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चंद्रकांत देवताले की कविताएं इंसानी तमीज़ की कविताएं हैं

भक्तिकालीन कवियों के बारे में कहा जाता है कि उनकी कविताएं कालजयी इसीलिए हो पाईं क्योंकि वे जीवन के प्राथमिक सच प्यार और मौत के बारे में बात करती हैं. यह आप देवताले की भी कविताओं में देख सकते हैं.

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चंद्रकांत देवताले. (फोटो साभार: साहित्य अकादमी)

हिंदी भाषा के यशस्वी कवि चंद्रकांत देवताले का चौदह अगस्त को निधन हो गया. वे लगभग इक्यासी बरस के थे. इक्यासी बरस की यह अवस्था एक भरपूर अवस्था कही जा सकती है. इस जीवन में उन्होंने हिंदी कविता के चित्त को बदल देने वाली कविताएं लिखीं. ऐसे कवि का होना भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण बात थी.

7 नवंबर, 1936 को मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में जन्मे चंद्रकांत देवताले अपनी कविता की सघन बुनावट और उसमें निहित राजनीतिक संवेदना के लिए जाने जाते रहेंगे. उन्होंने अपनी कविता की कच्ची सामग्री मनुष्य के सुख दुःख, विशेषकर औरतों और बच्चों की दुनिया से इकट्ठी की थे.

चूंकि बैतूल में हिंदी और मराठी बोली जाती है, इसलिए उनके काव्य संसार में यह दोनों भाषाएं जीवित थीं. मध्य भारत का वह हिस्सा जो महाराष्ट्र से छूता है, उसमें मराठी भाषा पहली या दूसरी भाषा के रूप में बोली जाती रही है. बैतूल भी ऐसी ही जगह है. अपने प्रिय कवि मुक्तिबोध की तरह देवताले मराठी से आंगन की भाषा की तरह बरताव करते थे. यह उनकी कविताओं में बार-बार देखा जा सकता है.

देवताले इंदौर में रहे और इंदौर को अपनी सार्वदेशिकता (कास्मोपोलिटिनिज़म) के कारण मध्य भारत का मुंबई कहा जाता है. यह सार्वदेशिकता उनकी कविताएं भी बयान करती हैं. देवताले काफी पढ़े लिखे इंसान थे. उन्होंने कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर पीएचडी की थी और इंदौर के एक कॉलेज में पढ़ाते थे. उन्हें ढेर सारे पुरस्कार मिले थे जिसमें अंतिम महत्वपूर्ण पुरस्कार 2012 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार था. यह उनके कविता संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूं’ के लिए दिया गया था.

देवताले का रचना समय आज़ाद भारत का रचना समय है. उन्होंने हिंदी कविता के पिछले छह दशकों को अपनी रचनाधर्मिता से आलोकित किया. उन्होंने दर्जन भर कविता-संग्रह और आलोचना की एक किताब लिखी. मराठी भाषा से अनुराग उन्हें मराठी भक्ति कविता और दिलीप चित्रे की कविताओं की ओर ले गया.

दिलीप चित्रे की कविताओं का उनका अनुवाद ‘पिसाटी का बुर्ज़’ नाम से प्रकाशित है. उनके कविता संग्रह हैं: हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), दीवारों पर खून से (1975), लकड़बग्घा हंस रहा है (1980), रोशनी के मैदान की तरफ (1982), भूखंड तप रहा है (1982), आग हर चीज़ में बताई गई थी (1987), बदला बेहद महंगा सौदा (1995), पत्थर की बेंच (1996), उसके सपने (1997), इतनी पत्थर रोशनी (2002), उजाड़ में संग्रहालय (2003), जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा (2008), पत्थर फेंक रहा हूं (2011).

चंद्रकांत देवताले के बारे में मैंने सबसे पहले बीए की कक्षाओं में जाना था. पाठ्यक्रम की सीमा और सौंदर्य दृष्टि होती है. जिस यूनिवर्सिटी में मैं पढ़ता था उसकी भी अपनी सौंदर्य दृष्टि थी. वे उसके पाठ्यक्रम में नहीं थे. लेकिन जब अपने एक अध्यापक डाक्टर परेश पांडेय के घर से चुराई गई एक पत्रिका में उनकी दो या तीन कविताएं पढ़ीं तो लगा कि यह सरल लेकिन महत्वपूर्ण कवि है.

तब मैं मुक्तिबोध से बहुत घबराता था. इसलिए भी उनकी कविताएं अच्छी लगी थीं. यह सन 2000 की बातें हैं. तब एक छोटे से कस्बे की एक लाइब्रेरी में देवताले की कविताएं मिल जाती थीं. लाइब्रेरी सरकारी थी और किताबों को कीड़े से बचाने के लिए गैमेक्सीन छिड़क दी जाती थी.

किताबें खोजते समय इसकी गंध से सिर चकराने लगता था. यह लाइब्रेरी फ़ैज़ाबाद की डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी थी. उसमें कविता की किताब- वह भी चंद्रकांत देवताले की किताब- मिलना सुकूनदायक बात होती थी.

तो कहने का मतलब है कि चंद्रकांत देवताले की कविताओं की भौगोलिक व्याप्ति काफी थी और उसको पढ़ने वालों का एक व्यापक संसार था. मैं एक व्यक्तिगत अनुभव साझा करता हूं. यह सन 2008 की बात है. वाणी प्रकाशन और वाक् पत्रिका एक तथाकथित टैलेंट हंट आयोजित करती थी. इसमें विश्वविद्यालयों में ‘कवियों में प्रतिभा’ या ‘प्रतिभाशाली’ कवियों की खोज की जाती थी.

ऐसा ही एक टैलेंट हंट इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित हुआ था. सभी नौजवान और ‘प्रतिभाशाली’ कवियों ने कविताएं सुनानी शुरू कीं और कुछ कवियों ने मां पर भी कविताएं सुनाईं. इस टैलेंट हंट की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्द कथाकार और कथा पत्रिका के संपादक मार्कन्डेय जी ने अंत में बहुत ही आहिस्ते से कहा कि क्या आप लोगों ने चंद्रकांत देवताले की कविता ‘मां पर नहीं लिख सकता कविता’ पढ़ी है? तुम नौजवानों को वह कविता पढ़ लेनी चाहिए. कुछ दिन बाद, शायद जनवरी 2009 में वह कविता मिल गई…

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए

देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे

और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है

चंद्रमा को गिटार में बदला है

समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया

सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा

मां पर नहीं लिख सकता कविता!

मुझे उस दिन लगा कि किसी कवि को मां पर कविता तो बाद में लिखना चाहिए, पहले उसे कायदे का इंसान बनने की तमीज़ तो आनी चाहिए. देवताले की कविताएं इंसानी तमीज़ की कविताएं हैं.

जीवन बहुत छोटी-छोटी चीज़ों से बनता है और शायद कविता भी. यह बात वे सभी कवि जानते हैं जिनकी कविता लोगों की याददाश्त में बाक़ी बची रह जाती हैं. वे अपने नितांत घरेलूपन में बड़ी कविताएं हो सकती हैं.

वे बेटी के विदा दृश्य की कविताएं हो सकती हैं तो प्रेमी हृदय को दिलासा दिलाती हैं कि – आता रहूंगा तुम्हारे लिए. उनके लिए और किसी के लिए भी बेटी के घर से लौटना कठिन काम है: बहुत ज़रूरी है पहुंचना/सामान बांधते बमुश्किल कहते पिता/बेटी जिद करती/एक दिन और रुक जाओ न पापा/एक दिन/पिता के वजूद को/जैसे आसमान में चाटती/कोई सूखी खुरदरी जुबान/बाहर हंसते हुए कहते-कितने दिन तो हुए/सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ /सदियों से बेटियां रोकती होंगी पिता को/एक दिन और /और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज.

भक्तिकालीन कवियों के बारे में कहा जाता है कि उनकी कविताएं कालजयी इसीलिए हो पाईं क्योंकि वे जीवन के प्राथमिक सच प्यार और मौत के बारे में बात करती हैं. यह आप देवताले की कविताओं में देख सकते हैं. वे इस सच में हमारे युग के सच की राजनीति को भी रेशा-रेशा उधेड़ते चलते हैं…

हवा में अजीब-सी गंध है

और डोमों की चिता

अभी भी दहक रही है

वे कह रहे हैं

एक माह तक मुफ्त राशन

मृतकों के परिवार को

और लकड़बग्‍घा हंस रहा है…

इस कविता को चाहे आप 2017 में पढ़ें या 2027 में, आपको लकड़बग्‍घा हंसता दिखाई पड़ेगा.

महान कविताएं इसी प्रकार समय की देहरी लांघ जाती हैं. वे भविष्य में काम आती हैं. देवताले अपने समय और भविष्य के कवि थे.