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राम की जय बोलने वाले धोखेबाज़ विध्वंसकों ने रघुकुल की रीत पर कालिख पोत दी

आप कांग्रेस और भाजपा को कोस सकते हैं, लेकिन संघ परिवार को क्या कहेंगे जिसने धर्म और समाज के लिए लज्जा का यह काला दिन आने दिया?

Babri Reuters

फोटो: रॉयटर्स

(प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी ने ‘राम की अग्नि परीक्षा’ शीर्षक से यह लेख 7 दिसंबर, 1992 को लिखा था जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनकी किताब ‘हिंदू होने का धर्म’ में संग्रहीत है.)

राम की जय बोलने वाले धोखेबाज़ विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रघुकुल की रीत पर अयोध्या में कालिख पोत दी.

हिंदू आस्था और जीवन परंपरा में विश्वास करने वाले लोगों का मन आज दुख से भरा और सिर शर्म से झुका हुआ है. अयोध्या में जो लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं और बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को ढहाना हिंदू भावनाओं का विस्फोट बता रहें हैं- वे भले ही अपने को साधु-साध्वी, संत-महात्मा और हिंदू हितों का रक्षक कहतें हों, उनमें और इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर पर ब्रिटेन में तलवार निकालकर ख़ुशी से नाचने वाले लोगों की मानसिकता में कोई फ़र्क़ नहीं है.

एक निरस्त्र महिला की अपने अंगरक्षकों द्वारा हत्या पर विजय नृत्य जितना राक्षसी है उससे कम निंदनीय, लज्जाजनक और विधर्मी एक धर्मस्थल को ध्वस्त करना नहीं है. वह धर्मस्थल बाबरी मस्जिद भी था और रामलला का मंदिर भी. ऐसे ढांचे को विश्वासघात से गिराकर जो लोग समझते हैं कि वे राम का मंदिर बनाएंगे वे राम को मानते, जानते और समझते नहीं हैं.

राम के रघुकुल की रीत है- प्राण जाए पर वचन न जाई. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सुप्रीम कोर्ट, संसद और राष्ट्र की जनता को वचन दिया था कि विवादित ढांचे को हाथ नहीं लगाया जाएगा.

लेकिन कल अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट, संसद और देश को धोखा दिया गया. कहना कि यह हिंदू भावनाओं का विस्फोट है- झूठ बोलना है. जिस तरह से ढांचे को ढहाया गया वह किसी भावना के अचानक फूट पड़ने का नहीं सोच-समझ कर रचे गए षड्यंत्र का सबूत है. भाजपा के ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भी वहां मौजूद थे. वे साधु महात्मा भी वहां थे जिन्हें मार्गदर्शक मंडल कहा जाता है. विहिप, भाजपा और संघ को अपने अनुशासित कारसेवकों पर बड़ा गर्व है. लेकिन वे सब देखते रहे और ढांचे को ढहा दिया गया. ढांचा ढहाते समय रामलला की मूर्तियां ले जाना और फिर लाकर रख देना भी प्रमाण है कि जो कुछ भी हुआ वह योजना के अनुसार हुआ है. भाजपा की सरकार के प्रशासन और पुलिस का भी कुछ न करना कल्याण सिंह सरकार का इस षड्यंत्र में शामिल होना है.

कल्याण सिंह ने पहले इस्तीफ़ा दिया और फिर भारत सरकार ने उन्हें डिसमिस कर के उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया है. भाजपा की सरकार ने बता दिया है कि वह अपना जनादेश किस तरह पूरा करती है. उसमें न सैद्धांतिक निष्ठा थी, न संवैधानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी को वहन करने की शक्ति. वह जिस मौत मारी गई उसी के योग्य थी. क्योंकि वह उग्रवादियों के हाथों का खिलौना हो गई थी. और षड्यंत्रकारियों ने उसका इस्तेमाल ढांचा ढहाए जाने तक किया.

वे डेढ़ साल से कल्याण सिंह की सरकार को मंदिर बनाने की बाधाएं दूर करने का साधन बनाए हुए थे. अपने संवैधानिक, संसदीय और नैतिक कर्तव्य से समझते-बूझते हुए पलायन करने वाली सरकार के लिए कोई आंसू नहीं बहाएगा लेकिन जनता फिर से ऐसी सरकार बनने देगी?

भारत सरकार ने राष्ट्रपति शासन ज़रूर लगाया पर इतने दिनों से वह उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा को ज़िम्मेदार बनाने के राजनैतिक खेल में लगी हुई थी. अब ऐसी हालत उसके सामने है कि अयोध्या में दो-तीन लाख लोग इकट्ठे हैं. पुलिस और अर्धसैनिक बलों को वहां पहुंचने में अनेक बाधाएं हैं. जो टकराव वह टालना चाहती है अब उसमें वह गले-गले पहुंच गई है.

ढांचे की रक्षा, संविधान और सुप्रीम कोर्ट का आदेश का सम्मान उसकी भी उतनी ही ज़िम्मेदारी थी जितनी उत्तर प्रदेश सरकार की. क्या उसने प्रदेश की एक निर्वाचित सरकार पर विश्वास करके ग़लती नहीं की? क्या उसे संविधान की रक्षा के लिए ग़ैर संवैधानिक क़दम उठाने चाहिए थे? इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे लेकिन इतिहास में वह कोई कारगर सरकार नहीं मानी जाएगी. कोई नहीं जानता कि भारत सरकार अब अयोध्या में कितना कुछ कर सकेगी लेकिन देश का जनमत उसे बख्शेगा नहीं.

सही है कि सभी राजनैतिकों और राजनैतिक पार्टियों ने अयोध्या के मामले को उलझाया है. सभी ने उसका राजनैतिक उपयोग किया है और कल जो हुआ उसमें इस राजनीति का भी हाथ है. लेकिन राम मंदिर निर्माण का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद चला रही थी. यह संस्था संघ की बनाई हुई है. कल से शुरू होने वालीकार सेवा का भार संघ ने लिया था. बजरंग दल और शिव सेना के लोग क्या कर सकते हैं, इसे संघ परिवार जानता था.

लेकिन उनने लोगों की भावनाओं को भड़काया और उन्हें बड़ी संख्या में अयोध्या में जमा किया. राजनैतिक पार्टियों के खेल तो सब जानते हैं लेकिन संघ, हिंदू समाज को हिंदू संस्कृति के अनुसार संगठित करने का दावा करने वाला संगठन है और विश्व हिंदू परिषद मंदिर और वह भी राम का मंदिर बनाए वाली संस्था है. आप कांग्रेस और भाजपा को राजनैतिक पार्टियों की तरह कोस सकते हैं. लेकिन संघ परिवार को क्या कहेंगे जिसने धर्म और समाज के लिए लज्जा का यह काला दिन आने दिया?

देश का बृहत्तर हिंदू समाज संघ के स्वयंसेवकों या विहिप के कारसेवकों से लाखों गुना बड़ा है. यह बृहत्तर हिंदू समाज अयोध्या में जो हुआ उस पर शर्मिंदा है और देश को कैसे बचाना यह उसी की उदार, सहिष्णु परंपरा में स्थापित है. वह पूछेगा कि राम का मंदिर वचन तोड़ कर, धोखाधड़ी और बदले की नींव पर बनाओगे? और जो कहेगा कि हां उससे वह पूछेगा, कि यह हिंदू धर्म है?

कोई नहीं कह सकता कि कारसेवा के नाम पर ढांचा इसलिए ध्वस्त हुआ कि अचानक भड़की भावनाओं को रोक नहीं जा सकता था. मुलायम सिंह की तरह अयोध्या जाने पर किसी ने पाबंदी नहीं लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कारसेवा की इजाज़त दी थी. जिस इलाहबाद हाईकोर्ट पर फ़ैसले को टांगे रखने का आरोप है वह पांच दिन बाद अधिग्रहीत भूमि पर निर्णय देने वाला था. तब तक कारसेवा ठीक से चल सके इसकी कोशिशों में केंद्र सरकार ने सहयोगी रुख अपनाया था.

उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस की तैनाती इतनी कम कर दी थी कि उसे देख कर किसी के भड़कने की संभावना नहीं थी. कार सेवा में जिन रोड़ों की बातें भाजपा-विहिप आदि करते रहे हैं वे सभी हटे हुए थे. और ऐसा भी नहीं कि ‘ग़ुलामी’ के तथाकथित प्रतीक उस ढांचे को कारसेवकों और उनके नेताओं ने पहली बार देखा हो कि वे एकदम भड़क उठे. वह ढांचा वहां साढ़े चार सौ साल से खड़ा था और उसमें कोई तिरालीस साल से रामलला विराजमान थे और वहां पूजा अर्चना की कोई मनाही नहीं थी. फिर उसे गिराने और इस तरह गिराने की अनिवार्यता क्या थी?

यह भी नहीं कहा जा सकता कि वहां केंद्र ने टकराव मोल लिया हो. लोगों को भड़काया हो. भाजपा और संघ के ही नहीं विहिप और बजरंग दल जैसे उग्रवादी संगठनों ने भी कहा था कि केंद्र करेगा तो ही टकराव होगा. लेकिन केंद्र कल दिल्ली में सात घंटे तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और तथाकथित कारसेवकों ने अपने नेताओं की उपस्थिति में उग्र से उग्र काम कर डाला. कोई नहीं कह सकता कि उन्हें उत्तेजित किया गया. कोई नहीं कह सकता कि यह भावनाओं का अचानक विस्फोट था. यह ज़बरदस्ती और सोच-समझ कर लिया गया अपकर्म है. इसमें जो धोखाधड़ी है वह हमारे लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष संविधान को ही दी गई चुनौती नहीं है, यह पूरे हिंदू समाज की विश्वसनीयता, वचनबद्धता और उत्तरदायित्व को नुक़सान पहुंचाया गया है.

संघ परिवार को फैशनेबल धर्मनिरपेक्षता की चिंता न भी हो तो कम से कम उस समाज की परंपरा, वचनबद्धता और विश्वनीयता की फ़िक्र तो करनी चाहिए जिसे वह विश्व का सबसे उन्नत और और संस्कृत समाज मानता है. इसके बाद हम सिख आतंकवादियों के धर्म की आढ़ में चलते ख़ालिस्तान और कश्मीर के मुसलमान आतंकवादियों की आज़ादी के जिहाद का क्या जवाब देंगें? ताक़त भी दिखाने के धर्मनिष्ठ, पारंपरिक, संवैधानिक और संसदीय रास्ते हिंदू समाज के लिए खुले हुए थे फिर क्यों उसे इस मध्ययुगीन बर्बरता में डाला गया? जो मानते हैं कि ढांचा ध्वस्त करके वे हिंदुत्व की नींव रख रहे हैं वे जल्द ही देखेंगे कि हिंदू समाज उन्हें कहां पहुंचाता है. बदले की भावना से कांपने वाले प्रतिक्रियावादी कायरों के अलावा किसी हिंदू हृदय ने इस विध्वंस का समर्थन किया है?

देश, केंद्र सरकार और हिंदू समाज के सामने आज़ाद भारत का सबसे बड़ा संकट मूंह बाए खड़ा है. अगले कुछ दिनों में उन्हें अग्नि परीक्षा से गुज़रना है. संविधान और संसदीय परंपरा उनके साथ है और उन्हें एकता और अखंडता की ही रक्षा नहीं उन परंपराओं का भी निर्वाह करना है जो हज़ारों सालों से इस देश को धारण किए हुए हैं और जिनके नष्ट हो जाने से न भारत भारत रहेगा, न हिंदू समाज हिंदू. इस संकट में वे भगवान राम से भी प्रेरणा ले सकते हैं जिन्होंने ऐसे संकट में विवेक के साथ मर्यादा की स्थापना और रक्षा की है.