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एल्गार परिषद मामले के आरोपी देश के ख़िलाफ़ जंग छेड़ना चाहते थे: एनआईए का मसौदा आरोप

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एल्गार परिषद और माओवादियों के बीच संबंधों से जुड़े मामले में एक विशेष अदालत में मसौदा आरोप पेश किया है. मामले में शुरुआती जांच करने वाली पुणे पुलिस ने अपने प्रस्तावित मसौदा आरोपों में कहा था कि हथियार ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या’ की साज़िश से जुड़े थे, जबकि एनआईए ने प्रधानमंत्री का उल्लेख नहीं किया है.

भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ता. (फोटो: द वायर)

मुंबई: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एल्गार परिषद और माओवादियों के बीच संबंधों से जुड़े मामले में एक विशेष अदालत के समक्ष पेश किए गए मसौदा आरोपों में दावा किया है कि आरोपी अपनी खुद की सरकार बनाना चाहते थे और ‘देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहते’ थे.

एनआईए ने इस महीने की शुरुआत में मसौदा पेश किया था और इसकी प्रति सोमवार को उपलब्ध कराई गई.

इस मसौदा में मानवाधिकार एवं अधिकार कार्यकर्ताओं समेत 15 आरोपियों के खिलाफ 17 आरोप लगाए गए है. उनके खिलाफ अवैध गतिविधियां (रोकथाम) कानून (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए जाने का अनुरोध किया गया है.

एनआईए ने आरोप लगाया है कि आरोपी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) (माओवादी) के सक्रिय सदस्य थे.

इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों में कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस, वरवरा राव, हेनी बाबू, आनंद तेलतुम्बडे, शोमा सेन, गौतम नवलखा, सुधीर धवले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, महेश राउत, अरुण फरेरा, रमेश गायचोर, ज्योति जगताप और सागर गोरखे शामिल हैं.

इसमें फादर स्टेन स्वामी का भी जिक्र है, जिनकी पिछले महीने हिरासत में मौत हो गई थी. उनके खिलाफ मामला दबा दिया गया है. मसौदा आरोपों में छह फरार आरोपियों का भी जिक्र है.

मसौदा आरोपों के अनुसार, आरोपियों का मुख्य उद्देश्य ‘सरकार से सत्ता हथियाने के लिए सशस्त्र संघर्ष करना और क्रांति के जरिए जनता सरकार’ स्थापित करना था. मसौदा में यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपियों ने ‘भारत सरकार और महाराष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश’ की.

देश के खिलाफ जंग छेड़ने में अधिकतम सजा मौत है.

मामले में अभियोग शुरू करने से पूर्व पहला कदम आरोप तय करना है. इस दौरान अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों और सबूतों की जानकारी देता है. आरोप तय करने के बाद अदालत आरोपियों से पूछेगी कि वे मामले में अपना अपराध स्वीकार करते हैं या नहीं.

मसौदा में यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपी एल्गार परिषद बैठक के दौरान पुणे में भड़काऊ गीत बजा रहे थे, लघु नाटक प्रस्तुत कर रहे थे और नक्सलियों के समर्थन में साहित्य वितरित कर रहे थे.

मसौदा में कहा गया है, ‘आपराधिक साजिश का इरादा भारत से एक हिस्से को अलग करना और व्यक्तियों को इस तरह के अलगाव के लिए उकसाना था.’ इसमें आरोप लगाया गया है कि आरोपियों का इरादा विस्फोटक पदार्थों का उपयोग करके लोगों के मन में आतंक पैदा करना था.

इसने दावा किया है, ‘आरोपियों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती किया था.’

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120 बी (साजिश), 115 (अपराध के लिए उकसाना), 121, 121 ए (देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 124 ए (राजद्रोह), 153-ए (जुलूस में हथियार), 505 (1) (बी) (अपराध को बढ़ावा देने वाले बयान) और 34 (साझा इरादे) के तहत आरोप लगाए गए हैं.

उन पर यूएपीए की धाराओं 13, 16, 17, 18, 18ए, 18बी, 20 (आतंकवादी गतिविधियों के लिए सजा), 38, 39 और 40 (आतंकवादी संगठन का हिस्सा होने की सजा) के तहत भी आरोप लगाए गए हैं.

एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया कि इस भाषणों के कारण अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि इस सम्मेलन को माओवादियों के साथ कथित रूप से संबंध रखने वाले लोगों ने आयोजित किया था.

एनआईए ने आरोप लगाया है कि 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में एल्गार परिषद का आयोजन राज्य भर में दलित और अन्य वर्गों की सांप्रदायिक भावना का भड़काने और उन्हें जाति के नाम पर उकसा कर भीमा-कोरेगांव सहित पुणे जिले के विभिन्न स्थानों और महाराष्ट्र राज्य में हिंसा, अस्थिरता और अराजकता पैदा करने के लिए आयोजित किया गया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एनआईए ने इस महीने की शुरुआत में एक विशेष अदालत के समक्ष पेश किए गए अपने मसौदा आरोपों में कहा था कि आरोपियों ने ‘सार्वजनिक पदाधिकारी की मौत का प्रयास करने या मौत का कारण’ बनने के लिए परिष्कृत हथियारों को जमा करने की साजिश रची थी.

मामले में शुरुआती जांच करने वाली पुणे पुलिस ने अपने प्रस्तावित मसौदा आरोपों में कहा था कि हथियार ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या’ की साजिश से जुड़े थे.

दूसरी ओर, एनआईए ने प्रधानमंत्री का उल्लेख नहीं किया है. एनआईए के एक अधिकारी ने कहा कि मसौदा आरोपों में विशिष्ट आरोपों को शामिल नहीं किया गया है और इस पर सबूत ट्रायल के दौरान शामिल किए जाएंगे.

रिपोर्ट के अनुसार, मसौदा आरोपों में कहा गया है कि आरोपियों ने ‘एम-4 (परिष्कृत हथियार) की वार्षिक आपूर्ति’ के लिए 8 करोड़ रुपये की मांग और व्यवस्था करने की साजिश रची थी. साथ ही विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों को आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देने के लिए भर्ती किया था.

इस मामले में एनआईए ने 2020 में पुणे पुलिस से जांच अपने हाथ में ली थी. पिछले साल अक्टूबर में केंद्रीय एजेंसी ने अकादमिक आनंद तेलतुम्बडे, कार्यकर्ता गौतम नवलखा, दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर हेनी बाबू, सांस्कृतिक समूह के सदस्यों सागर गोरखे, रमेश गायचोर और ज्योति जगताप, फादर स्टेन स्वामी और फरार आरोपी मिलिंद तेलतुंबडे सहित आठ आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया था.

अपनी जांच को लेकर एनआईए कई बार आलोचना के केंद्र में आया है, क्योंकि कई जाने-माने अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को (सरकार से) असंतुष्ट लोगों पर रोक लगाने के रूप में देखा जाता रहा है.

इसके अलावा एक डिजिटल फोरेंसिक फर्म ने पाया है कि आरोपियों के खिलाफ तथाकथित सबूतों में से अधिकांश अज्ञात हैकर द्वारा 2018 में एक कार्यकर्ता रोना विल्सन की गिरफ्तारी से दो साल पहले उनके कंप्यूटर पर डाले गए थे.

हालांकि एनआईए ने डिजिटल फोरेंसिक फर्म आर्सेनल कंसल्टिंग की उस रिपोर्ट का खंडन किया है, जिसमें यह बताया गया है कि भारत के प्रधानमंत्री की हत्या और सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश सहित भड़काऊ सामग्री एलगार परिषद-भीमा कोरेगांव मामले के आरोपी शोधकर्ता रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक कर रखे गए थे.

2018 में शुरू हुए एल्गार परिषद मामले की जांच में कई मोड़ आ चुके हैं, जहां हर चार्जशीट में नए-नए दावे किए गए. मामले की शुरुआत हुई इस दावे से कि ‘अर्बन नक्सल’ का समूह ‘राजीव गांधी की हत्या’ की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बना रहा है.

यह विस्फोटक दावा पुणे पुलिस ने किया था, जिसके फौरन बाद 6 जून 2018 को पांच लोगों- रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, कार्यकर्ता सुधीर धावले, महेश राउत और शिक्षाविद शोमा सेन को गिरफ्तार किया गया था.

इसके बाद अगस्त 2018 को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंजाल्विस को गिरफ्तार किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)