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रेप के आरोपी से शादी के बयान पर नारीवादियों व महिला समूहों ने सीजेआई का इस्तीफ़ा मांगा

चार हज़ार से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, प्रगतिशील समूहों और नागरिकों ने सीजेआई एसए बोबडे से पद छोड़ने की मांग करते हुए कहा कि उनके शब्द अदालत की गरिमा पर दाग़ लगा रहे हैं और उस चुप्पी को बढ़ावा दे रहे हैं जिसे तोड़ने के लिए महिलाओं ने कई दशकों तक संघर्ष किया है.

सीजेआई एसए बोबडे. (फोटो साभार: एएनआई)

सीजेआई एसए बोबडे. (फोटो साभार: एएनआई)

नई दिल्ली: सीजेआई शरद अरविंद बोबडे को एक पत्र (ओपन लेटर) लिखते हुए चार हजार से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, प्रगतिशील समूह और नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट में उनके द्वारा ‘नाबालिग से बलात्कार के आरोपी युवक से पीड़िता से विवाह करने‘ की बात पूछने और मैरिटल रेप को सही ठहराने को लेकर उनसे पद छोड़ने की मांग की है.

1 मार्च को एक नाबालिग से बलात्कार के आरोपी महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारी मोहित सुभाष चव्हाण की जमानत की अपील सुनते हुए सीजेआई बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने उससे पूछा था, ‘क्या तुम उससे (लड़की से) शादी करना चाहते हो. अगर तुम शादी करने को इच्छुक हो तो हम इस पर विचार कर सकते हैं अन्यथा तुम्हारी नौकरी जाएगी और तुम्हें जेल जाना होगा. तुमने उसे फुसलाया और बलात्कार किया.’

साथ ही पीठ ने जोड़ा था, ‘हम शादी के लिए दबाव नहीं डाल रहे. हमें बताओ तुम क्या चाहते हो. वरना तुम्हें लगेगा कि हम तुम पर शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं.’

इस बयान, जो ऐसा दिखाता है कि अगर किसी नाबालिग से बलात्कार के बाद बलात्कारी उससे शादी कर लेता है, तो यह ठीक है, को लेकर कड़ा विरोध हुआ. कार्यकर्ताओं ने अपने पत्र में लिखा है, ‘हम भीतर से इस बात के लिए आहत महसूस कर रहे हैं कि -हम औरतों को आज हमारे मुख्य न्यायाधीश को समझा पड़ रहा है कि आकर्षण, बलात्कार और शादी के बीच के अंतर होता है. वह मुख्य न्यायाधीश जिन पर भारत के संविधान की व्याख्या कर के लोगों न्याय दिलाने की ताकत और ज़िम्मेदारी है.’

पत्र पर दस्तखत करने वाले लोगों ने यह भी कहा, ‘बहुत हो चुका. आपके शब्द न्यायालय की गरिमा और अधिकार पर लांछन लगा रहे हैं. वहीं मुख्य न्यायाधीश के रूप में आपकी उपस्थिति देश की हर महिला के लिए एक ख़तरा है. इससे युवा लड़कियों को यह संदेश मिलता है कि उनकी गरिमा और आत्मनिर्भरता का कोई मूल्य है. मुख्य न्यायालय की ऊंचाइयों  से बाकी न्यायालयों और तमाम न्याय पालिकाओं को यह संदेश जाता है कि इस देश में न्याय महिलाओं का संवैधानिक अधिकार नहीं है. इससे आप उस चुप्पी को बढ़ावा दे रहे हैं जिसको तोड़ने के लिए महिलाओं और लड़कियों ने कई दशकों तक संघर्ष किया है.’

इस पत्र पर कई जानी-मानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें एनी राजा, मरियम धवले, कविता कृष्णन, कमला भसीन, मीरा संघमित्रा, अरुंधति धुरु आदि शामिल हैं. इसके साथ ही महिला संगठन- ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमेंस एसोसिएशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन, विमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन, फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ विमेन, बेबाक कलेक्टिव, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, दलित विमेंस फाइट, बासो, THITS, विमेन एंड ट्रांसजेंडर आर्गेनाईजेशन जॉइंट एक्शन कमेटी आदि और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले सचेत नागरिक जैसे एडमिरल रामदास, अरुणा रॉय, निखिल डे, आनंद सहाय, देवकी जैन, जॉन दयाल, लक्ष्मी मूर्ति, अपूर्वानंद, फराह नकवी, आएशा किदवई आदि शामिल हैं.

पूरा पत्र नीचे पढ़ सकते हैं.

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श्री शरद अरविंद बोबडे,

हम, भारत के तमाम नारीवादी आंदोलनों और सचेत नागरिकों की तरफ से, मोहित सुभाष चव्हाण बनाम महाराष्ट्र सरकार और अन्य की 1 मार्च 2021 को हुई सुनवाई के दौरान आपके द्वारा की गई गई टिप्पणियों पर हम अपना क्षोभ और क्रोध व्यक्त करना चाहते हैं.

आप एक ऐसे आदमी की गिरफ़्तारी के खिलाफ याचिका सुन रहे थे, जिस पर एक नाबालिग लड़की का पीछा करने, हाथ और मुंह बांधकर उसका बार-बार बलात्कार करने का आरोप है. साथ ही उसको पेट्रोल से जलाने, तेज़ाब फेंकने और उसके भाई की हत्या की धमकी देने का भी आरोप है.

सच तो यह है कि यह मामला सामने तब आया जब स्कूल में पढ़ने वाली इस नाबालिग पीड़िता ने आत्महत्या करने की कोशिश की. सुनवाई के दौरान आपने इस आदमी से पूछा कि क्या वह पीड़िता से शादी करने के लिए राज़ी है, और साथ ही यह भी कहा कि उसे किसी लड़की को आकर्षित करके उसका बलात्कार करने से पहले उसके परिणामों के बारे में सोचना चाहिए था.

मुख्य न्यायाधीश साहब, मगर क्या आपने यह सोचा कि ऐसा करने से आप पीड़िता को उम्र भर के बलात्कार की सजा सुना रहे हैं? उसी ज़ुल्मी के साथ जिसने उसको आत्महत्या करने के लिए बाध्य किया?

हम भीतर से इस बात के लिए आहत महसूस कर रहे हैं कि हम औरतों को आज हमारे मुख्य न्यायाधीश को समझा पड़ रहा है कि आकर्षण, बलात्कार और शादी के बीच के अंतर होता है. वह मुख्य न्यायाधीश जिन पर भारत के संविधान की व्याख्या कर के लोगों न्याय दिलाने की ताकत और ज़िम्मेदारी है.

बोबडे जी, आकर्षण का मतलब है जहां दोनों भागीदारों की सहमति हो. बलात्कार उस सहमति का, और एक व्यक्ति की शारीरिक मर्यादा का उल्लंघन है, जिसका मतलब हिंसा होता है. किसी भी हाल में दोनों को एक समान नहीं समझा जा सकता.

एक दूसरे मामले में (विनय प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) भी आपने पूछा, यदि कोई पति-पत्नी की तरह रह रहे हों, तो पति क्रूर हो सकता है लेकिन क्या किसी शादीशुदा जोड़े के बीच हुए संभोग को बलात्कार का नाम दिया जा सकता हैं?

इस टिप्पणी से न सिर्फ पति के यौनिक, शारीरिक और मानसिक हिंसा को वैधता मिलती है, पर साथ ही औरतों पर हो रहे सालों के अत्याचार और उसके लिए न्याय न मिलने की प्रक्रिया को भी एक सामान्य बात होने का दर्जा मिल जाता है.

मुंबई हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट द्वारा मोहित सुभाष चव्हाण को दिए गए जमानत आदेश की निंदा करते हुए कहा कि ‘न्यायाधीश का यह नज़रिया, ऐसे गंभीर मामलों में उनकी संवेदनशीलता के अभाव को साफ-साफ दर्शाता है.’ यही बात आप पर भी लागू होती है, हालांकि उसका स्तर और बड़ा है.

एक नाबालिग के साथ बलात्कार के अपराध को आपने जब शादी के प्रस्ताव के एक ‘सौहार्दपूर्ण समाधान’ की तरह पेश किया, तब यह न केवल घृणात्मक और संवेदनहीन था- यह पूरी तरह से भयावह और पीड़िता को न्याय मिलने के सारे दरवाज़े बंद कर देने जैसा था.

भारत में औरतों को तमाम सत्ताधारी लोगों की पितृसत्तात्मक सोच से जूझना पड़ता है, फिर चाहे वो पुलिस अधिकारी या न्यायाधीश ही क्यों न हो- जो बलात्कारी के साथ समझौता करने वाले समाधान का सुझाव देते हैं.

लेकिन ऐसे समझौते की सच्चाई तब समझ आती है जब अनेक निर्णयों में यह लिखा जाता है कि कैसे बलात्कारी के साथ ऐसे समझौते को नकारने के कारण पीड़िता या उसके किसी रिश्तेदार ने आत्महत्या कर ली या उनका कत्ल किया गया.’ (‘It is Not the Job of Courts to Arrange ‘Compromise Marriages’ of Rape Survivors’, The Wire, 26 June 2015)

हम साक्षी थे जब आपके पूववर्ती ने उन पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप की खुद सुनवाई की और खुद ही फैसला सुना दिया और उन पर लगे आरोपों को झूठा करार कर फरियादी और उसके परिवार पर मुख्य न्यायालय के पद का अपमान करने और चरित्र हनन करने का आरोप लगाया गया. तब उसकी निष्पक्ष सुनवाई या एक जांच न करके आप भी उस गुनाह में भागीदार बने.

एक दूसरे मामले में, जब एक बलात्कार के आरोपी को अपराधमुक्त के ख़िलाफ़ याचिका को आपने यह कहकर रद्द कर दिया कि औरत के ‘धीमे स्वर में न का मतलब हां होता है.’ आपने पूछा कि औरत किसानों को आंदोलन में क्यों ‘रखा’ जा रहा है और उनको ‘वापस घर भिजवाने’ की बात की- इसका मतलब यह हुआ कि औरतों की अपनी स्वायत्तता और व्यक्तित्व नहीं है, जैसा मर्दों का होता हैं.

और फिर कल आपने कह दिया की एक पति के द्वारा अपने पत्नी पर किए जाने वाले शोषण को बलात्कार नहीं माना जा सकता है.

बहुत हुआ. आपके शब्द न्यायालय की गरिमा और अधिकार पर दाग लगा रहे हैं. वहीं मुख्य न्यायाधीश के रूप में आपकी उपस्थिति देश की हर महिला के लिए एक ख़तरा है.

इससे युवा लड़कियों को यह संदेश मिलता है कि उनकी गरिमा और आत्मनिर्भरता का कोई मूल्य है. मुख्य न्यायालय की विशाल ऊंचाइयों से बाकी न्यायालयों और तमाम न्याय पालिकाओं को यह संदेश जाता है कि इस देश में न्याय महिलाओं का संवैधानिक अधिकार नहीं है.

इससे आप उस चुप्पी को बढ़ावा दे रहे हैं जिसको तोड़ने के लिए महिलाओं और लड़कियों ने कई दशकों तक संघर्ष किया है.

और आखिर में इन सबसे बलात्कारियों को यह संदेश जाता है कि शादी बलात्कार करने का लाइसेंस है और इससे बलात्कारी के सारे अपराध धुले जा सकते हैं.

हमारी मांग है कि आप अपने इन शर्मनाक निर्णय को वापस लें और देश की सभी औरतों से माफ़ी मांगें. हम चाहते है कि एक पल की भी देरी किए बिना आप मुख्य न्यायाधीश के पद से इस्तीफ़ा दें.

(अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)