कोविड-19

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों से एक देश-एक राशन कार्ड योजना लागू करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करने के लिए असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों के पंजीकरण के लिए सॉफ्टवेयर विकास में देरी पर कड़ा रुख़ जताया और कहा कि वह इस बात से चिंतित है कि जिन प्रवासी श्रमिकों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, वे कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कैसे उठा पाएंगे.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एक देश-एक राशन कार्ड व्यवस्था को लागू करने को कहा, क्योंकि इससे प्रवासी श्रमिकों को उन राज्यों में भी राशन लेने की सुविधा मिल सकेगी, जहां वे काम करते हैं और जहां उनका राशन कार्ड पंजीकृत नहीं है.

शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करने के लिए असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों के पंजीकरण के लिए सॉफ्टवेयर विकास में देरी पर कड़ा रुख भी जताया.

न्यायालय ने केंद्र से पूछा कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत इस साल नवंबर तक उन प्रवासी श्रमिकों को मुफ्त खाद्यान्न कैसे मिलेगा, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है.

जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एमआर शाह की अवकाशकालीन पीठ ने कार्यकर्ताओं अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप चोकर के ताजा आवेदनों पर फैसला सुरक्षित रख लिया.

इन आवेदनों में प्रवासी श्रमिकों के लिए खाद्य सुरक्षा, नकद अंतरण, परिवहन सुविधाएं और अन्य कल्याणकारी उपायों को जमीन पर लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों को निर्देश देने का आग्रह किया गया है. इसमें कहा गया है कि श्रमिकों को इन चीजों की सख्त जरूरत है, क्योंकि इस बार संकट कहीं ज्यादा गंभीर है.

पीठ ने केंद्र, याचिकाकर्ताओं और राज्यों से इस मामले में लिखित में अपनी बातें रखने को कहा.

कोविड-19 मामलों के फिर से बढ़ने के बीच देश में लगाई गईं पाबंदियों के कारण प्रवासी श्रमिकों को होने वाली समस्याओं के मुद्दे पर 2020 के लंबित स्वत: संज्ञान मामले में ये आवेदन दायर किए गए थे.

सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दिल्ली, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों ने अब तक एक देश, एक राशन कार्ड (ओएनओआरसी) योजना लागू नहीं की है.

हालांकि, दिल्ली के वकील ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि इसे लागू कर दिया गया है.

पश्चिम बंगाल के वकील ने कहा कि आधार को जोड़े जाने को लेकर कुछ मुद्दे थे, इस पर पीठ ने तुरंत कहा, ‘आपको इसे लागू करना चाहिए. यह उन प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए है जिन्हें इसके जरिये हर राज्य में राशन मिल सकता है.’

पीठ ने कहा कि वह इस बात से चिंतित है कि जिन प्रवासी श्रमिकों के पास राशन कार्ड नहीं हैं, वे कल्याणकारी योजनाओं का लाभ कैसे उठा पाएंगे.

न्यायालय ने केंद्र की ओर पेश अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से पूछा, ‘असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों के पंजीकरण के बारे में क्या स्थिति है. एक सॉफ्टवेयर के विकास में इतना समय क्यों लग रहा है? आपने इसे शायद पिछले साल अगस्त में शुरू किया था और यह अभी भी खत्म नहीं हुआ है.’

पीठ ने केंद्र से पूछा कि उसे श्रमिकों का एक राष्ट्रीय डेटा तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर को बनाने के लिए और महीनों की आवश्यकता क्यों है.

न्यायालय ने कहा, ‘आपको अभी भी तीन-चार महीने की आवश्यकता क्यों है. आप कोई सर्वेक्षण नहीं कर रहे हैं. आप केवल एक मॉड्यूल बना रहे हैं, ताकि उसमें डेटा डाले जा सकें.’

यह जो भी प्रणाली तैयार की जा रही है, वह मजबूत होगी और इससे प्रशासन को योजना की निगरानी और निरीक्षण में मदद मिलेगी. इसमें इतने महीने क्यों लग रहे हैं, आप राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार कर रहे हैं.’

कार्यकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उन सभी तक पहुंचाया जाना चाहिए जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं क्योंकि इस साल समस्या ज्यादा गंभीर है.

इसके जवाब में सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि प्रधान मंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ इस साल नवंबर तक बढ़ा दिया गया है. इसके तहत ऐसे परिवारों के प्रत्येक सदस्यों को पांच किलो खाद्यान्न हर महीने नि:शुल्क दिया जाएगा. इसके अलावा राज्यों द्वारा भी अन्य कल्याणकारी योजनाओं को अमल में लाया जा रहा है.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यों को 8 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न दिया गया है, अब संबंधित राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त योजनाएं तैयार करनी है कि गरीब कल्याण योजना के तहत प्राप्त आपूर्ति सभी लाभार्थियों तक पहुंचे.

पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह गरीब कल्याण योजना को अस्थायी रूप से उन लोगों के लिए भी विस्तारित करने पर विचार करे, जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं.

मेहता ने कहा कि उन्हें इस संबंध में सक्षम अधिकारी से निर्देश लेने की जरूरत होगी.

पीठ ने बीते 24 मई को को दिए निर्देश का उल्लेख करते हुए कहा कि असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए और राज्य सरकारों के समन्वय से एक सामान्य राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाना चाहिए.

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रवासी कामगारों के पंजीकरण की प्रक्रिया बेहद धीमी है और इसमें तेजी लाई जानी चाहिए, ताकि उन्हें कोविड-19 महामारी के बीच योजनाओं का लाभ दिया जा सके.

पीठ ने कहा, ‘हम केंद्र सरकार और राज्य सरकारों पर भी संगठित श्रमिकों के पंजीकरण की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने का आग्रह करते हैं, ताकि असंगठित श्रमिक केंद्र और राज्यों की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठा सकें, जो बिना उचित पंजीकरण और पहचान पत्र के जमीन पर लागू करना मुश्किल लगता है.’

13 मई को शीर्ष अदालत ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा को कोविड-19 महामारी की मौजूदा लहर के बीच फंसे हुए प्रवासी कामगारों के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सामुदायिक रसोई खोलने का निर्देश दिया था और उन मजदूरों के लिए परिवहन की सुविधा प्रदान करने को कहा था, जो घर लौटना चाहते हैं.

पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट ने महामारी के बीच शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं और दुखों का स्वत: संज्ञान लिया था और राज्यों को प्रवासी श्रमिकों से किराया नहीं लेने और उन्हें उनके घरों के लिए बस या ट्रेन में चढ़ने तक मुफ्त में भोजन उपलब्ध कराने सहित कई निर्देश पारित किए थे.

कोविड-19 संक्रमण के देश में तेजी से फैलने और इसे देखते हुए लागू प्रतिबंधों का हवाला देते हुए तीन मानव अधिकार कार्यकर्ता- अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोकर ने श्रमिकों के लिए कल्याणकारी उपायों की शुरुआत के लिए स्वत: संज्ञान मामले में एक नई अंतरिम याचिका दायर की है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)