाति के आधार पर है न कि धर्म के आधार पर. भाजपा इसको जाति से जोड़ना चाहती है, जिसका हम विरोध करते हैं और इस कानून को लेकर हम विरोध करेंगे.

विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य का कहना है कि भाजपा का यह प्रयास आदिवासियों में फूट डालेगा, जो कि देश की सेक्युलर विचारधारा के खिलाफ है और देश के लिए ख़तरा है. बिल का विरोध करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाने की बात सुप्रियो ने कही है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार भारतीय जनता पार्टी राज्य में पहले से ही इस तरह के क़ानून की मांग करती आ रही है. 6 महीने पहले पुलामा में पार्टी की राज्य कार्यकारिणी परिषद की बैठक में इस क़ानून की मांग उठी थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री रघुबर दास ने अधिकारियों को कहा था कि इस क़ानून के लिए बिल ड्राफ्ट तैयार किया जाए.

झारखंड भाजपा के महासचिव दीपक प्रकाश ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है. वे कहते हैं, ‘जबरन और लालच देकर बहुत सारे भोले-भाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवा दिया गया है. नतीजन आदिवासी अपनी परंपरा की जड़ों से अलग होते जा रहे हैं. इस तरह की घटना रुकनी चाहिए.’

आर्च बिशप रांची के कार्यालय ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है. उन्होंने कहा है कि वे अब तक इसके विवरण में नहीं गए हैं. हालांकि सूत्रों ने दावा किया कि अगर इसे पारित किया जाता है, तो दक्षिणपंथी संगठनों को ही परेशानी होगी, क्योंकि वे सरना अनुयायियों (जो अपने स्वयं के पारंपरिक धर्म का पालन करते हैं) का चित्रण कर उन्हें हिंदू बताते हैं.

सरना कमेटी ने सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि वो लंबे समय से इस क़ानून की मांग कर रहे थे. वे कहते हैं ‘हमने सरकार के पास इस क़ानून की लेकर याचिका भी दायर की थी. हम इस कदम का स्वागत करते हैं, लेकिन अभी हमे इसका अध्ययन करना होगा. धर्म परिवर्तन रोकने के लिए क़ानून के अलावा हमारी मांग है कि सरना अनुयायियों को अलग धर्म की पहचान मिले. हमें अन्य धर्म के भीतर न रखा जाए.’

सरना कमेटी ने यह भी मांग रखी है कि ईसाई आदिवासियों को मिलने वाले लाभ पर भी सरकार को रोक लगाना चाहिए. दरअसल वे अल्पसंख्यक होने के साथ-साथ आदिवासी होने का भी लाभ ले रहे हैं.

भाजपा का आरोप रहा है कि चर्च और ईसाई मिशनरी लालच देकर धर्म परिवर्तन करने का काम करती है. ईसाई संगठनों ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वो ग़ैर हिंदू आदिवासियों को जबरन हिंदू धर्म में लाने का प्रयास कर रहे हैं.