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‘क्या आर्य-वैश्यों के पास कोई ऐसा अर्थशास्त्री नहीं है, जो मेरी किताब पर तर्क कर सके?’

साक्षात्कार: लेखक और चिंतक कांचा इलैया शेपहर्ड विवादों के लिए कोई नया नाम नहीं हैं. इस बार विवाद उनकी 2009 में लिखी किताब ‘पोस्ट-हिंदू इंडिया’ को लेकर है. इस किताब के तीखे विरोध के साथ उन्हें जान से मारने की धमकी मिली है. इस मसले पर उनसे विशेष बातचीत.

Kancha Ilaiah

कांचा इलैया और उनकी किताब (फोटो साभार: फेसबुक)

हैदराबाद की मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले कांचा इलैया शेपहर्ड ने अपनी किताब ‘ह्वाई आई एम नॉट अ हिंदू’ में जातिवादी व्यवस्था पर एक तीखी टिप्पणी की थी. इस बार विवाद उनकी 2009 में लिखी किताब ‘पोस्ट-हिंदू इंडिया’ को लेकर है. इस किताब में विभिन्न जातियों के बारे में लेखों की एक श्रृंखला थी, जिसका हाल ही में तेलुगू अनुवाद हुआ. इस किताब के एक लेख में आर्य-वैश्य यानी बनिया समुदाय को ‘सोशल स्मगलर’ (सामाजिक तस्कर) कहा गया है, जिसके बाद इलैया के ख़िलाफ़ इस समुदाय ने तीखा विरोध शुरू किया और उन्हें जान से मारने की धमकी मिली, साथ ही उन पर हमले की कोशिश भी की गई. इस पूरे विवाद पर उनसे फोन पर हुई बातचीत.

आपकी किताब  ‘पोस्ट-हिंदू इंडिया’ को लेकर क्या विवाद है?

जी, किताब में आर्य-वैश्य समुदाय को लेकर एक लेख था, जिसका हाल ही में तेलुगू में अनुवाद हुआ. इसके बाद इस समुदाय के लोगों ने इसकी आलोचना शुरू की.

इसके अलावा तेलुगू देशम पार्टी के राज्यसभा सांसद टीजी वेंकटेश, जो तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के आर्य-वैश्य समुदाय के सबसे अमीर व्यक्तियों में से हैं, ने मेरे ख़िलाफ़ फतवा जारी किया था कि वो मुझे बीच सड़क पर मार डालेंगे, जैसे मिडिल ईस्ट में लोगों को फांसी पर लटका दिया जाता है. ये 17 सितंबर की बात है…

लेकिन द हिंदू  से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई ‘फतवा’ जारी नहीं किया था, वे बस भावुक हो गए थे. हालांकि, उन्होंने माना कि उन्होंने चेताया था कि अगर इस किताब को बैन नहीं किया गया तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है.

स्थिति नियंत्रण से बाहर जाने से उनका क्या आशय था? क्या ये कि वे मुझे मार देना चाहते हैं या वे मेरी लिखी सभी किताबें ख़त्म कर देना चाहते हैं? स्थिति नियंत्रण से बाहर जाने का क्या मतलब होता है? देखिए, वे बहुत अमीर आदमी हैं, जो 50 एकड़ के घर में रहता है. संपत्ति जमा करने के कई आपराधिक मामलों में उनका नाम आ चुका है. मैंने एक किताब लिखकर मुझे मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का उपयोग किया है और उनके पास किसी बौद्धिक विमर्श के ज़रिये इसका विरोध करने का अधिकार है.

या उनके वो प्रोफेसर या शिक्षाविद् इस बात का जवाब दे सकते हैं, जो उनकी विचारधारा में विश्वास रखते हैं. तो साधारण-सी बात है, जो मैं बार-बार कह रहा हूं कि आर्य-वैश्य या बनिया समुदाय की भारतीय व्यापार में बड़ी भागीदारी है. चाहे अंबानी हो, अडानी या वेदांता जैसे समूह देश के उद्योगों में भारी निवेश इसी समुदाय से आ रहा है.

आंकड़ों के मुताबिक कॉर्पोरेट क्षेत्र के 46% डायरेक्टर इसी समुदाय के हैं. तो मेरा सवाल ये है कि अन्न उपजाने वाले किसान फसल ख़राब होने जैसे कारणों से मर रहे हैं. तो इनकी क्या ज़िम्मेदारी है? मैं इसीलिए निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात कहता हूं. ऐसा नहीं है कि इन्हीं लोगों में योग्यता है, हमारे यहां भी लायक लोग हैं.

किस तरह की धमकियां मिल रही हैं?

कुछ ने धमकी दी कि मेरी ज़बान काट देंगे, एक नेता का कहना था कि मुझ पर शारीरिक हमला किया जाएगा. 23 सितंबर को परकाल (वारंगल, तेलंगाना) में मुझ पर हमला करने की कोशिश की गई. मुझे मारने के इरादे से मेरी कार पर हमला किया गया था. उस भीड़ के हाथ में चप्पलें और पत्थर थे. अब ऐसे लोग हर जगह फैल गए हैं.

इस समुदाय ने अपने लोग तैनात कर दिए हैं. इन लोगों को खरीदा गया है. औरतें आकर मेरे फोटो फाड़ रही हैं, बच्चों से मेरी तस्वीर पर पेशाब करने को कहा जा रहा है. वे फोन पर अभद्र गालियां दे रहे हैं. ये कौन-सी संस्कृति है?

वे कहते हैं कि वे महात्मा गांधी के समुदाय से आते हैं, लेकिन महात्मा गांधी का आंबेडकर से बहुत लोकतांत्रिक संबंध था. वही आंबेडकर जिन्होंने ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ लिखी. इस पर गांधी ने कहा था कि ऐसी स्थिति में आप इससे ज़्यादा कड़वाहट भरा भी लिख सकते थे.

लेकिन मैं ये नहीं कहता कि हम दलितों को हिंदू धर्म से अलग कर दें. पर ये समुदाय क्या कर रहा है! क्या 21वीं सदी में भी पूरी औद्योगिक और बौद्धिक ताकत इस समुदाय के पास होने के बावजूद उनके पास कोई ऐसा अर्थशास्त्री नहीं है, जो मेरी लिखी किताब पर तर्क कर सके, उसका खंडन कर सके?

क्या आपकी शिकायतों पर मुख्यमंत्री या सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई?

जी नहीं. अब तक तेलंगाना सरकार ख़ासकर मुख्यमंत्री (के. चंद्रशेखर राव) ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है. लेकिन इनके कई मंत्री लगातार आर्य-वैश्य समुदाय के लोगों के साथ उठ-बैठ रहे हैं, मेरे ख़िलाफ़ बयान दे रहे हैं.

लेकिन उन्होंने (के. चंद्रशेखर राव) मुझे मिली जान से मारने की धमकियों की निंदा नहीं की है, चाहे वो टीजी वेंकटेश द्वारा दी गई या किसी और द्वारा. यानी ये साफ है कि एक पीड़ित नागरिक को बचाने की बजाय सरकार की दिलचस्पी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करने, डराने और जान से मारने की धमकी देने वालों को बचाने में है.

आपने सुरक्षा की मांग भी की थी?

मैंने दो एप्लीकेशन दी थीं, पर उस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. स्थानीय पुलिस थाने में एक एप्लीकेशन मेरे दोस्त ने भी दी थी, कहते हैं उसे ऊपर भेज दिया गया है. उच्च स्तर पर कमिश्नर, डीआईजी को भी निवेदन किया गया है, लेकिन अब तक मुझे किसी भी तरह की सुरक्षा मुहैया नहीं करवाई गई है.

जहां तक मेरी शिकायत की बात है तो परकाल में हुई घटना पर मामला दर्ज कर लिया गया है. टीजी वेंकटेश की धमकी वाले मामले में मीडिया में आई पुलिस रिपोर्ट कहती है कि उन्हें मेरी शिकायत मिली है, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. मैं नहीं जानता कि इसका क्या कारण है.

टीजी वेंकटेश के बयान के बाद कुछ लोगों ने आपको ‘विदेशी एजेंट’ कहा.

मेरा सवाल है कि किसी स्कॉलर को, जो किताबें लिख रहा है कैसे विदेशी कहा जा सकता है? क्या मैंने कोई बड़ी रैली आयोजित की, हवाई जहाज़ खरीदा? मैं सिर्फ शिक्षा में अंग्रेज़ी माध्यम लाने की बात कर रहा हूं, उसके लिए अभियान चला रहा हूं. बतौर लेखक मैं अपना पैसा कमा रहा हूं. कोई भी मेरी शैक्षणिक योग्यता देख सकता. उन्होंने हाईकोर्ट में केस भी दर्ज करवाया है, तो कोर्ट को फैसला करने देते हैं.

मैं क़ानून का पालन करने वाला नागरिक हूं, लेकिन मैं शारीरिक नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी धमकी, जो मौत में भी बदल सकती है, को ज़रा भी बर्दाश्त नहीं करूंगा क्योंकि बुद्धिजीवियों को मिलने वाली इस तरह की धमकियों की वजह से ही देश में उस तरह का ज्ञान पैदा नहीं हो रहा है, जिससे देश में बदलाव आ सकें.

ऐसा कहा जा रहा है कि आपने अपनी इस किताब में लिखीं कुछ बातों को वापस लेने के लिए कुछ मांगें रखी हैं. 

जी. मेरा कहना है कि ये किताब साल 2009 में निजी क्षेत्र में आरक्षण देने के मुद्दे के संदर्भ में लिखी गई थी. 2007 में कांग्रेस के निजी क्षेत्र में आरक्षण देने के प्रस्ताव पर शुरू किया था. आज 2017 का निजी क्षेत्र 2007 के मुकाबले दोगुना-तिगुना समृद्ध है. इसी समय पर देश किसान आत्महत्या और ऐसी कई परेशानियों से जूझ रहा है.

मेरा सवाल है कि क्या निजी क्षेत्र की सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वो इन किसानों की सुरक्षा के लिए फंड दें? भले ही उनके मुनाफे का 1 प्रतिशत हो, मेरे हिसाब से वही काफी होगा.

मैं नहीं समझ पाता कि आप कैसे ख़ुद को राष्ट्रीय उद्योग कहते हैं जब आपका अन्न उपजाने वाला ही मर रहा है और आप उनकी मदद नहीं कर रहे? किसानों के लिए कोई अंबानी फाउंडेशन, अडानी फाउंडेशन सामने नहीं आता. और जबसे भाजपा सरकार आई है तबसे यूरोप और अमेरिका की फाउंडेशन की मदद भी बंद हो गई है. फोर्ड फाउंडेशन की मदद बंद हुई न. वही भारतीय उद्योगों की तरफ से किसी तरह की मदद करने वाली या परोपकारी संस्थाएं नहीं बनाई गई हैं.

भाजपा की नोटबंदी ने प्राइवेट सेक्टर को और समृद्ध बनाया है. वे सैनिकों को देशभक्ति का प्रतीक बना रहे हैं, पर चीन, पाकिस्तान या कश्मीर सीमा पर खड़े फुट सोल्जर किस हाल में हैं. उनमें ज़्यादातर एससी, एसटी और ओबीसी हैं. उन्हें 20-25 हज़ार रुपये महीना मिलता है, उनके मां-बाप उनसे संपर्क नहीं कर पाते. मैं इन सिपाहियों के परिवारों के एक सदस्य के लिए प्राइवेट जॉब मांग रहा हूं.

अगर वो इतने देशभक्त हैं तो उन्हें इनके परिवारों के लिए कुछ करना होगा. प्रधानमंत्री और भाजपा सरकार बार-बार कहते हैं कि वो दलितों और सिपाहियों की चिंता करते हैं लेकिन वो ज़मीन पर कहां दिख रही है? उस समुदाय के लिए कौन-सा ऐसा कदम उठाया गया, जिससे उनकी ज़िंदगी में कोई बदलाव आया. वही समुदाय जिससे वे आने का दावा करते हैं.

अगर वे कहते हैं कि ये हिंदू राष्ट्र है, हिंदू उद्योग हैं, तो उन्हें ईसाई फिलान्थ्रोपिक (परोपकारी) संस्थाओं से ज़्यादा मददगार होना चाहिए. उनका दावा है कि 80 फीसदी लोग हिंदू हैं, आपका मुस्लिमों, ईसाइयों से प्रतिरोध हो सकता है, लेकिन इन्हें तो आप हिंदू मानते हैं, इनके लिए क्या किया जा रहा है?

ये किताब 2009 में अंग्रेज़ी में लिखी गई थी, लेकिन अब 2017 में जब इसका अनुवाद तेलुगू में हुआ तब इस पर विवाद खड़ा हुआ. अगर बीते सालों में लेखकों पर हुए हमलों पर ध्यान दें तो दिखता है कि ये सभी स्थानीय भाषाओं में लिखने के कारण हुए, चाहे वो दाभोलकर हों, कलबुर्गी या गौरी लंकेश. तो क्या ये कहा जा सकता है कि आम जनता तक अपनी बात स्थानीय भाषा में ही पहुंचाई जा सकती है?

यहां मैं दो तथ्य रखना चाहूंगा. पहला तो ये अंग्रेज़ी लिखने-पढ़ने वाली जनता ज़्यादा तर्कशील है… वहीं स्थानीय भाषा जानने-समझने वाले उतने प्रबुद्ध नहीं हैं. इसलिए ये तो साफ़ है कि सामुदायिक स्तर पर नाराज़गी बढ़ने की संभावनाएं स्थानीय भाषा में अनुवाद आने के बाद बढ़ जाती हैं.

और अगर मैं इस पूरे विवाद की बात करूं तो स्थानीय भाषा के अख़बारों ने, चाहे संपादकीय हो या ख़बर उन्होंने भावनाओं की पुष्टि की न कि इस पूरे मसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बतौर देखा. तो यह कह सकते हैं कि स्थानीय भाषा के विमर्श में एक भावनात्मक रूढ़िवादिता तो देखने को मिलती है. वही रूढ़िवादिता पब्लिक सेंटीमेंट के रूप में आगे बढ़ती है.

वहीं अंग्रेज़ी मीडिया पूरे मसले को एक अलग नज़र से देखती है. जैसे यह कैसे गलत नहीं है कि आप पूरी एक जाति को चिह्नित कर देते कि दलित ‘अछूत’ हैं या ओबीसी ‘समझदार’ नहीं होते, ‘अयोग्य’ होते हैं, लेकिन जब आर्य-वैश्य को ‘सोशल स्मगलर’ कहा गया तब ये गलत है. तो यह भावनाओं की यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) समझ के बारे में है.

जैसे अंग्रेज़ी पढ़ने वाले ज़्यादातर लोग एडम स्मिथ की ‘मोरल सेंटीमेंट्स’ (नैतिक भावनाओं) की थ्योरी से परिचित हैं, लेकिन तेलुगू में इस बारे में कोई नहीं जानता. यहीं एक मुख्य अंतर है जो मैंने देखा. इसके बारे में मैं आगे लिखूंगा भी.

लेखकों पर हमले कोई नई बात नहीं रह गए हैं, चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, ये हमले होते रहे हैं. क्या कोई भी सरकार लेखकों या बुद्धिजीवियों को सुरक्षित और भयमुक्त माहौल दे सकती है? क्या जो वो असल में महसूस करते हैं, वो लिखने की आज़ादी उन्हें मिल सकती है?

ये सही है लेकिन यहां बड़ा मुद्दा है कि जबसे भाजपा सत्ता में आई है, तबसे ये ‘मॉब लिंच’ (समूह में घेरने की) संस्कृति ज़्यादा दिखाई देने लगी है. चाहे वो खाने-पीने की बात हो या कोई और. तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के इस क्षेत्र में एक राजनीतिक दल के बतौर भाजपा दलितों के किसी भी प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बनती लेकिन जब भी कभी ऐसा (आर्य-वैश्य विवाद) कोई मुद्दा होता है, वे पहुंच जाते हैं. जहां किसी भी अमीर समुदाय की बात होती है, ये उनका समर्थन करते हैं. ये लोकतंत्र नहीं है.

प्रधानमंत्री गांधी और बुद्ध की बात करते हैं, पर जब दलितों पर कोई हमला होता है तब उनका रवैया इनकी शिक्षाओं के बिल्कुल उलट होता है. दलितों, आदिवासियों के अधिकारों के लिए उन्होंने कभी कोई विरोध प्रदर्शन आयोजित नहीं किया.

मैं फिर यही कहूंगा कि भाजपा के आने के बाद ये डर और बढ़ गया है. इनकी सरकार में आध्यात्मिक लोग यानी साधु-संन्यासी ज़्यादा सक्रिय हो गए हैं. गोरक्षा राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है. लिंचिंग की घटनाएं बढ़ गई हैं. और अगर कोई इनकी नीतियों पर सवाल उठाता है, तो उसे खुलेआम धमकी दी जाती है.

मेरा ही उदाहरण देख लें. मैं कोई अजनबी नहीं हूं. कभी कोई स्थानीय लेखक नहीं रहा. मैं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिखता रहा हूं, टीवी डिबेट का हिस्सा रहा, भाजपा के प्रवक्ताओं से भी मेरी बात होती रही है, लेकिन वे कह रहे है कि मैं भाजपा का सतत आलोचक रहा हूं. और आज कांग्रेस के समय में लिखी हुई एक किताब पर इतना विवाद हो रहा है. भाजपा की मानसिकता बौद्धिकों और समाजविज्ञानियों के ख़िलाफ़ है.

ये तो दक्षिणपंथियों की बात हुई, लेकिन आप कहते रहे हैं कि लेफ्ट और लिबरल्स भी दलितों के प्रति भेदभाव का रवैया रखते हैं.

जी, वे रहे हैं. मेरा मुद्दा यही है कि इस आर्य-वैश्य अर्थव्यवस्था और सोशल स्मगलिंग से जुड़े मुद्दे पर लेफ्ट और लिबरल्स चुप्पी ही क्यों साधे हुए हैं. वे इसकी आलोचना कर सकते थे कि ये कॉन्सेप्ट सही नहीं है. इस समुदाय पर लागू नहीं होता, भारतीय उद्योग ख़रीद-फरोख़्त में पूरी तरह से पारदर्शी रही है. ये केवल एक ‘बनिया बाज़ार’ नहीं है.

तो न ही लिबरल्स न ही लेफ्ट से कोई सामने आ रहा है और इस पर बात कर रहा है. मैं एक आधारभूत सवाल उठा रहा हूं कि क्या भारतीय उद्योग की अन्न उपजाने वालों के प्रति कोई नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है. ये कोई मुस्लिम या ईसाई का मुद्दा नहीं है. तो इस पर चुप्पी क्यों? ये कास्ट नहीं, क्लास का भी मसला है. यहां मैं इस परेशानी पर लेफ्ट शिक्षाविदों का नज़रिया जानना चाहता हूं.

ऐसा भी कहा जा रहा है कि मीडिया का एक वर्ग इस मुद्दे को ठीक से रिपोर्ट नहीं कर रहा है. आपके प्रति भेदभाव बरता जा रहा है. क्या आपको भी ऐसा लगता है?

नहीं. देखिए, इन दो तेलुगू भाषी राज्यों में मीडिया दो भागों में बंटा हुआ है. एक पक्ष इस बहस को बैलेंस करने की कोशिश कर रहा है. तेलुगू अख़बारों का रवैया थोड़ा रुढ़िवादी है. उन्होंने एक भी ऐसा संपादकीय नहीं छापा कि ये अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है. वहीं अंग्रेज़ी मीडिया अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में दिखता है, जबकि ये मीडिया उन्हीं उद्योगपतियों द्वारा चलाया जाता है. मुझे लगता है वहां अभी उम्मीद बाकी है.

हां, ये ज़रूर है कि दलितों के मुद्दों, उन पर अत्याचार की ख़बर सामने नहीं आतीं, जिस तरह से वो लाई जानी चाहिए. जैसे सवर्णों की ख़बरें आती हैं. और बड़ी वजह यह भी है कि मीडिया में उच्च पदों पर ज़्यादातर सवर्ण ही हैं. लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि ऐसी कई सवर्ण महिलाएं हैं जो दलितों और आदिवासियों के मुद्दों के प्रति संवेदनशील हैं.

आपने ख़ुद को 4 अक्टूबर तक घर में नज़रबंद करने की बात कही थी, अब क्या स्थिति है? क्या आप बाहर आ-जा रहे हैं?

हां, मैंने 5 तारीख को उस्मानिया यूनिवर्सिटी में भारत में अंग्रेज़ी शुरू होने के 200 साल पूरे होने पर हो रहे कार्यक्रम में शिरकत की थी. साथ ही उस दिन मेरा 65वां जन्मदिन भी था. इसके बाद हमने उस्मानिया से ही दोनों तेलुगू भाषी राज्यों के सभी सरकारी स्कूलों को अंग्रेज़ी माध्यम में बदलने के लिए एक आंदोलन शुरुआत की.