प्रासंगिक

जब जेपी के जीवित रहते हुए संसद ने उन्हें श्रद्धांजलि दे दी थी…

जन्मदिन विशेष: गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत भले ही डाॅ. राममनोहर लोहिया ने दिया था लेकिन उसकी बिना पर कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से पहली बेदखली 1977 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के तत्वावधान में ही संभव हुई.

साभार: competitionzenith.blogspot.in

साभार: competitionzenith.blogspot.in

हमारी आज की युवा पीढ़ी के कम ही लोग जानते होंगे कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के लंबे सार्वजनिक जीवन का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग उनके निधन से दो सौ दिन पहले 23 मार्च, 1979 को घटित हुआ था.

दुर्भाग्यपूर्ण होने के बावजूद होने के बावजूद वह इस अर्थ में दिलचस्प है कि उसने उन्हें इस देश तो क्या दुनिया का इकलौता ऐसा नेता बना दिया, जिसे उसके देश की संसद ने उसके जीते जी ही श्रद्धांजलि दे डाली थी!

उस रोज दरअसल हुआ यह कि जब वे अपने गुर्दों की लंबे अरसे से चली आ रही बीमारी से पीड़ित होकर मुंबई के जसलोक अस्पताल में मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे, सरकार नियंत्रित आकाशवाणी ने दोपहर बाद एक बजकर दस मिनट पर अचानक खबर देनी शुरू कर दी कि उनका निधन हो गया है.

उस वक्त उनके ही अहर्निश प्रयत्नों से संभव हुई कांग्रेस की बेदखली के बाद सत्ता में आयी जनता पार्टी का शासन था और हद तब हो गयी थी, जब आकाशवाणी की खबर की पुष्टि कराये बगैर तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष केएस हेगड़े ने प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के हवाले से लोकसभा को भी उनके निधन की सूचना दे डाली और श्रद्धांजलियों व सामूहिक मौन के बाद सदन को स्थगित कर दिया.

खबर सुनकर लोग अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन के लिए जसलोक अस्पताल पहुंचने लगे तो जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर अस्पताल में ही थे. उन्होंने बाहर आकर लोगों से क्षमायाचना की और बताया कि लोकनायक अभी हमारे बीच हैं.

हम जानते हैं कि 23 मार्च को समाजवादी नेता डाॅ. राममनोहर लोहिया की जयंती होती है और ऐन इस जयंती के ही दिन जेपी को जीते जी श्रद्धांजलि की शर्मनाक विडंबना तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई व उनकी सरकार के गले आ पड़ी तो गलती सुधारने के लिए लोकसभा के स्थगन के चार घंटे बाद ही फिर से उसकी बैठक बुलानी पड़ी और विपक्षी कांग्रेस के सांसदों ने इसको लेकर उनकी सरकार की खूब ले दे की.

बहरहाल, जीते जी मिली संसद की इस ‘श्रद्धांजलि’ के बाद जेपी दो सौ दिनों तक हमारे बीच रहे और 8 अक्टूबर, 1979 को इस संसार को अलविदा कहा, जिसके लंबे अरसे बाद 1998 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया.

अपने विद्यार्थीकाल से ही अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ बहुविध सक्रिय रहे जेपी ने स्वतंत्रता के बाद राजनीति को लोकनीति में परिवर्तित करने के प्रयत्नों में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. आचार्य विनोबा भावे के सर्वोदय व भूदान आंदोलनों से आकर्षित होकर उनकी तरफ गये और चम्बल के डकैतों के आत्मसमर्पण व पुनर्वास में भी अप्रतिम योगदान भी दिया.

लेकिन सच पूछिये तो देश की सबसे बड़ी सेवा उन्होंने 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मनमानियों के खिलाफ छात्र असंतोष के रास्ते शुरू हुए व्यापक आन्दोलन का नेतृत्व करके की. इसी दौरान पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का ऐतिहासिक आह्वान किया.

यह आंदोलन चल ही रहा था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली लोकसभा सीट से प्रतिद्वंद्वी रहे राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया.

इसके मद्देनजर 25 जून, 1975 को जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में नागरिकों और सरकारी अमलों/बलों से उनके असंवैधानिक आदेशों की अवज्ञा की अपील कर दी, तो सहम से भरी इंदिरा गांधी ने न सिर्फ देश पर इमरजेंसी थोप दी, बल्कि जेपी समेत लगभग सारे विपक्षी नेताओं को जेल में ठूस कर नागरिकों के संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकार छीन लिये.

उस उन्नीस महीने लंबे अंधेरे में जेपी ने इकलौते रोशनदान की भूमिका निभायी और 1977 में इंदिरा गांधी द्वारा अपनी जीत की गलतफहमी में कराये गये आमचुनाव में व्यापक विपक्षी एकता के सूत्रधार बने. फलस्वरूप वे करारी हार हारीं और देश को ‘दूसरी आजादी’ मिली.

गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत भले ही डाॅ. राममनोहर लोहिया ने दिया था, उसकी बिना पर कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से पहली बेदखली 1977 में जेपी के तत्वावधान में ही संभव हुई, जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार ने सत्ता संभाली.

यह और बात है कि जेपी के कई अन्य प्रयोगों की तरह उनका जनता पार्टी नाम का यह राजनीतिक प्रयोग भी दीर्घकालिक या सफल नहीं हो सका, लेकिन इससे ऐतिहासिक परिघटना के रूप में उसका महत्व कम नहीं हो जाता. यह चमत्कार ही था कि जनता पार्टी विधिवत गठित बाद में हुई और देश की सत्ता में पहले आ गई थी.

जेपी के शुरुआती जीवन पर जायें तो स्वदेश में आरंभिक शिक्षा के बाद 1922 से 1929 तक उन्होंने अमेरिका में रहकर समाज-शास्त्र में एमए किया और कैलीफोर्निया व विस्कांसन विश्वविद्यालयों की महंगी पढ़ाई का नाकाबिल-ए-बर्दाश्त खर्च जुटाने के लिए खेतों, कंपनियों व रेस्टोरेन्टों आदि में छोटे-मोटे काम किये.

इस तरह एक साथ पढ़ाई व कमाई का साथ निभाते हुए वे कार्ल माक्र्स के समाजवाद से खासे प्रभावित हुए, जिसने उनकी आगे की वैचारिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, हालांकि उनके समाजवादी मानस के निर्माण का बड़ा श्रेय बिहार विद्यापीठ को दिया जाता है.

मां की बीमारी के चलते पीएचडी करने का अपना इरादा अधूरा छोड़ जेपी अमेरिका से लौटे, तो स्वतंत्रता संग्राम को जैसे उनका ही इंतजार था. 1932 में इस संग्राम के महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू समेत ज्यादातर नेताओं को जेल में डाल दिया गया तो जेपी ने देश के कई हिस्सों में उसके नेतृत्व का जिम्मा संभाला. लेकिन सितंबर, 1932 में मद्रास में उन्हें भी गिरफ्तार कर नासिक जेल में डाल दिया गया.

इस जेल में ही अनेक समाजवादी नेताओं से विचार-विमर्श करके उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन की भूमिका तैयार की, जिसने 1934 के चुनावों में भाग लेने के कांग्रेस के फैसले का कड़ा विरोध किया.

1939 में उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध में जीत के अंग्रेजों के प्रयत्नों में बाधा डालने के लिए सरकार को किराया व राजस्व का भुगतान रोकने का अभियान चलाया और टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल कराकर इस्पात की आपूर्ति में भी बाधा डाली. इस पर उन्हें नौ महीने की कैद की सजा सुनाई गई.

1942 में ‘भारत छोडो’ आंदोलन में उन्हें मुंबई की आर्थर रोड जेल में निरुद्ध किया गया तो एक योजना के तहत वहां से फरार होकर ‘आजाद दस्तों’ के गठन व प्रशिक्षण के लिए वे नेपाल चले गये.

सितंबर 1943 में पंजाब में एक रेल यात्रा के दौरान पुलिस ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया और अप्रैल, 1946 में तब छोड़ा, जब गांधी जी ने साफ कह दिया कि उनकी रिहाई के बिना अंग्रेजों से कोई समझौता नामुमकिन है.

19 अप्रैल, 1954 को बिहार के गया में उन्होंने अपना जीवन सर्वोदय व भूदान आंदोलनों के लिए समर्पित कर दिया और 1957 से ‘राजनीति’ के बजाय ‘लोकनीति’ करने लगे.

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीकाल तक वे इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी व अशिक्षा आदि की समस्याएं इस व्यवस्था की ही उपज हैं और तभी दूर हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और, सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति, ’सम्पूर्ण क्रांति’ आवश्यक है.

उनकी संपूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल थीं-राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)