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यूपी: सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल से अधिक समय से जेलों में बंद क़रीब सौ क़ैदियों को अंतरिम ज़मानत दी

सुप्रीम कोर्ट ने आगरा और वाराणसी की जेलों के क़ैदियों को रिहा करने की मांग वाली दो जनहित याचिकाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भी जारी किया है. याचिका में बीस साल से अधिक की सज़ा काट चुके क़ैदियों की रिहाई पर विचार करने की नीति को बदलने के यूपी सरकार के फ़ैसले को भी चुनौती दी गई है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पिछले 20 सालों से उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद और अपनी सजा काट चुके 97 कैदियों के एक समूह को अंतरिम जमानत दे दी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, आदेश पारित करते हुए जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने आगरा और वाराणसी की जेलों के कैदियों को रिहा करने की मांग वाली दो जनहित याचिकाओं पर नोटिस भी जारी किया.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कैदी, जिसमें से अधिकतर उम्रकैद की सजा पाने वाले हैं, ने राज्य सरकार की नीति के तहत अपनी सजा पूरी की थी, जिसमें वास्तविक कारावास की 16 साल और छूट के साथ चार साल की सजा का प्रावधान है.

लाइव लॉ के अनुसार, यह याचिका वकील ऋषि मल्होत्रा के माध्यम से दाखिल की गई थी. इसने 4 मई, 2021 के सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश का उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने इसी तरह के कैदियों को राहत दी थी.

याचिका में कहा गया, ‘यह आदेश सरकार पर एक कल्याणकारी राज्य के रूप में कार्य करने का दायित्व डालता है और इसे समय-समय पर मूल्यांकन के माध्यम से समयपूर्व रिहाई पर विचार करना चाहिए.’

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने कुछ कैदियों को रिहा करने के शीर्ष अदालत के आदेश को नजरअंदाज कर दिया. जब उन्होंने अवमानना याचिका दायर करके शीर्ष अदालत का रुख किया, तो सरकार ने तुरंत निर्देशों का पालन किया और अवमानना की कार्यवाही से बचने के लिए 16 जुलाई को कम से कम 32 दोषियों को रिहा कर दिया.

याचिकाकर्ताओं ने कहा, ‘इन कैदियों ने कुल सजा के 20 साल से अधिक सजा काटी, जिसमें मूल सजा के 16 साल और उससे अधिक शामिल थे.’

लाइव लॉ के अनुसार, याचिका ने 20 साल से अधिक की सजा काट चुके कैदियों की रिहाई पर विचार करने की नीति को बदलने की यूपी सरकार के फैसले को भी चुनौती दी. 28 जुलाई को जारी नई नीति के तहत उन आधारों, जिन पर दोषियों को राज्य की नीति का लाभ दिया जाएगा, को सीमित करके ‘दोषियों के अधिकारों को कम करने का प्रयास’ किया गया है. नई नीति केवल 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को राहत लेने की अनुमति देती है.

याचिका में अपील की गई कि पुरानी नीति याचिकाकर्ताओं पर लागू की जाए क्योंकि यह स्थापित कानून है कि एक नीति जो दोषसिद्धि के समय अस्तित्व में थी, एक दोषी की समयपूर्व रिहाई के लिए विचार के समय लागू होगी.

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