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बेटियों के लिहाज से बाकी उत्तर प्रदेश का सच भी वाराणसी जितना ही कड़वा है

योगी सरकार से पूछना चाहिए कि यह बेटियों की सुरक्षा है या उनसे छल? लेकिन कौन पूछे? जिस मीडिया को पूछना चाहिए उसने तो समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार की सत्ता से बेदखली के साथ ही प्रदेश में जंगल राज खत्म हुआ मान लिया है.

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संपादित फोटो साभार: पीआईबी/फेसबुक

वाराणसी के प्रशासन के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वर्षों से चले आ रहे उत्पीड़न के ख़िलाफ़ छात्राओं द्वारा शुरू किए गए आंदोलन से निपटना मुश्किल हो गया है तो उस मीडिया को भी, उनका नोटिस लेना पड़ा है, जिसने प्रदेश के गत विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की ‘समाजवादी’ सरकार की बेदखली के साथ ही प्रदेश में जंगलराज खत्म हुआ मान लिया था.

छात्राओं के इस प्रतिरोध की चर्चा इसलिए भी कुछ ज्यादा हो रही है कि जब वे आंदोलित हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहीं हैं- अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर. लेकिन इस बात का क्या किया जाये कि इस तथ्य को छिपाने की कोशिशें अभी भी कम नहीं हुई हैं कि बेटियों के लिहाज से बाकी उत्तर प्रदेश का सच भी वाराणसी जितना ही कड़वा है.

वाराणसी में ये छात्राएं आंदोलित हैं तो प्रदेश के श्रावस्ती जिले के इकौना थाना क्षेत्र के भलुहिया दसौंधी गांव में दरिन्दों ने राजधानी दिल्ली के 2012 के निर्भया कांड को शरमाते हुए अवयस्क विवाहिता बिंदु यादव को धान के खेत में ले जाकर धारदार हथियारों से गले से गुप्तांगों तक बेरहमी से काट डाला है.

उसका कुसूर सिर्फ इतना था कि वह अपने घर से थोड़ी दूर स्थित अपने मवेशियों की सरिया में उन्हें चारा देने गयी थी. हतप्रभ पुलिस और प्रशासन उसके साथ दरिन्दगी को लेकर अभी तक अंधेरे में ही हाथ-पांव मार रहे हैं.

बहरहाल, बेटियों का हाल पूरे उत्तर प्रदेश में, अगर वे हाईप्रोफाइल नहीं यानी आम हैं, योगी आदित्यनाथ सरकार के छह महीनों में भी उतना ही बुरा बना हुआ है, जितना अखिलेश सरकार के दौरान था.

विधानसभा चुनाव में उनकी सुरक्षा के मुद्दे को भरपूर भुनाने वाली भाजपा की यह सरकार एक के बाद एक लगातार उनका भरोसा तोड़ रही है. उनके प्रति होने वाले अपराधों पर शरमाना या उनकी ज़िम्मेदारी लेना भी यह नहीं सीख पाई है.

इसके चलते प्रदेश में बेटियों के ख़िलाफ़ गुंडों व मुस्टंडों का ही नहीं, पुलिसकर्मियों का दुस्साहस भी किस कदर बढ़ गया है, इसे उनके द्वारा अंजाम दी गयी कुछ जघन्य वारदातों से समझा जा सकता है.

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पहले पुलिस की बात करें तो कानपुर देहात से गत 11 सितंबर को तीन लड़कियां योगिता, हिमानी और लक्ष्मी लापता हुईं तो मामले की जांच में पुलिस की कार्यकुशलता का आलम यह था कि उसने इटावा में चंबल के बीहड़ों में क्वारी नदी के किनारे मिली दो लाशों को योगिता और हिमानी की लाशें बता दिया और कहा कि तीसरी लड़की लक्ष्मी का पता नहीं चल रहा.

उसने इसे लेकर लक्ष्मी के दोस्त कुलदीप पर अपहरण और हत्या का मुकदमा भी दर्ज कर लिया. लेकिन बाद में पता चला कि तीनों लड़कियां सही-सलामत हैं और कानपुर देहात से कन्नौज, झांसी और ग्वालियर होते हुए घूमने के लिए इटारसी पहुंच गई थीं.

अब पुलिस के पास इस सवाल तक का जवाब नहीं है कि जिन लड़कियों की लाशें चंबल में नदी के किनारे मिली थीं, आखिर वो कौन थीं? विडम्बना यह कि शिनाख्त के बाद उन लड़कियों के शवों को नदी में प्रवाहित किया जा चुका है. ऐसी हालत में बेटियों का भरोसा कैसे बरकरार रह सकता है?

गत 24 अगस्त को प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के लखीमपुर में बाबू सर्राफ नगर में नेत्रहीन मां और बीमार पिता की बेटी से एकतरफा ‘इश्क’ में पगलाये रोहित नाम के सिरफिरे ने पहले उसे बहाने से घर बुलाकर उसपर मोबाइल चोरी का आरोप लगाया, फिर बीच सड़क पर तलवार से उसका एक हाथ काट डाला.

बचाव की कोशिश में बेटी के दूसरे हाथ और शरीर के अन्य हिस्सों में भी चोंटें आईं. इस दौरान न सड़क पर आने-जाने वालों ने उसे बचाने के लिए कुछ किया और न ही प्रदेश सरकार का बहुप्रचारित एंटी रोमियो स्क्वाड या ‘नारी सुरक्षा बल’ ही नज़र आया.

आधे घंटे बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंची भी तो यों हाथ खड़े किए हुए कि वह और स्वास्थ्य विभाग मिलकर भी पीड़ित बेटी को लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर भेजने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं कर पाये. नागरिकों ने चंदा करके एम्बुलेंस मंगाकर उसे लखनऊ भेजा, जहां डाक्टरों ने अथक प्रयास से उसका हाथ तो फिर से जोड़ दिया, लेकिन उसके आगे के जीवन निर्वाह की अभी भी कोई व्यवस्था नहीं है.

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इससे पहले गत आठ अगस्त को गुंडों ने बलिया जिले के एक गांव की कॉलेज जा रही छात्रा द्वारा उनकी बदतमीजी के विरोध में प्रदर्शित साहस को ही उसका कुसूर बना डाला. चाकुओं से गोद-गोदकर बेरहमी से उसकी हत्या कर दी और भाग निकले. कहते हैं कि वे पांच थे, जिनमें से दो को पुलिस ने पकड़ लिया है, जबकि तीसरे ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया है और दो अभी फरार है.

वारदात से भौचक पुलिस कहती है कि वह इन सबके ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई कर रही है, लेकिन यह नहीं बता पा रही कि जब गुंडे छात्रा के शरीर पर अपने चाकू आज़मा रहे थे, उसका वह बहुप्रचारित स्क्वाड कहां था, जिसका नाम पहले ऐंटी रोमियो रखा गया था और अब ‘नारी सुरक्षा बल’ कर दिया गया है?

यों तो यह बल बेटियों की सुरक्षा के नाम पर भाइयों तक के साथ उनका निकलना दूभर किए रहता है लेकिन जब उन्हें वाकई उसकी जरूरत होती है, उसका कुछ पता नहीं चलता.

दूसरी ओर असामाजिक समाज की कायरता कहें या कातरता कि जब छात्रा बचाव में चीख रही थी, कथित रूप से बेटियों की इज्जत को सर्वोपरि मानने और कई बार उसे नाक का सवाल बनाकर खून-खराबे तक पर उतर आने वाले प्रत्यक्षदर्शियों की आखों में जैसे मोतियाबिंद हो गया था और वे छात्रा से भी ज्यादा डरे हुए अपनी जान की खैर मना रहे थे.

इसको इस तरह भी समझा जा सकता है कि प्रदेश के आम लोग अभी भी योगी सरकार के ‘आम आदमी ही हमारे लिए सबसे बड़ा वीआईपी’ जैसे लोक-लुभावन ऐलान पर एतबार नहीं कर पा रहे.

उन्हें यकीन नहीं कि किसी गुंडे या मुस्टंडे के मुंह लगने या उसके अभीष्ट में बाधा डालने के बावजूद प्रदेश में सुखपूर्वक उनका निस्तार हो सकता है. जहां तक पीड़ित बेटियों की बात है, वे किसी तरह ‘बच’ जा रहीं तो यह तक नहीं मान पा रहीं कि उन्हें किसी भी स्तर पर आत्मसम्मान बनाये रखने लायक इंसाफ मिल सकता है.

इसकी एक नजीर देवरिया जिले के सदर कोतवाली इलाके की वह युवती भी है, जो एक गुंडे द्वारा उसके साथ की गयी बदतमीजी का दंश ढोती हुई छह महीनों तक इंसाफ के लिए हाकिमों व हुक्कामों के दरवाजे खटखटाती रही और फिर भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ. न पुलिस से और न पंचायत से.

पुलिस ने उसकी एफआईआर तक दर्ज नहीं की. तहरीर मात्र लेकर जांच के बहाने उसे लटकाये रखा. फिर पंचायत जुटी तो उसमें भी जो कुछ हुआ, उसे भूल जाने और मामले को रफा-दफा कर देने की नसीहतें मिलने लगीं तो इस युवती की आंखों के आगे ऐसा अंधेरा छाया कि उसे लगा कि इस रात की कोई सबह ही नहीं है.

मजबूर होकर उसने जहर खा लिया. इस तथ्य से अनजान कि इसके बावजूद सत्ता या समाज में कोई उसके साथ हुए अन्याय की शर्म महसूस करेगा या नहीं.

चौबीस जुलाई को फैजाबाद जिले के रौनाही थाना क्षेत्र के एक गांव में एक सिरफिरे शिक्षक ने अपने एकतरफा प्रेम का प्रतिफल न मिलने पर कालेज जाती छात्रा को दिनदहाड़े काट डाला था तो क्या किसी ने इसकी किंचित भी सामाजिक शर्म महसूस की थी?

कन्नौज की पंद्रह साल की गैंगरेप पीड़ित किशोरी को भी तब जान देने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझा, जब पुलिस ने गैंगरेप की एफआईआर छेड़खानी में दर्ज की और उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की.

निश्चित ही पुलिस ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि किशोरी बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है और गैंगरेप देश की राजधानी में, चलती बस अथवा कार में नहीं बल्कि तब हुआ जब वह बकरियां चराने गांव के पास स्थित नदी पर बने पुल के पास के सुनसान चरागाह में गई थी.

समाचारों के अनुसार पुलिस ने उसके साथ गैंगरेप को उतनी भी तवज्जो नहीं दी जितना किसी पीड़ित महिला के संभ्रांत पारिवारिक पृष्ठभूमि से होने पर उसकी चोटी कट जाने की अफवाहों को देती है.

वैसे भी यह कोई दबी-ढकी बात नहीं कि प्रदेश की पुलिस का अपना एक खास वर्गचरित्र है, जिससे वह किसी भी सरकार के दौर में निजात नहीं प्राप्त कर पाती. इसी वर्गचरित्र के तहत उसने मेरठ के एक पब्लिक स्कूल में मासूम बच्ची से हुए गैंग रेप को सिरे से नकारने के लिए उस सरकारी मेडिकल परीक्षण की रिपोर्ट को बहाना बनाया, जो जानबूझकर वारदात के काफी देर बाद कराया गया था.

पुलिस की हृदयहीनता से पीड़ित उसके परिजन फरियाद लेकर उसके आईजी के पास पहुंचे तो उनके इस सवाल का जवाब किसी के भी पास नहीं था कि गैंगरेप नहीं हुआ होता तो वे अपनी फूल सी बच्ची को लेकर उसकी बात ही मुंह पर क्यों लाते? आखिर इससे सामाजिक बदनामी के सिवा उन्हें और क्या हासिल होगा?

जाहिर है कि संबंधित कानूनों के कड़े किए जाने के बावजूद जहां बेटियों के कुसूरवारों को सबक सिखाना व सजा दिलाना मुश्किल बना हुआ है, तो इसके लिए उन कानूनों के पालन को के प्रति सरकार का रवैया ही जिम्मेदार है. इस रवैये का आलम यह है कि लखनऊ में बीएड व टीईटी पास होने के बावजूद बेरोजगारी की मार झेल रही महिला प्रदर्शनकारियों में से एक को पुलिस ने लाठियों के साथ लात से भी मारकर गिरा दिया और वह बेहोश हो गयी तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस भी नहीं मिल पायी.

योगी सरकार बेटियों पर तेजाब से किए जाने वाले हमलों को रोकने में भी नाकाम सिद्ध हो रही है. प्रदेश के अन्य जिलों की कौन कहे, गत दो जुलाई को राजधानी लखनऊ के अलीगंज थाना क्षेत्र में पहले सामूहिक बलात्कार और तेजाब हमले की शिकार हो चुकी एक महिला पर उसके हॉस्टल के पास ही एक बार फिर तेजाब ‘पिला’ दिया गया और योगी सरकार की महिला एवं परिवार कल्याण मंत्री रीता बहुगुणा जोशी का इंसाफ दिलाने का आश्वासन भी उसके कुछ काम नहीं आया.

ऐसे में किसी को तो योगी सरकार से पूछना चाहिए कि यह बेटियों की सुरक्षा है या उनसे छल? लेकिन कौन पूछे? जिस मीडिया को पूछना चाहिए उसने तो समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार की सत्ता से बेदखली के साथ ही प्रदेश में जंगल राज खत्म हुआ मान लिया है और अभी उसे सब कुछ हरा-हरा ही दिख रहा है. लेकिन आज इस छल की शर्म नहीं महसूस की गई तो कल बेटियों का टूटा हुआ भरोसा नये सामाजिक उद्वेलनों को जन्म दे सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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