भारत

तीन दिन में छह बार बैठी कोर्ट, फिर भी सोयी रही खट्टर सरकार

परंपरा से हटकर कोर्ट ने संभाली कमान, सरकार को सीधे तलब कर दिए मुस्तैदी के आदेश, फिर भी मूकदर्शक बनी रही सरकार.

Panchkula: Vehicles burn in violence following Dera Sacha Sauda chief Gurmeet Ram Rahim’s conviction in Panchkula on Friday. PTI Photo  (PTI8_25_2017_000183B)

पंचकूला में शुक्रवार को आगजनी का दृश्य. फोटो: पीटीआई

गुरमीत राम रहीम पर दुष्कर्म मामले में सजा से पहले हाईकोर्ट ने खुद ही हरियाणा सरकार को हिदायत दी थी कि हिंसा की स्थिति नहीं बननी चाहिए. इसके लिए कोर्ट ने धारा 144 लगाने, डेरा समर्थकों को भगाने का निर्देश दिया था. लेकिन सरकार ने न तो अपना प्रशासनिक फर्ज निभाया, न ही कोर्ट के आदेशों का पालन किया.

राम रहीम को सजा के बाद फैली हिंसा में 36 मौतें हो चुकी हैं. हर किसी को इसकी पहले से आशंका थी. इसीलिए हाईकोर्ट ने परंपरा से हटकर सक्रियता दिखाई, तीन दिन में छह बार सुनवाई की, सभी संबंधित पक्षों से जवाब मांगा, हिदायत दी और जरूरत पड़ने पर हथियारों के इस्तेमाल तक का आदेश दे दिया था, लेकिन खट्टर सरकार ने धारा 144 भी ठीक से लागू नहीं की.

दैनिक भास्कर के चंडीगढ़ संस्करण की एक विशेष रिपोर्ट कहती है, ‘हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के वकील से जब धारा-144 के नोटिफिकेशन की कॉपी मांगी तो ये सामने आया कि इसमें इस बात का जिक्र तक नहीं है कि पांच या इससे ज्यादा लोगों के एक स्थान पर इकट्‌ठे होने पर रोक लगा दी गई है. वकील ने भी नहीं सोचा था कि इस तरह की गलती भी हो सकती है. हाईकोर्ट ने लॉ एंड ऑर्डर के मामले में सरकार से इस तरह की चूक की उम्मीद नहीं की थी.

इस लापरवाही और मामले की नजाकत के मद्देनजर मामला फुल बेंच को दिया गया. अखबार लिखता है, ‘ओपन कोर्ट ने कहा कि हम मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेंगे, सरकार कार्रवाई नहीं करेगी तो कोर्ट करवाएगी. सरकारी अफसर यह न सोचें कि यह काम हमारा है और कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा. देश में यह पहला मौका रहा जब हाईकोर्ट ने हथियार के इस्तेमाल तक की बात कही.’

इसके बावजूद कोर्ट के आदेश की अवहेलना की गई. जो काम सरकार को खुद से करना चाहिए था, वह कोर्ट के आदेश पर भी नहीं किया गया. ‘हरियाणा सरकार की मंशा को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि धारा 144 लगाने की बात दो बार कोर्ट में कही गई. 18 अगस्त और 22 अगस्त को नोटिफिकेशन भी किया. कार्यवाहक चीफ जस्टिस एसएस सारों ने कहा कि एक बार नोटिफिकेशन की कॉपी तो दिखा दो, पर सरकार का जवाब यही रहा कि धारा 144 लगा दी है.’

‘कोर्ट के इस दखल के बाद हरियाणा सरकार ने 24 अगस्त को अपनी गलती को सुधारा, लेकिन हाईकोर्ट ने साफ कहा अब काफी देर कर दी है, नतीजे तो भुगतने होंगे. पहला मौका रहा जब हाईकोर्ट ने जान-माल के खतरे को भांपते हुए मजिस्ट्रेट पावर का इंतजार न कर हथियार चलाने के आदेश खुद ही दे दिए.’ बावजूद इसके लापरवाही बरती गई. हरियाणा सरकार मूकदर्शक बनी रही और हिंसा होने दी गई.

कोर्ट ने परंपरागत प्रक्रिया का पालन करने की जगह वकीलों की बात को माना कि डेरा समर्थक बड़ी संख्या में जुटे हैं. इसके उलट हरियाणा सरकार ने कहा कि शांति की अपील की गई है, हालात काबू में हैं. हाईकोर्ट ने जवाब मांगने और लिखित दस्तावेज आने का इंतजार किए बगैर सभी पक्षों को सीधा कोर्ट में तलब किया और कार्रवाई का आदेश दे दिया. कोर्ट ने सुनवाई से पहले ही हरियाणा और पंजाब सरकार के एडवोकेट जनरल को कोर्ट में बुला लिया. कोर्ट के एक के बाद फैसले के तहत ही पंजाब और हरियाणा में पैरा मिलिट्री फोर्स की कंपनियां मुहैया कराई गईं.’

राम रहीम पर फैसले से पहले तो कोर्ट सक्रिय रही ही, सुरक्षाबलों की तैनाती और हथियार चलाने के आदेश तक दिए, हिंसा के बाद भी केंद्र और हरियाणा को जमकर लताड़ा. लेकिन खट्टर सरकार सोती रही.

शनिवार को नाराज हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार ने सियासी फायदे और वोट बैंक के लिए डेरा के आगे सरेंडर कर दिया और हरियाणा को जलने के लिए छोड़ दिया.

अमर उजाला अखबार के मुताबिक, ‘हाईकोर्ट ने खट्टर के उस बयान कि आलोचना की जिसमें उन्होंने कहा था कि डेरा समर्थकों की भीड़ में असामाजिक तत्व घुस आए थे. कोर्ट ने सवाल किया, डेरा प्रमुख पर फैसले के तत्काल बाद ही आपको पता चला कि असामाजिक तत्व हैं. आप यह कैसे नहीं जान पाए कि पंचकूला में 1.5 लाख से अधिक डेरा समर्थक पहुंच गए. उन्हें हटाने के लिए कार्रवाई नहीं करना आपके ‘राजनीतिक समर्पण’ को दर्शाता है.’

शनिवार की सुनवाई में हाईकोर्ट ने डेरे की संपत्तियों पर सभी तरह की खरीद बिक्री, लीज और हस्तांतरण पर रोक लगा दी और उनकी सूची तलब की है. इसके अलावा कोर्ट ने ऐसी घटनाओं से बचने के लिए पंजाब और हरियाणा सरकार से एक्शन प्लान भी मांगा है.

केंद्र सरकार ने इस मामले में कोई कड़ी कार्रवाई करने या कानून के राज संदेश देने की जगह अब तक सिर्फ राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगकर हालात का जायजा लिया है. यानी केंद्र की भी नींद नहीं टूटी है. राज्य में तीन बार ऐसी भयानक और पूर्वनियोजित हिंसा के बावजूद खट्टर की कुर्सी सुरक्षित है. सवाल उठता है कि अगर कोर्ट ने तय परिपाटी निभाई होती, अगर संबंधित पक्षों के जवाब का इंतजार किया होता, अगर कोर्ट ने इतनी सक्रियता न दिखाई होती, तब क्या होता?