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ई-कॉमर्स एकाधिकार और उपनिवेशवाद का ख़तरनाक ज़रिया है

विश्व व्यापार संगठन की आगामी मंत्री वार्ता में ई-कॉमर्स को विषय के रूप में शामिल करने की ख़तरनाक कवायद इसलिए है कि डाटा के खुले प्रवाह, इंटरनेट के व्यापार के लिए मुक्त उपयोग और दुनिया की बड़ी सूचना तकनीक कंपनियों के एकाधिकार को मान्यता दिलाई जा सके.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

सूचना तकनीक और इससे जुड़े उपकरण क्या हमें मशीन बना देंगे? जब हम किसी जीव से बंदर, बंदर से वनमानुष और वनमानुष से मानव बनते हैं, तब इसमें हमारा व्यवहार, परिवेश, रहन-सहन से तय होता है कि हम क्या बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं?

इंटरनेट, सूचना उपकरण और जानकारियों के तूफ़ान का वर्तमान दौर हमें क्या बनाएगा? बस यूं ही उल्लेख कर देना चाहता हूं कि इंटरेक्टिव डाटा कॉर्पोरेशन के मुताबिक विश्व में जानकारियों/डाटा का बाज़ार वर्ष 2016 में 130.1 अरब डॉलर का था, जो वर्ष 2020 तक बढ़कर 203 अरब डॉलर का हो जाएगा.

जो जानकारियों/डाटा पर नियंत्रण रख रहा हैं, वह दुनिया के व्यापार और व्यवहार को नियंत्रित करेगा. यह वर्तमान ई-कॉमर्स का सिद्धांत वाक्य है.

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की 10 से 13 दिसंबर 2017 को  ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना में होने वाली 11वीं मंत्री वार्ता में ई-कॉमर्स को वार्ता के विषय के रूप में शामिल करने की ख़तरनाक कवायद जारी है ताकि डाटा/जानकारियों के खुले प्रवाह, इंटरनेट के व्यापार के लिए मुक्त उपयोग और दुनिया के सबसे बड़ी सूचना तकनीक कंपनियों के एकाधिकार को मान्यता दिलाई जा सके.

वर्ष 2016 में इंटरनेट के ज़रिये कुल 1.95 लाख करोड़ डॉलर की खरीद-बिक्री हुई. यह वर्ष 2020 में बढ़कर 4 लाख करोड़ डॉलर होने की संभावना है. इसका मतलब है कि इंटरनेट, मोबाइल-स्मार्टफोन और सूचना तकनीक कंपनियों का प्रभुत्व भयानक तरीके से बढ़ रहा है.

डिजिटल आर्थिकी यानी कम्प्यूटर-इंटरनेट के ज़रिये खरीद-बिक्री के व्यवहार और नियोजन अब जीवन के केंद्र में आ गए हैं. इसे केवल 8 नवंबर 2016 को भारत में की गई नोटबंदी या पेटीएम या डेबिट-क्रेडिट कार्ड से होने वाले भुगतान तक सीमित रखकर मत देखिये.

ई-कॉमर्स का नया अर्थ है डाटा-जानकारियों का मुक्त प्रवाह, सूचना तकनीक और सूचनाओं पर कोई स्थानीय क़ानून या नियंत्रण नहीं, हर व्यक्ति के निजी जीवन में प्रवेश और जानकारियों के आधार पर हमारे व्यवहार को बदलने की स्वतंत्रता; वास्तव में दुनिया की पांच भीमकाय व्यापार इकाइयों- माइक्रोसॉफ्ट, एपल, फेसबुक, अल्फाबेट (गूगल) और अमेज़न दुनिया में सूचना तकनीक, तकनीकी उत्पाद और उत्पादों के व्यापार के सर्वशक्तिमान समूह हैं.

इनके हाथ में सूचना तंत्र और तकनीक का पूरा नियंत्रण है. आज जबकि बैंकिंग, परिवहन, स्वास्थ्य, लेन-देन, दूरसंचार, पर्यटन, निगरानी से लेकर शिक्षा के बुनियादी ढांचे तक सब कुछ डिजिटल तकनीक और इंटरनेट के ज़रिये संचालित हो रहा है और कम्प्यूटर-इंटरनेट का तंत्र व्यापक रूप से इन पांच इकाइयों के हाथ में है; तब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इनकी ताकत की हद क्या है?

क्या इन्हें कोई भी सरकार नियमों में बांध सकती है? अर्थव्यवस्था का उदारीकरण तो प्रतिस्पर्धा की मुहावरा सुनाता है, जब इन पांच का एकाधिकार है, तब कोई दूसरा बाज़ार में कैसे टिकेगा?

वास्तव में कुछ चुनिंदा कंपनियों ने हमारे प्राकृतिक-सामाजिक-आर्थिक जीवन चक्र को अपने कब्ज़े में ले लिया है. हमारे संसाधन, भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर हमारे आपसी रिश्तों तक उनके शासन का विस्तार है.

ई-कॉमर्स का अर्थ और दायरा

इंटरनेट या अन्य कम्प्यूटर नेटवर्क के माध्यम से उद्यम, परिवार, व्यक्तियों, सरकारों और अन्य सार्वजनिक या निजी संस्थानों के बीच सेवाओं और वस्तुओं की खरीद-बिक्री की व्यवस्था को ई-वाणिज्यिक और व्यापारिक कार्य (इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स) के रूप में परिभाषित किया गया है.

(फोटो: रॉयटर्स)

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वस्तु से लेकर सेवाओं तक सब कुछ इंटरनेट पर खोजिये और उसके लिए आदेश दे दीजिए; सब कुछ घर पर हाज़िर होगा. अब तो डॉक्टर को आपकी नब्ज़ देखने की भी ज़रूरत नहीं होगी, शिक्षा के लिए शिक्षक की ज़रूरत नहीं होगी.

हम अपनी अकेले की एक दुनिया बना सकेंगे, जिसमें कोई और नहीं होगा. उस दुनिया में हम सब्ज़ी वाले या किसान या किराना वाले के बारे में कोई संवेदना नहीं रखेंगे.

हमें कभी पता नहीं चलेगा कि जो चावल हम खा रहे हैं या जिस मेज पर बैठे हैं, उसका उत्पादक या निर्माता कौन है?

कुल मिलकर हम एक ‘जीवन और संवेदनाविहीन’ बाज़ार के हिस्से होंगे. थोड़ा सोचिये कि क्या आज हमारे शहरी और मध्यमवर्गीय समाज के बच्चों को यह पता है कि जो खाना हम खाते हैं, वह कहां से आता है?

कौन उसका उत्पादन करता है? उन्हें यही मालूम है कि आटा या चावल डिपार्टमेंटल स्टोर से आता है और दूध कोई कंपनी पैदा करती है, जो हमें पैकेट में मिल जाता है.

ई-कॉमर्स रिश्तों में इसी दूरी को इतना विशाल बना देने वाला है कि हमें समाज के दूसरे तबके के बारे में कुछ पता नहीं होगा. इसके साथ ही तकनीक और जानकारियों पर भी एकाधिकार बढ़ता जाएगा.

ई-कॉमर्स वर्तमान कार्यक्षेत्रों में से कई स्तरों पर रोज़गार के अवसर कम करेगा.

ज़रा यह जानिये कि दुनिया के 600 से ज़्यादा शहरों में यात्री परिवहन की सेवा देने का काम करने वाली कंपनी ‘उबर’ के पास न तो टैक्सियां हैं, न वाहन चालक हैं.

वह कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर कार्यक्रम के ज़रिये टैक्सी और यात्रा करने वाले व्यक्ति को जोड़ती है. उसके पास यह तकनीक है, जिससे यह पता चल जाता है कि आप जिस इलाके में खड़े हैं, वहां अभी टैक्सियों की कमी है या आपके स्मार्ट फोन की बैटरी खत्म हो रही है.

बस इसी आधार पर वह यात्रा की कीमत बढ़ा देती है. दवाओं से लेकर सब्ज़ी तक की सामग्रियां कुछ मिनटों में हमारे घर पर पहुंचाने की व्यवस्था बढ़ती जा रही है. मुनाफा उबर को तो है ही.

अपन अमेज़न के बारे में जानते हैं. हर स्मार्टफोन, कम्प्यूटर और टैबलेट पर अमेज़न का अवतरण हो चुका है. यह एक इलेक्ट्रॉनिक व्यापार कंपनी है. इसका विज्ञापन कहता है कि अमेज़न 10 करोड़ से ज़्यादा तरह के उत्पाद बेचती है.

सुई से लेकर घास, कपड़े, बीज, पेड़, दवा, बर्फी; सबकुछ; लेकिन इनमें से कुछ भी वह निर्मित नहीं करती है. उसका कोई कारखाना नहीं है.

वह इंटरनेट के ज़रिये दुनिया भर में लोगों को चित्र और वीडियो दिखाती है, सामान के लिए आदेश देती है और अन्य उत्पादकों से सामान लेकर बेच देती है. बिना उत्पादन किये ई-कॉमर्स से ही उसे सालाना 8900 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल होता है.

आजकल कम्प्यूटर ज़रूरी हो गया है, अब इसमें इंटरनेट भी जुड़ गया है. इंटरनेट जानकारियों और सूचनाओं की बाढ़ ही नहीं ला रहा है, वह हमें जानकारियों के ज़रिये वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करने का आदी भी बना रहा है.

बिना मांगे हमें अंतः वस्त्रों के चित्रमय विज्ञापन मिल जाते हैं. विभिन्न रंगरूप, डिजाइन और आकार के अंतःवस्त्र. वह मन से खेलता है.

अब बस से लेकर ट्रेन और हवाई जहाज़ के टिकट भी इंटरनेट पर मिलते हैं. आप एक बार दिल्ली से हैदराबाद के टिकट के बारे में ‘बस जानकारी’ देखिये, इसके बाद आपके ईमेल, मोबाइल फोन, फेसबुक आदि पर अपने आप दिल्ली से हैदराबाद के टिकट और किराए की जानकारी अगले एक महीने तक आती रहेगी.

इंटरनेट कंपनियां हमारे हर व्यवहार पर नज़र रखती हैं और देखती हैं कि हम क्या खोज रहे हैं? यह जानकारी इकट्ठा करके वह हमें हज़ारों विकल्पों में दबा देती हैं.

(फोटो: रॉयटर्स)

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एडिडास के मुताबिक जानकारियां/आंकड़े तेल हैं और उपभोक्ता से जुड़ने के लिए जानकारी का विश्लेषण उसका इंजन है.

कपड़े वाली कंपनी यह जानकारी इकट्ठा करती है कि 6 महीने का बच्चे, पांच साल के बच्चे, 16 साल की लड़की, यात्रा आधारित काम करने वाली स्त्री को किस तरह के कपड़े चाहिए? जो लोग हवाई जहाज से यात्रा करते हैं, उन्हें पैर लटका कर बैठना होता है, उनके लिए किस किस्म की जुराबें हों.

स्कूल-पूर्व शिक्षा के तहत आज के माहौल में बच्चों को क्या सिखाया जाना चाहिए, यह जानकारी किताबें-पुस्तकें-सामग्री बनाने वाली कंपनी बहुत उपयोग में लाती हैं.

कारें चलाने के लिए व्यक्ति नहीं, बल्कि कम्प्यूटर का सॉफ्टवेयर बन गया है. जूते अब केवल पहनने का सामान नहीं हैं, बल्कि अब इसे ‘स्वास्थ्य उत्पाद’ बना दिया गया है.

भारत सरकार पूरी शिद्दत के साथ किसी भी तरह से व्यक्ति की जैविक सूचना के साथ विशेष पहचान (आधार) की नीति पर काम कर रही है. आधार वास्तव में केवल एक पहचान संख्या नहीं है. इससे हर व्यक्ति की हर तरह की बेहद निजी जानकारी (टेलीफोन नंबर, बैंक खाता, हमारे स्वास्थ्य, जीवन बीमा आदि) को भी जोड़ा जा रहा है.

इन जानकारियों की बाज़ार को बहुत ज़रूरत है. हम किस उम्र के हैं, हमारी आय कितनी है, हम कहां यात्रा करते हैं, हमारा बैंक खाता कहां है, ये सभी जानकारियां अलग-अलग कंपनियां अपना उत्पाद बनाने में इस्तेमाल करेंगी.

बैंक हमसे जमा के बारे में बात करेगा, बीमा कंपनी बीमा की योजना पेश करेगी, निवेश कंपनी कहेगी आपके खाते में इतनी राशि है, ये हमें दे दीजिए, अस्पताल वाले इलाज की योजना देंगे; इनमें से हर एक हमसे मुनाफा कमाना चाहेगा.

असुरक्षा भी चरम पर होगी.

डब्ल्यूटीओ में ई-कॉमर्स को तवज्जो दिए जाने के पीछे का तर्क यह है कि इससे मझौले और छोटे उद्यमियों को लाभ मिलेगा. उनके व्यापार को एक आधार मिलेगा, पर सच तो यह है छोटे और मझौले उद्यमी माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फ्लिपकार्ट, अमेज़न या ई-बे सरीखे सूचना तकनीक के भयानक खिलाड़ियों का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं.

ऐसा इसलिए भी क्योंकि इन बड़ी कंपनियों का दायरा वैश्विक है, इनका आधारभूत ढांचा खड़ा हो चुका है. इन्हें करों और शुल्कों से बचने के तरीके मालूम हैं. इनके पास पारंपरिक रूप से सरकारी रियायतों का लाभ भंडार मौजूद है.

ज़रा सोचिये कि अभी यह मांग की जा रही है कि डाटा/जानकारी को स्थानीय स्तर पर (यानी कोई देश यह न कहे कि हमारे देश/नागरिकों का डाटा देश से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है) रखने की बाध्यता नहीं होना चाहिए.

फिर जब डाटा एक देश से अमेरिका या जर्मनी ले जाया जाए, तब उस पर कोई शुल्क नहीं लगना चाहिए. जो भी सॉफ्टवेयर या तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, बिना लाइसेंस या अनुमति के सॉफ्टवेयर के उपयोग पर प्रतिबंध होना चाहिए.

प्रस्ताव यह भी है कि ई-कॉमर्स के ज़रिये होने वाली खरीद-बिक्री में स्थानीय सरकार को कोई टैक्स या शुल्क नहीं लगाना चाहिए. इस पूरी बहस में यह कहा जा रहा है कि रोज़गार, सरकार का राजस्व और खुली प्रतिस्पर्धा ख़त्म कर दीजिए और फिर भी खुशी-खुशी आर्थिक-तकनीक की गुलामी को स्वीकार कीजिये.

हमें यह समझ लेना होगा कि ई-कॉमर्स एकाधिकार और उपनिवेशवाद का बेहद ख़तरनाक ज़रिया है. भारत ने मार्च 2016 में खुदरा व्यापार के संदर्भ में ई-कॉमर्स में कुछ शर्तों के साथ 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दे दी थी.

वह भी ई-कॉमर्स के विस्तार का ही एक ज़रिया है. डब्ल्यूटीओ में भारत एक ठोस पहल कर रहा है. भारत सरकार का कहना है कि वह डब्ल्यूटीओ में ई-कॉमर्स पर वार्ता के लिए अभी तैयार नहीं है, ऐसे में डर है कि कहीं अन्य मुद्दों पर अमेरिका समेत अन्य विकसित देशों से समर्थन हासिल करने के चक्कर में वह ई-कॉमर्स पर नियम बनाने के लिए वार्ता के लिए तैयार हो जाए.

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)