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न्यायपालिका को अवमानना सुनवाई पर कीमती समय बर्बाद नहीं करना चाहिए: बॉम्बे हाईकोर्ट

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के ख़िलाफ़ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे ने कहा कि आलोचना के लिए न्यायपालिका को तैयार होना चाहिए, क्योंकि अवमानना की सुनवाइयों में कीमती न्यायिक समय बर्बाद होता है और ज़रूरी मुद्दे नहीं सुने जाते.

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस शिंदे ने मंगलवार को कहा कि न्यायपालिका को अवमानना सुनवाई पर कीमती समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, जिसका इस्तेमाल कानून के महत्वपूर्ण सवालों को सुनने के लिए किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि अदालतों और न्यायाधीशों को जनता की आलोचना के लिए खुला होना चाहिए.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘अदालती शक्तियों का उपयोग केवल एक अंतिम उपाय और हथियार के रूप में किया जाना चाहिए और अदालतों या न्यायाधीशों की आलोचना करने वाले व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.’

जस्टिस शिंदे ने कहा, ‘आलोचना के लिए न्यायपालिका को तैयार होना चाहिए. अवमानना आखिरी रास्ता है. यह मेरी निजी राय है, क्योंकि अवमानना की सुनवाइयों में कीमती न्यायिक समय बर्बाद होता है और महत्वपूर्ण मामलों और जरूरी मुद्दे नहीं सुने जाते.’

जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कार्णिक की पीठ ने नवी मुंबई के निवासी सुनैना होले (38) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही.

अदालत सुनैना द्वारा दायर याचिका पर आखिरी दलीलें सुन रही थी, जिसमें उनके खिलाफ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र तथा मंत्री आदित्य ठाकरे के खिलाफ ट्वीट को लेकर मामला दर्ज किया गया है.

मुंबई पुलिस ने सुनैना होले के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की थी और सुनैना ने उसे खारिज करने का अनुरोध करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है.

जब बेंच ने कहा कि सत्ता में रहने वाले व्यक्तियों को आलोचना को सहन करना सीखना चाहिए तब होले की ओर से पेश होते हुए डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ सरकारी अधिकारियों के खिलाफ राय व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर बहस कर रहे थे.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे का न्यायपालिका तक विस्तार करते हुए, जस्टिस शिंदे ने कहा कि अदालतों को भी अपने खिलाफ आलोचनात्मक राय और बयानों को लेना सीखना चाहिए.

उन्होंने कहा कि संसद के पास न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग चलाने की विशेष शक्ति है, क्या उन्हें न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए?

उन्होंने कहा, ‘हालांकि, अगर समाज का कोई व्यक्ति किसी न्यायाधीश की आलोचना करते हुए टिप्पणी करता है, तो ऐसी आलोचना की अनुमति दी जानी चाहिए.’

चंद्रचूड़ ने दावा किया कि जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है उन पर लोगों का अधिक ध्यान जाता है.

इस दौरान उन्होंने कॉमेडियन कुणाल कामरा के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का एक उदाहरण दिया जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अदालत की अवमानना लंबित है.

मामले के तथ्यों को सामने रखते हुए चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी व्यक्ति की राय की व्याख्या अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से की जा सकती है.

उन्होंने कहा कि सुनैना होले केवल एक अपमानजनक उपसंहार का उपयोग करके अपनी राय व्यक्त करने की कोशिश कर रही थीं जो केवल भावना की अभिव्यक्ति थी और कुछ आपत्तिजनक नहीं था.

उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा, ‘एक व्यक्ति की अश्लीलता दूसरे का गीत है, जिसका मतलब है कि जो एक व्यक्ति को आपत्तिजनक लग रहा है, दूसरे को वैसा नहीं लग सकता है.’

चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस की कार्रवाइयों में एक दुर्भावना थी, क्योंकि वे कुछ विचारधाराओं और मान्यताओं वाली होले को निशाना बना रहे थे.

हालांकि, अदालत ने इस ओर भी इशारा किया कि परिपक्व लोकतंत्रों में भी पूरी स्वतंत्रता (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) नहीं है.

जस्टिस शिंदे ने कहा, ‘मुझे मौलिक अधिकार उपयोग करने का अधिकार है, हालांकि उस अधिकार का प्रयोग करते समय मुझे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मेरे भाई के अधिकार का उल्लंघन न हो. कई मामलों में ऐसा नहीं हो रहा है. और फिर वे अनुच्छेद 19 (भारत के संविधान के तहत) आते हैं.’

मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर को होगी.

बता दें कि इस साल जुलाई महीने में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए मुंबई और पालघर पुलिस ने सुनैना के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

सुनैना ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अंतरिम सुरक्षा और अपने खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर और आरोपों को रद्द करने की मांग की थी.

मुंबई और पालघर पुलिस ने उनके खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज की थी. युवा सेना के सदस्य रोहन चव्हाण सहित कई लोगों ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी.

सुनैना पर आईपीसी और आईटी एक्ट की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था. अदालत ने 30 अक्टूबर को सुनैना को पुलिस के समक्ष पेश होने और जांच में सहयोग देने को कहा था.