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सरकारी समिति की ‘मोपला शहीदों’ को इतिहास की किताब से हटाने की मांग, कहा- विद्रोही सांप्रदायिक थे

भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद की समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि 1921 का मालाबार विद्रोह हिंदू समाज के ख़िलाफ़ था और केवल असहिष्णुता के चलते किया गया था.

साल 1921 में औपनिवेशिक अंग्रेजी सैनिकों के साथ युद्ध के बाद मोपला विद्रोहियों को पकड़ा गया था. (फोटो: अज्ञात/विकिमीडिया कॉमंस पब्लिक डोमेन)

नई दिल्ली: भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) की तीन सदस्यीय समिति ने ‘वैगन त्रासदी’ पीड़ितों और मालाबार विद्रोह के नेताओं को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों पर एक किताब से हटाने की मांग की थी.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, इसी समिति ने साल 2016 में साल 1921 के विद्रोह के ‘फ्रीडम फाइटर्स’ के नाम की रिपोर्ट की समीक्षा पेश की थी.

डिक्शनरी ऑफ मार्टर्स: इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल 1857-1947’ नामक किताब साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जारी की गई थी.

शिक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले आईसीएचआर ने किताब के पांचवें हिस्से में प्रविष्टियों की समीक्षा की है और निष्कर्ष निकाला कि 387 मोपला शहीदों के नाम, जिनमें अली मुसलियार, वरियामकुनाथ अहमद हाजी और हाजी के दो भाइयों को किताब से हटा दिया जाना चाहिए.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मोपला (मुस्लिम) दंगे के रूप में भी पहचान रखने वाला मालाबार विद्रोह 20 अगस्त, 1921 को मुस्लिम किराएदारों द्वारा ब्रिटिश शासकों और स्थानीय हिंदू जमींदारों के खिलाफ शुरू हुआ था. कुछ ऐतिहासिक बताते हैं कि विद्रोह में लगभग 10,000 लोगों की जान चली गई, जिनमें 2,339 विद्रोही शामिल थे.

इसे दक्षिण भारत में पहले राष्ट्रवादी विद्रोहों में से एक माना जाता था. घटनाएं उत्तरी केरल के मलप्पुरम जिले के विभिन्न हिस्सों में हुईं. तत्कालीन केरल सरकार ने विद्रोह में भाग लेने वालों को स्वतंत्रता सेनानियों की श्रेणी में शामिल किया था. इसे किसान विद्रोह के रूप में भी वर्णित किया गया था.

आईसीएचआर के एक सदस्य सीआई आइजैक ने समीक्षा रिपोर्ट में दर्ज किया कि ‘मोपला में लगभग सभी आक्रोश सांप्रदायिक थे. ये हिंदू समाज के खिलाफ थे और केवल असहिष्णुता के चलते किये गए थे. इसलिए निम्नलिखित नाम जल्द प्रकाशित होने वाले प्रोजेक्ट से हटाए जाने चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा, ‘वैगन त्रासदी’ में मरने वालों में से कोई भी भारत के स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे क्योंकि उन्होंने खिलाफत का झंडा फहराया और एक संक्षिप्त अवधि के लिए खिलाफत और खिलाफत अदालतों की स्थापना की. उन्हें दंगों में भाग लेने के आरोप में सेना ने गिरफ्तार किया था. दंगों में भाग लेने वाले लगभग 10 हिंदू भी शब्दकोश से हटाए जाने वाले व्यक्तियों की सूची में हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अंग्रेजों ने उचित मुकदमे के बाद दंगाइयों को दोषी ठहराया और इन मृतकों को कभी भी अन्यत्र स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में मान्यता नहीं मिली.’

समिति ने बताया कि विद्रोह एक ‘खिलाफत’ स्थापित करने का एक प्रयास था. इसने एक दंगाइयों के रूप में हाजी की भूमिका को उजागर किया, जिसने एक शरिया अदालत की स्थापना की थी और बड़ी संख्या में हिंदुओं का सिर कलम किया था.

अखबार द्वारा हासिल रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘दंगाइयों ने धर्मनिरपेक्ष मुसलमानों को भी नहीं बख्शा. जो दंगाइयों के हाथों मारे गए वे नास्तिक थे. बड़ी संख्या में ‘मोपला शहीद’, जो विचाराधीन कैदी थे, हैजा जैसी बीमारियों और प्राकृतिक कारणों से मारे गए. इसलिए, उन्हें शहीद के रूप में नहीं माना जा सकता है. उनमें से कुछ को ही सरकार ने अदालती सुनवाई के बाद फांसी दी थी.’

राजनीतिक विचारधारा

19 अगस्त को, आरएसएस नेता राम माधव ने दावा किया कि 1921 का मोपला विद्रोह भारत में तालिबान मानसिकता की पहली अभिव्यक्तियों में से एक था. उन्होंने कहा कि केरल में वाम सरकार कथित तौर पर इसे कम्युनिस्ट क्रांति के रूप में मनाकर इसकी छवि साफ करने की कोशिश कर रही है.

इसके जवाब में भाकपा के महासचिव डी. राजा ने कहा कि आरएसएस एक सांप्रदायिक विचारधारा का पालन करता है और यह इतिहास की फिर से व्याख्या करने का प्रयास करता है.

उन्होंने कहा, ‘जहां तक मोपला विद्रोह का सवाल है, यह सामंतों के खिलाफ था, ब्रिटिश शासकों के खिलाफ था. इसलिए उन लोगों को सेलुलर जेलों में भेजा गया था.’

बता दें कि ‘वैगन त्रासदी’ 21 नवंबर, 1921 में हुई थी, जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने वाले किसानों (मोपला कैदियों) को कोयंबटूर जेल में ले जाने के लिए भोजन और पानी के बिना एक खिड़की रहित वैगन में ले जाया गया था. कम से कम 70 किसानों की दम घुटने के कारण मौत हो गई थी जबकि बाकी पेशाब पीकर जिंदा बच सके थे.

इस त्रासद घटना को दक्षिण का जलियांवाला बाग कहा गया था. साल 1972 में केरल सरकार ने इसे ‘वैगन त्रासदी’ कहा था.

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