समाज

पांडेय बेचन शर्मा: वह ‘युग’ भले ही प्रेमचंद का था, लेकिन लोक में ‘उग्र’ की ही धाक थी

जन्मदिन विशेष: जब कलावादी आलोचकों ने ‘उग्र’ की कहानियों को अश्लील, घासलेटी और कलाविहीन कहा, तब उनका जवाब था कि अगर सत्य को ज्यों का त्यों चित्रित कर देने में कोई कला हो सकती है तो मेरी इन कहानियों में भी कला है.

Bechan Sharma Pandey

पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ (1900-1967) (फोटो साभार: वाणी प्रकाशन)

ऐसा कम ही होता है कि किसी साहित्यकार की लोकप्रियता ही उसकी दुश्मन बन जाये और इस दुश्मन से जन्मी ईर्ष्या उसके वस्तुनिष्ठ या सकारात्मक मूल्यांकन की राह एकदम से रोक दे. लेकिन हिंदी के प्रेमचंद युग के ‘सबसे विवादास्पद, बदनाम, अक्खड़, अलमस्त व मनमौजी’ कथाकार पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के साथ कुछ ऐसा ही हुआ.

इधर ‘कारवां गुजर गया’ जैसे अमर गीतों के सर्जक गोपालदास ‘नीरज’ भी खुद को ऐसी ईर्ष्या का शिकार बताने लगे हैं, लेकिन यहां उग्र की ही चर्चा, जिनकी आज एक 117वीं जयंती है.

प्रेमचंद युग में उग्र की विभिन्न विधाओं की उत्तेजनापूर्ण व मनोरंजक रचनाओं का, कम से कम लोकप्रियता में, कोई सानी नहीं था और वे प्रेमचंद व ‘निराला’ समेत कई समकालीन साहित्यकारों की उनसे ईर्ष्या व लाग-डांट का कारण थीं.

कहते हैं कि वह ‘युग’ भले ही प्रेमचंद के नाम था, उसके लोक में उग्र की ही धाक थी. कहानी विधा में व्यंजनाओं, लक्षणाओं व वक्रोक्तियों से समृद्ध ‘उग्र शैली’ के तो वे प्रवर्तक ही थे.

उनकी लोकप्रियता से चिढ़े कुछ कलावादी व आदर्शवादी आलोचकों ने उनकी कहानियों को अश्लील, घासलेटी और कलाविहीन वगैरह कहकर खारिज करने की कोशिशें शुरू कीं, तो उन्होंने यह कहकर उन्हें चुप करा दिया था कि मैंने समाज के दलित व पतित वर्ग को अपना विषय बनाया और उनसे जुड़े ऊंच-नीच को ही बिना लाग-लपेट प्रस्तुत किया है.

‘अगर सत्य को ज्यों का त्यों चित्रित कर देने में कोई कला हो सकती है तो मेरी इन कहानियों में भी कला है. और यदि नहीं, कला हमेशा शुद्ध सत्य ही नहीं हुआ करती, तो मेरी ये धधकती कहानियां कलाशून्य हैं. मैं उस कला को लिखना ही नहीं जानता.’

29 दिसंबर, 1900 को उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील के सद्दूपूर गांव की बभनटोली में श्रीमती जयकली व बैजनाथ पांडेय के पुत्र के रूप में उग्र का जन्म हुआ, तो मां जयकली ने पैदा होते ही उन्हें एक दलित महिला को बेचकर उनका नाम बेचन रख दिया था.

दरअसल, इससे पहले उनके कई भाई-बहन अकाल-कवलित होकर मां की गोद सूनी कर गये थे और उनके गर्भ में आने के पहले से ही इसे लेकर अपनी तकदीर को कोसती आ रही मां का विश्वास था कि बेच देने के बाद वे उसकी खराब तकदीर की छाया से बचकर लंबी उम्र पा जायेंगे.

इसके बाद बेचन को 66 साल, 2 महीने और 24 दिन लंबी जिंदगी मिली, लेकिन नारकीय परिस्थितियों और भयावह विपन्नता के बीच वे अभी ढाई साल के हुए थे, जजमानी वृत्ति से जैसे-तैसे घर की गाड़ी खींच रहे कि उनके क्षय रोग पीड़ित पिता नहीं रहे.

बेचन ने होश संभाला तो पाया कि उन्हें विरासत में और कुछ नहीं, पिता का रोग ही मिला है. घर की हालत यह थी कि मां व भाभी दूसरे ग्रामवासियों के घरों में अनाज वगैरह पीस-कूट कर ‘कुछ’ लातीं तो घर का चूल्हा जलता. बाद में उनके बड़े भाई त्रिदंडी उद्दंड होकर मां व भाभी को निर्ममता से मारपीट व कैद करके घर में ही जुआ खिलवाने और वेश्याएं बुलवाने लगे.

वे दरवाजे पर यह देखने के लिए बेचन की ड्यूटी लगा देते कि कहीं पुलिस तो नहीं आ रही. फिर भी वे एक दिन पुलिस के हत्थे चढ़े और भरपूर प्रताड़ना झेलने व जुर्माना अदा करने के बाद परदेस भाग गये. ऐसे में बेचन को तन ढकने व पेट पालने के लिए तत्कालीन पंजाब प्रांत में घूम-घूमकर रामलीला करने वाली मंडलियों में अभिनय करना पड़ा.

इस घुमक्कड़ी में कई साल गंवाकर वे रामलीलाओं के पीछे छिपे उनके संचालकों के ‘असाधु आचरण’ से तो परिचित हुए ही, आगे के लेखन के लिए अनेक बहुमूल्य अनुभव भी जुटाये. 14 साल की उम्र में पंजाब से लौटकर चुनार के चर्च मिशन स्कूल में पढ़ने गये तो एक शिक्षक से लड़कर नाम कटवा बैठे. बनारस के हिंदू स्कूल गये तो भी सख्त हेडमास्टर के खिलाफ अपमानजनक तुकबंदी करके उनकी नाराजगी मोल ले ली.

अलबत्ता, उस स्कूल में उन्हें कमलापति त्रिपाठी जैसे सहपाठी मिले, जो बाद में कांग्रेस के बड़े नेता हुए. अच्छा साहित्यिक वातावरण भी मिला. पहले गांधी जी के जन्म दिवस पर रचे एक रोला छंद ने उनकी धाक जमायी, फिर छात्रों की काव्य रचना प्रतियोगिता में वे उसी स्कूल में पढ़ रहे सुमित्रानंदन पंत के बाद दूसरे स्थान पर रहे.

फिर तो बेचन क्रमशः शिवप्रसाद गुप्त, रामनाथलाल ‘सुमन’, मन्मथनाथ गुप्त, विनोदशंकर व्यास, जयशंकर ‘प्रसाद’, मुंशी प्रेमचंद और सम्पूर्णानंद जैसी विभूतियों के स्नेहभाजन बन गये. लेकिन हेडमास्टर की नाराजगी के फलस्वरूप आठवीं की परीक्षा में फेल हुए तो पहले चुनार फिर कोलकाता चले गये, जहां 1920 में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव पारित होता देखा तो उसमें भागीदारी के इरादे से बनारस लौट आये और ऐसा करके पहली जेलयात्रा की. कुछ दिनों तक शचीन्द्रनाथ सान्याल व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे क्रांतिकारियों के सम्पर्क में भी रहे.

‘अपनी खबर’ नाम से लिखी आत्मकथा में उन्होंने अपने पांच गुरु बताये हैं. पहले, उनके उद्दंड बड़े भाई त्रिदंडी, जिन्होंने तमाम ऐबों के बावजूद उनके भीतर लिखने का शौक जगाया. दूसरे, कमलापति त्रिपाठी के भाई काशीपति त्रिपाठी, जिनसे उन्होंने सहृदयता सीखी. तीसरे, ‘लक्ष्मी’ पत्रिका के संपादक व ‘हिंदी शब्दसागर’ के संपादक मंडल के सदस्य लाला भगवानदीन, जिनसे उन्हें दृष्टि मिली. चौथे, दैनिक ‘आज’ के संपादक बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, जिन्होंने न सिर्फ उन्हें राह दिखायी, बल्कि उनकी अनेक रचनाओं का संस्कार, परिष्कार व प्रकाशन किया और पांचवें, ‘प्रभा’ के संपादक कृष्णदत्त पालीवाल, जिनसे उन्हें उत्साह प्राप्त होता रहा.

अपने समय के प्रायः सारे प्रतिष्ठित पत्रों व पत्रिकाओं में उग्र की रचनाएं छपीं, लेकिन पराड़कर द्वारा संपादित बनारस के दैनिक ‘आज’, गोरखपुर के साप्ताहिक ‘स्वदेश’ और कल्कत्ता व मिर्जापुर के ‘मतवाला’ का उनके लेखकीय उन्नयन से चोली-दामन का रिश्ता रहा.

‘मतवाला’ के संपादन कर्म से वे कई बार जुड़े और टूटे. 11 अगस्त, 1919 को ‘स्वदेश’ में प्रकाशित ‘आह्वान’ कविता के साथ उन्होंने ‘उग्र’ उपनाम धारण किया, जबकि ‘आज’ व ‘मतवाला’ के अपने ‘ऊटपटांग’ व ‘आंय बांय सांय’ जैसे लोकप्रिय व्यंग्य स्तम्भ ‘अष्टावक्र’ नाम से लिखे. इनके अलावा भी उनके कई छद्मनाम थे.

पांच अक्टूबर, 1924 को प्रकाशित ‘स्वदेश’ के विजयांक की ‘परम भयानक और विस्फोटक’ सामग्री को लेकर गोरी सत्ता ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया तो कई महीने उसे छकाने के बाद वे सीआईडी द्वारा मुम्बई की मालाबार हिल पर पकडे़ गये और हथकड़ी-बेड़ी में गोरखपुर लाये गये, जहां राजद्रोह में उन्हें उन्हें नौ महीने की सजा सुनायी गयी.

उन्होंने हिंदी साहित्य को बीस कहानी संकलनों, चौदह उपन्यासों, सात नाटकों, तीन प्रहसनों व एकांकियों और तीन काव्य संकलनों के अलावा भरपूर हास्य व्यंग्य, संस्मरण, आत्मकथा और पत्र साहित्य भी दिया है. 1930 में साहित्यजगत में खुद से जुड़े नाहक विवादों से उकताकर वे बंबई जाकर फिल्मी दुनिया से जुडे़ तो उनकी फिल्म ‘छोटी बहू’ बहुत सफल रही, लेकिन विवादों व विफलताओं ने वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा.

कुछ समय तक मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति से जुड़कर वे मध्य प्रदेश की साहित्यिक राजनीति में भी सक्रिय रहे. उसके बाद के वर्षों में अलग-अलग शहरों में ‘वीणा’, ‘विक्रम’, ‘उग्र’, ‘संग्राम’, ‘हिंदी पंच’ आदि पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन व संपादन से जुड़ने व अलग होने के बाद वे 1953 के अंत से दिल्ली में रहने लगे, जहां जमुनापार स्थित कृष्ण नगर में  23 मार्च, 1967 को उनका निधन हो गया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फैज़ाबाद में रहते हैं.)