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होम्योपैथी डॉक्टर कोविड के लिए इम्युनिटी बूस्टर दे सकते हैं, इलाज का दावा नहीं कर सकते: अदालत

बीते अगस्त में केरल हाईकोर्ट ने होम्योपैथी डॉक्टरों को कोविड-19 के इलाज के लिए दवा लिखने और उसका विज्ञापन करने से मना कर दिया था. इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसने कहा कि होम्योपैथी प्रैक्टिशनर को कोविड-19 के इलाज में आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देशों का पालन करना होगा.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देशों की पुष्टि करते हुए बीते मंगलवार को कहा कि होम्योपैथी पद्धति के संस्थागत योग्यता प्राप्त चिकित्सक कोविड-19 का प्रभाव कम करने और इम्युनिटी के लिए मरीजों को दवा दे सकते हैं, लेकिन वह यह दावा नहीं कर सकता है कि ये दवाएं कोरोना वायरस का इलाज हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने केरल हाईकोर्ट द्वारा इस बारे में दिए गए फैसले को बरकरार रखा, हालांकि उन्होंने आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत डॉक्टरों द्वारा दिशानिर्देशों के उल्लंघन और होम्योपैथी को विज्ञापन में उपचार बताने को स्वीकृति नहीं दी.

अपने फैसले में पीठ ने कहा कि होम्योपैथी का उपयोग कोविड-19 की रोकथाम और इसे हल्का करने के लिए किया जाएगा और यही आयुष मंत्रालय के परामर्श और दिशानिर्देशों से पता चलता है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कानूनी विनियम ही विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाते हैं तो होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सकों को यह प्रचारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि वे कोविड-19 बीमारी का इलाज करने में सक्षम हैं.

कोर्ट में डॉक्टर एकेबी सद्भावना मिशन स्कूल ऑफ होम्यो फार्मेसी की ओर से अपील दाखिल की गई थी और केरल हाईकोर्ट द्वारा 21 अगस्त के फैसले को चुनौती दी गई थी.

हाईकोर्ट ने होम्योपैथी के डॉक्टर को कोविड 19 के इलाज के लिए दवा लिखने और उसके लिए विज्ञापन करने से मना कर दिया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि आयुष के प्रैक्टिशनर इलाज के लिए दवा नहीं देंगे, बल्कि वह इम्युनिटी बूस्टर देंगे.

याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि आयुष मंत्रालय के परामर्श के तहत होम्योपैथी प्रैक्टिशनर को इलाज की इजाजत दी जाए. हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी जवाब मांगा था.

केंद्र द्वारा दिए गए हलफनामे में मंत्रालय द्वारा कहा गया कि होम्योपैथी प्रैक्टिशनर द्वारा निर्दिष्ट होम्योपैथिक दवाओं को कोविड-19 के लिए ‘ऐड-ऑन उपचार’ के रूप में निर्धारित किया जा सकता है, लेकिन उसे इसका इलाज नहीं कहा जा सकता.

अब शीर्ष अदालत ने कहा कि होम्योपैथी चिकित्सकों को आयुष मंत्रालय द्वारा छह मार्च को जारी परामर्श और कोविड-19 के बारे में आयुष मंत्रालय के दिशा निर्देशों का पालन करना होगा.

नवभारत टाइम्स के मुताबिक, आयुष मंत्रालय ने अपने परामर्श में होम्योपैथी के डॉक्टरों को इम्युनिटी बढ़ाने के लिए दवा देने की इजाजत दी थी.

मंत्रालय ने अपने परामर्श में कहा था कि होम्योपैथी की दवा खाली पेट तीन दिन लेनी है और एक महीने बाद इसे दोहराना है. ये दवाई इम्युनिटी बढ़ाने के लिए दी जानी है.

पीठ ने कहा कि मंत्रालय का जो परामर्श है उससे साफ है कि होम्योपैथी प्रैक्टिशनर अपनी दवाई को इम्युनिटी बूस्टर तक ही सीमित रखेंगे. विज्ञापन के जरिये कोविड-19 रोकने की बात नहीं कही जा सकती है क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता.

साथ ही पीठ ने यह भी कहा कि होम्योपैथी के जरिये कोविड-19 रोकने की बात नहीं की जा सकती है. दुनियाभर में टीका के लिए रिसर्च जारी है ऐसे में ये बातें नहीं हो सकती कि उसे दवाई के जरिये अभी रोका जा सकता है. ऐसे में होम्योपैथी के प्रैक्टिशनर को कोविड के इलाज में आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देशों का पालन करना होगा.

पीठ ने कहा कि केरल उच्च न्यायालय ने 21 अगस्त के अपने फैसले में छह मार्च के दिशा निर्देशों को पूरी तरह से नहीं समझा और दिशानिर्देशों पर सीमित दृष्टिकोण अपनाते हुए होम्योपैथी चिकित्सकों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के बारे में टिप्पणी की जिसे मंजूर नहीं किया जा सकता.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)