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राजा बलि को पूजने वाले केरल में वामन अवतार की पूजा करवाने पर संघ क्यों आमादा है?

संघ ओणम को एक हिंदू त्योहार बनाना चाहता है जिसमें वामन अवतार की पूजा हो. दूसरी तरफ कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी हैं जो मुसलमानों को ओणम को मनाने से दूर रखना चाहते हैं.

Vaman Avatar

(फोटो: अमित शाह के ट्विटर हैंडल से साभार)

राक्षसों और देवों के बीच युद्ध से दुनिया भर के लोग अच्छी तरह से परिचित हैं. इन युद्धों का अभिन्न हिस्सा है पाप पर पुण्य की विजय. हमारे देश के हर हिस्से में इस तरह की जीतों को मनाया जाता है.

पिछले कुछ दशकों में इन युद्धों, विजय और पराजय के किस्से एक जैसे बनने लगे हैं. अब हर जगह राम को नायक और रावण को खलनायक माना जाने लगा है. दुर्गा देवी हैं और महिषासुर दानव. पांडव कृष्ण की मदद से अच्छे हैं और दुर्योधन और उनके कौरव भाई बुरे.

यह संयोग नहीं की विजेता पुण्य के प्रतीक माने जाते हैं और हारने वाले बुराई के. एक अकेला अपवाद है महाबली और वामन के बीच का युद्ध और इसको दुनिया भर में और केरल में तमाम मलयाली लोगों द्वारा याद किए जाने का तरीका.

महाबली या राजा बलि केरल का प्राचीनकालीन राजा था. उसका राज्य एक ऐसे स्वर्ण काल के रूप में याद किया जाता है जिसमें उसकी समस्त प्रजा समानता और न्याय के फल का भोग करती थी. उनके लिए आपस में और प्रकृति के साथ संतुष्टि से जीने के लिए सब कुछ उपलब्ध था.

जैसा कि उस ज़माने में आम था, देवताओं को इस जनप्रिय और गुणवान राजा से जलन होने लगी. वे डरने लगे कि उसके तमाम परोपकार के परिणामस्वरूप वह स्वयं उनके इंद्रलोक का राजा बन जाएगा. वह सब के सब भगवान विष्णु के पास पहुंचे.

उनसे उन्होंने इस बात की विनती की कि वह किसी भी उपाय से महाबली का नाश करें. विष्णु महाबली के तमाम गुणों से परिचित थे लेकिन वह यह भी जानते थे कि वह एक असुर था जो मनुष्यों के बीच असमानताओं को नहीं मानता था.

A dancer performs during festivities marking the start of annual harvest festival of Onam in the southern Indian city of Kochi August 14, 2010. The ten-day long festival is celebrated annually in India's southern state of Kerala to symbolise the return of King Mahabali to meet his beloved subjects. REUTERS/Dipak (INDIA - Tags: ANNIVERSARY SOCIETY RELIGION)

(फोटो: रॉयटर्स)

इस कारण ने विष्णु को देवताओं के आग्रह को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया. वामन का अवतार ग्रहण करके, वह पृथ्वी पर उतर आए और केरल पहुंच गए.

वह महाबली से सीधी टक्कर नहीं ले सकते थे क्योंकि, अपने नाम की तरह, महाबली एक वीर और अनोखा यौद्धा था. वामन के अवतार में विष्णु उनका मुकाबला छल और कपट द्वारा ही कर सकते थे.

जब महाबली अपनी पूजा समाप्त कर रहे थे तो वामन, एक ब्राह्मण भिक्षु के रूप में, उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. महाबली ने उसकी तरफ बड़ी सहानुभूति से देखा और कहा कि जो मांगना हो, मांगो.

वामन ने उत्तर दिया कि वह भूमिहीन है. उसे ज़मीन की ज़रूरत है. महाबली ने तुरंत कहा कि वह उसे उतनी ज़मीन देगा जितनी वह चाहता है. वामन ने इस पर यह कहा कि उसे उतनी ज़मीन चाहिए थी जितनी वह तीन कदम में नाप सकता है. महाबली ने उसे नीचे से ऊपर देखा, शायद मुस्कुराया और फिर उसकी बात स्वीकार कर ली.

महाबली से हामी भरवाते ही, चालाक ब्राह्मण वामन ने अपना असली रूप धारण किया. पहले कदम में उसने पूरी धरती नाप ली; दूसरे में पूरा समंदर. वह तीसरा कदम उठा ही रहा था कि महाबली ने सृष्टि को बचाने के लिए, उसके पैर के नीचे अपना सिर रख लिया.

वामन अवतार ने उसका सिर नीचे की ओर दबाया और फिर दबाता ही चला गया जब तक कि महाबली धरती के नीचे पाताल नहीं पहुंच गए.

हालांकि केरल की जनता महाबली को भुलाने के लिए तैयार न थी. वह अपने राजा और उसके स्वर्ण काल को कैसे भूल सकते थे? उनके मातम का यह नतीजा हुआ कि महाबली को साल में दस दिन के लिए केरल तब लौटने की अनुमति मिली जब फसल कटकर खलिहान में पहुंचने का समय होता था.

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उसकी वापसी का समय इफरात का मौसम होता था जब केरल की समस्त जनता उसके आगमन को ओणम के त्योहार के रूप में मनाने लगी. एक ऐसा त्योहार जिसमें कोई पूजा नहीं, कोई मूर्ति नहीं, केवल तमाम मलयालियों के लिए बढ़िया खान-पान, गीत और संगीत का महत्व था.

रावण के नाम कुछ ही जीर्ण-क्षीर्ण हालत में मंदिर बचे हैं. बिहार और बंगाल में थोड़ी सी संख्या में आदिवासी मौजूद हैं जो महिषासुर की पूजा करते हैं. केरल में ही एक अकेला दुर्योधन के नाम का मंदिर है जिसमें हर साल उसका मेला लगता है. पराजितों के नाम देश भर में गिनती के ही यादगार होंगे. विजेताओं का ही महिमामंडन होता है.

केरल ही एक ऐसी जगह है जहां हर साल पराजय के बावजूद, महाबली लौटता है क्योंकि वह आज भी मलयाली दिलों का ऐसा राजा है जिसकी जगह कोई ले नही पाया है. लेकिन, हाल में इस बात का प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें हमेशा के लिए पाताल भेज दिया जाए.

पिछले कुछ वर्षों से, केरल में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने की अपनी कोशिशों को संघ परिवार ने दुगनी कर दी है. उसने धन और बाहुबल दोनों का खूब इस्तेमाल किया है और इसके साथ जातीय व धार्मिक संगठनों के साथ अपना ताल-मेल भी बढ़ाया है. अब वह महाबली पर हल्ला बोल चुके है. उस जनप्रिय राजा की स्तुति के स्थान में वह वामन अवतार की पूजा करवाने पर आमादा हैं.

वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? जिस जनता का वह समर्थन प्राप्त करना चाहते हैं उसी के सम्मान और प्यार के प्रतीक पर वह हमला क्यों कर रहे हैं? इस पहेली का उत्तर हमें तब ही मिलेगा जब हम मनुस्मृति के प्रति संघ परिवार की उस निष्ठा को याद करेंगे जो वह ज़माने से व्यक्त कर रही है.

जब से उसका राजनीतिक जन्म हुआ, उसके समस्त राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, उसकी यह निष्ठा अमिट रही है, पत्थर की लकीर की तरह.

जिस समय डॉ. आंबेडकर द्वारा रचित संविधान को स्वीकृति प्राप्त हुई थी, उस समय से ही आरएसएस ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह इस नए धर्मशास्त्र को नहीं मानती है. उसके लिए एक ही धर्मशास्त्र है और वह है मनुस्मृति.

उनके अनुसार, भारत के नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने और उनके व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए मनुस्मृति पर्याप्त थी. मनुस्मृति के प्रति निष्ठा का मतलब है वर्णाश्रम धर्म और ब्राह्मणवाद को स्वीकार करना.

आरएसएस द्वारा महाबली की अवहेलना के पीछे इस निष्ठा के अलावा कुछ नहीं है. उनको एक ऐसे राजा के रूप में उन्होंने प्रस्तुत किया है जो बाहर से आकर केरल पर राज कर रहा था.

हिंदू ऐक्य वेदी की राज्य अध्यक्ष केपी शशिकला ने तो यहाँ तक कहा है कि ‘वामन ने केरल को साम्राजवादी शासक महाबली से मुक्त किया. उसे तो स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखा जाना चाहिए.’

New Delhi: Artists perform during the cultural programme 'Kairali' - a special Onam programme in association with the Government of Kerala at auditorium Rashtrapati Bhavan Cultural Centre in New Delhi on Saturday. PTI Photo/RB (PTI9_4_2016_000212B) *** Local Caption ***

(फोटो: पीटीआई)

संघ परिवार के आदत अनुसार, महाबली को एक साम्राज्यवादी शासक के साथ-साथ विष्णु और उसके वामन अवतार के उपासक के रूप में भी पेश किया जा रहा है.

आरएसएस के मुखपत्र केसरी साप्ताहिक के पिछले वर्ष के ओणम विशेषांक में राज्य संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक आर. उन्नीकृष्ण नाम्बूथ्री ने एक लेख में कहा, ‘वामन ने महाबली को पाताल नहीं भेजा बल्कि उसने उस शासक का सम्मानजनक पुनर्वास एक ऐसे स्थान में किया जो स्वर्ग से भी अधिक आरामदेह है.’

सामाजिक श्रेणीगत व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जिनको भी ब्राह्मणवाद ने पराजित किया उनके साथ उसने हमेशा इसी तरह का सुलूक किया है. पहले तो उन्हें नेस्तनाबूत किया गया, उनको अपमानित किया गया.

बाद में उन्हें विजेताओं की संगत में कोई बहुत ही हीन स्थान दे दिया गया ताकि उनके मानने वालों, उनके साथ पराजित होने वालों को नए शासकों और नए नियमों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया जा सके.

केरल में इस प्रक्रिया के दोहराए जाने की कम संभावना है. आरएसएस के लोग ओणम को एक हिंदू त्योहार बनाना चाहते हैं जिसमें वामन अवतार की पूजा हो. दूसरी तरफ, कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी हैं जो मुसलमानों को ओणम को मनाने से दूर रखना चाहते हैं. लेकिन तमाम मलयाली जनता ओणम को अपनी तरह मनाते रहने पर आमादा दिखती है.

जाति और धर्म को एक तरफ रखते हुए वह मिलकर ओणम का गीत गाते हैं, ‘मावेली (महाबली) नाडू वानीतम कालम, मानुषर एल्लारम ओंनुपोले’. इस तरह वह महाबली के शासन को परिभाषित करने वाली न्याय और समानता के गुण गाते हैं. उनमें से कई यह भी मानते हैं कि महाबली को मारने के बाद ही वर्णव्यवस्था का प्रवेश केरल में संभव हुआ.

जिस केरल में कम्युनिस्टों का सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है उसमें सामाजिक और आर्थिक समानता का विरोध असहनीय समझे जाते हैं. ऐसे राज्य में महाबली सामाजिक न्याय के प्रतीक कर रूप धारण कर चुके हैं.

केरल में उनकी वार्षिक वापसी का मौका दावतों का मौका बनता है. इन दावतों का इंतज़ाम करना गरीब से गरीब मलयाली के लिए वाम सरकारों द्वारा स्थापित सस्ती खान-पान की दुकानों की वजह से संभव हुआ है.

महाबली का केरल में 10 दिन का पड़ाव इस बात की उम्मीद पैदा करता है कि कभी न कभी जिस समानता, न्याय और शांतिपूर्ण संबंधों के वह प्रतीक हैं, वह एक स्थाई व्यवस्था का रूप धारण करेंगे.

ओणम के स्थान पर वामन महोत्सव मनाने के संघ परिवार के प्रयास केरल में ही लोगों के अंदर प्रतिरोध की भावना पैदा नहीं की है बल्कि उसने अपने भावी कार्यक्रम के एक महत्वपूर्ण हिस्से का ऐलान करके अन्य स्थानों में भी लोगों की पुरानी यादों को कुरेदने का काम किया है.

हो सकता है कि वह असुर एक बार फिर उमड पड़ेंगे जिनकी यादें उनके लोगों और समर्थकों के मस्तिष्क में लंबे समय से दफ़न थी. पराजित शायद विजेता के रूप में उभर ही पड़ेंगे.

(लेखिका कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया की सदस्य और आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेंस एसोसिएशन की अध्यक्ष है.)