कोविड-19

कोविड दवाओं की जमाखोरी के आरोपी नेताओं की क्लीनचिट ख़ारिज, कोर्ट ने कहा- जांच में लीपापोती हुई

भाजपा सांसद गौतम गंभीर और भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बी. वी. समेत कई नेताओं पर कोविड-19 दवाओं और अन्य राहत सामग्रियों की जमाखोरी के आरोप लगे थे. दिल्ली पुलिस ने उन्हें क्लीनचिट दे दिया था. हाईकोर्ट ने कहा है कि महामारी के दौरान नेताओं को दवाएं ख़रीदने और अपनी छवि बनाने के लिए जमाखोरी करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

श्रीनिवास बी.वी. (बाएं) और गौतम गंभीर. (फोटो साभार: फेसबुक)

श्रीनिवास बी.वी. (बाएं) और गौतम गंभीर. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: भाजपा सांसद गौतम गंभीर और भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष वीबी श्रीनिवास  सहित कुछ नेताओं पर कोविड-19 से संबंधित दवाओं की जमाखोरी के आरोपों को लेकर में क्लीनचिट देने से संबंधित दिल्ली पुलिस के हलफनामे पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को असंतोष जाहिर किया और कहा कि रिपोर्ट ‘अस्पष्ट है एवं जांच में लीपापोती की गई है.’

जमाखोरी करने के आरोपों का बचाव करते हुए हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने कहा कि ये नेता लोगों को चिकित्सीय सहयोग प्राप्त करने में स्वेच्छा से मदद कर रहे थे और किसी के साथ धोखा नहीं किया गया.

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की पीठ ने कहा, ‘चूंकि कुछ राजनीतिक हस्तियां इसमें संलिप्त हैं, इसलिए आप जांच नहीं करेंगे, हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.’

वे राष्ट्रीय राजधानी में नेताओं के खिलाफ दवाओं की जमाखोरी करने और इसका वितरण करने के आरोपों की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.

पुलिस ने कहा कि इन कथित घटनाओं की जांच रोजाना आधार पर की जा रही है और अधिकारियों ने भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बी. वी., लोकसभा सदस्य और भाजपा नेता गौतम गंभीर, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चौधरी अनिल कुमार और अशोक बघेल, कांग्रेस के पूर्व विधायक मुकेश शर्मा, भाजपा प्रवक्ता हरीश खुराना, पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी और आप विधायक दिलीप पांडेय से पूछताछ की है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस अपराध शाखा के एसीपी मनोज दीक्षिक ने हाईकोर्ट में दाखिल अपनी स्थिति रिपोर्ट में कहा, ‘अब तक की गई जांच से पता चला है कि जिन लोगों पर दवा आदि की जमाखोरी करने का आरोप है, वे वास्तव में दवा, ऑक्सीजन, प्लाज्मा या अस्पताल के बिस्तर के रूप में चिकित्सा सहायता प्राप्त करने में लोगों की मदद कर रहे हैं. जिन लोगों से पूछताछ की गई उन्होंने मुहैया कराई गई सहायता के लिए कोई पैसा नहीं लिया है और इस प्रकार किसी के साथ धोखाधड़ी नहीं की गई है. वितरण/सहायता स्वैच्छिक और बिना किसी भेदभाव की गई.’

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस की टिप्पणियों को अस्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा, ‘हम इस जवाब को स्वीकार नहीं कर रहे हैं. हमारा मतलब व्यापार है. महामारी अब है. यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है. राजनीतिक दल इस महामारी को बिक्री का केंद्र नहीं बना सकते. वे इसे बिना प्रेस्क्रिप्शन के कैसे खरीद सकते थे?’

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि महामारी के दौरान सभी को जिम्मेदारी से कार्य करना चाहिए और अभियुक्तों को दवाएं खरीदने और छवि बनाने के लिए जमाखोरी करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. अब ऐसा लग रहा है कि आप सच सामने लाने के इच्छुक नहीं है.

यह कहते हुए कि आरोपी वास्तव में दवाओं और राहत सामग्री की जमाखोरी कर रहे थे, पीठ ने पुलिस से कहा कि राजनीतिक दलों के पास जो भी स्टॉक है, वह स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक को अच्छे उद्देश्य से आत्मसमर्पण कर दें.

कोर्ट ने कहा, ‘यदि वे जनता का भला करना चाहते हैं तो यह सबसे अच्छा तरीका होगा. हमें प्रथमदृष्टया विश्वास करना मुश्किल लगता है. हम अच्छे अर्थों में अपील कर रहे हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए और उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक (डीजीएचएस) के पास जाकर इसे सौंप देना चाहिए.’

पीठ ने आगे कहा कि मामले में एक उचित जांच की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की जानी चाहिए.

पुलिस ने मामले की जांच के लिए छह हफ्ते का समय मांगा, लेकिन अदालत ने इससे इनकार कर दिया.

पीठ ने पुलिस को बेहतर स्थिति रिपोर्ट दायर करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया और कहा कि उसे स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि जिन दवाओं की काफी कमी थी और जो काला बाजार में उच्च दरों पर बेची जा रही थीं, उन्हें किस तरह से कुछ लोगों ने बड़ी मात्रा में खरीदा. मामले की अगली सुनवाई 24 मई को होगी.

बता दें कि राजनीतिक दलों द्वारा कथित जमाखोरी की पुलिस जांच हाईकोर्ट के निर्देश पर की गई थी. हालांकि, श्रीनिवास से पूछताछ ने एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था, क्योंकि वह ऑक्सीजन सिलेंडर चाहने वाले लोगों की मदद करने में सबसे आगे रहे हैं.

दिल्ली पुलिस को दिए अपने बयान में श्रीनिवास ने कहा था, ‘महामारी के दौरान मदद चाहने वाले गरीब, जरूरतमंद और हताश रोगियों और उनके परिवारों को राहत प्रदान करने के लिए पूरा राहत कार्य निस्वार्थ किया जा रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे समय में जब केंद्र सरकार ने देश के नागरिकों को अपनी देखभाल के लिए छोड़ दिया है, उपलब्ध संसाधनों को ऐसे नागरिकों को परेशान करने के लिए बर्बाद किया जा रहा है, जो इस देश के लोगों के दर्द और पीड़ा को कम करने के लिए धर्मार्थ कार्य कर रहे हैं.’

वहीं, भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने पुलिस को दिए बयान में कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते लोगों को जो भी जरूरत हो, वह देना उनका कर्तव्य है, खासकर महामारी के इस समय में और आम आदमी के राहत के लिए किसी भी नागरिक के प्रयास का इस कठिन समय में स्वागत किया जाना चाहिए. उनका बयान स्थिति रिपोर्ट का हिस्सा है.

उन्होंने कहा कि दवाओं का वितरण जनहित में पूरी तरह नि:शुल्क किया गया.

कोविड-19 रोगियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले टैबलेट फैबीफ्लू के वितरण के बारे में भाजपा नेता ने कहा कि वह गौतम गंभीर फाउंडेशन के न्यासी हैं जिसने संक्रमण से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए 22 अप्रैल से सात मई के बीच नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया था.

बीते दिनों दिल्ली में ‘फैबीफ्लू’ नाम की दवाई की किल्लत के बीच पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने 21 अप्रैल को घोषणा की थी कि उनके संसदीय क्षेत्र के लोग उनके दफ़्तर से निशुल्क यह दवा ले सकते हैं.

जानकारों द्वारा उनके इस तरह कोई महत्वपूर्ण दवा बांटने को लेकर तब ही सवाल उठाया गया था लेकिन अब अदालत का ध्यान भी इस ओर गया है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)