भारत

भाजपा सरकार में उद्योगपति निखिल मर्चेंट के ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं

जहां बाकी कॉरपोरेट खिलाड़ी सिर्फ सुर्खियों में रहते हैं, वहीं सही मायनों में ‘अच्छे दिन’ एक अनाम-सी फर्म स्वान एनर्जी के प्रमोटर के आए हैं, जिनके साथ कारोबार करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां तैयार खड़ी हैं.

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बाएं से, स्वान एनर्जी के एमडी और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर निखिल मर्चेंट, एलएनजी की फ्लोटिंग स्टोरेज रीगैसीफिकेशन यूनिट, प्रधानमंत्री मोदी (फोटो साभार: एएनआई/स्वान एनर्जी/यूट्यूब)

नई दिल्ली: मोदी के भारत के सबसे प्रभावशाली कारोबारियों में से एक का नाम आपने कभी नहीं सुना होगा. इंटरनेट को खंगालिए, तो आपको करीब 50 साल उम्र के उद्यमी निखिल वी.मर्चेंट की एक भी तस्वीर या प्रोफाइल, उनका कोई इंटरव्यू या उनके किसी एक बयान को खोज पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी- जबकि नरेंद्र मोदी के साथ उनकी नजदीकी भाजपा और दिल्ली में बैठी सरकार के शीर्ष लोगों के बीच जाहिर राज की तरह है.

मर्चेंट और जिनके साथ वे काम करते हैं, उनके बारे में अनजान बने रहना या खुद को अनजान दिखाना इतना जरूरी है कि जब द वायर  ने सार्वजनिक ऊर्जा कंपनियों के साथ उनके लेन-देन के बारे में लिखना चाहा, तो हमारे पास शीर्ष राजनेताओं और उद्योगजगत के बड़े लोगों की तरफ से दोस्ताना फोन आने लगे, जिसमें हमें यह सलाह दी गई कि निखिल इतनी तवज्जो दिए जाने के लायक नहीं हैं. उनकी ये सलाह वर्तमान व्यवस्था में उनके महत्व और प्रभाव के दायरे की हद को बताने के लिए काफी थीं.

2014 की शुरुआत में, यानी कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी दिनों में इनकम टैक्स विभाग ने दो महत्वपूर्ण जांच की शुरुआत की थी, जिसने तब राजनीतिक गलियारों में कइयों का ध्यान खींचा था. इनमें से एक जांच के निशाने पर थे गुजरात के अरबपति गौतम अडानी, जिन्हें नरेंद्र मोदी के करीबी समर्थक के तौर पर देख जाता है. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी.

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निखिल मर्चेंट (फोटो साभार: Swan Energy Annual report)

इसके अलावा दो अन्य छापे स्वान एनर्जी पर मारे गए थे, जिसके बारे में कम ही लोगों को पता था और अपने नाम के उलट यह मुख्य तौर पर टेक्सटाइल और प्रॉपर्टी के कारोबार में लगी हुई कंपनी थी. स्वान एनर्जी के मुखिया हैं निखिल मर्चेंट और उनके ससुर नवीनभाई दवे, जिन्होंने 1991 में इसे गोएका समूह से खरीदा था.

मीडिया की सारी सुर्खियां अडानी के हिस्से में गईं. इसका कारण कांग्रेस के उस चुनाव अभियान को माना जा सकता है, जिसका दावा था कि अगर मोदी चुन लिए जाते हें, तो वे ‘अडानी और अंबानी’ के लिए सरकार चलाएंगे, क्योंकि इन दोनों को प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की दावेदारी के समर्थक के तौर पर देखा जाता था.

बेहद दिलचस्प यह है कि स्वान एनर्जी पर पड़े छापे की ओर मीडिया का बिल्कुल भी ध्यान नहीं गया, जबकि मोदी सरकार के साथ इसके रिश्ते पर कुछ साल पहले गुजरात उच्च न्यायालय पर एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी.

सरकार में आने के एक महीने के भीतर, मई, 2014 में ही, नई सरकार ने तब के राजस्व सचिव राजीव टकरू का हिसाब करते हुए उनका तबादला डोनर (डेवलपमेंट ऑफ द नॉर्थ ईस्ट रीजन) विभाग में कर दिया. वहां से उन्हें जल्द ही और भी ज्यादा हाशिए पर पड़े अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय में भेज दिया गया.

गुजरात कैडर के अधिकारी टकरू की कभी मोदी के साथ बन नहीं पाई. वे महज तीन महीने राजस्व सचिव रहे थे. हालांकि, उनके तबादले को रूटीन करार दिया गया था, मगर सत्ता के गलियारे में यह चर्चा आम थी कि उन्हें इनकम टैक्स छापों का जिम्मेदार माना गया था, जिसके बारे में नई सरकार का यह मानना था कि उन्होंने कांग्रेस नेताओं के कहने पर ऐसा किया था.

सवाल यह है कि आखिर निखिल मर्चेंट हैं कौन हैं और आखिर वे महत्वपूर्ण क्यों है कि वरिष्ठ मंत्री और नौकरशाह उनका नाम एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर लेते हैं, जो काम करवा सकता है?

रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास उपलब्ध सूचना के मुताबिक मर्चेंट 18 कंपनियों के निदेशक हैं. इनमें से ज्यादातर कंपनियां छोटा-मोटा कारोबार करती हैं या कोई कारोबार नहीं करतीं. न उनके पास कोई कर्मचारी हैं और न दिखाने के लायक कोई परिसंपत्ति (असेट्स) है. वे सब महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और गुजरात में निगमीकृत हैं.

जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब मर्चेंट उनकी एक विदेश यात्रा के दौरान व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के तौर पर गए थे. उनके साथ जाने वालों में टॉरेंट ग्रुप के चेयरमैन सुधीर मेहता, अडानी विल्मर ग्रुप के एमडी प्रणव अडानी,  शेल, हजीरा के सीईओ नितिन शुक्ला, जुबिलैंट के हरि भारतीय और एस्सार समूह के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जयेश बुच शामिल थे.

स्वान एनर्जी भाजपा को चंदा देने वालों में भी रही है. 2012-13 के दौरान इसने 2 लाख और 50,000 हजार रुपये का छोटा योगदान किया था. हालांकि अब मर्चेंट इससे इनकार करते हैं. उन्होंने द वायर  को एक इंटरव्यू में कहा, ‘मैंने भाजपा को कभी कोई राजनीतिक चंदा नहीं दिया है.’

सीवीसी भी जिनका हालचाल पूछने जाते हैं

बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं में कारोबारियों का उनके साथ जाना बदस्तूर जारी है. यह सूची गोपनीय है, इसलिए उनके साथ जाने वालों के नाम की जानकारी नहीं है. लेकिन, निखिल मर्चेंट के रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे सरकार के भीतर या बाहर शायद एकमात्र व्यक्ति हैं, और निश्चित तौर पर एकमात्र कारोबारी हैं, जिनसे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) खुद मिलने के लिए आते हैं.

केंद्रीय सतर्कता आयोग, एक वैधानिक निकाय है, जिसका काम सरकारी अधिकारियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करना है. परंपरा रही है कि वैधानिक और संवैधानिक निकायों के मुखिया किसी कारोबारी या किसी अन्य के दफ्तरों में उनसे मिलने नहीं जाते.

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पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी (फाइल फोटो: पीटीआई)

द वायर  को यह जानकारी मिली है कि 2017 में वर्तमान केंद्रीय सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी, मर्चेंट के मुंबई स्थिति बलार्ड एस्टेट दफ्तर गए थे. इस मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर चौधरी ने मर्चेंट को बस एक पहचान का व्यक्ति बताया, जिनसे वे बस शिष्टाचार के चलते मिलने गए थे. यह कहते हुए कि वे एंजियोप्लास्टी के लिए जा रहे हैं, उन्होंने इस मसले पर आगे कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

दूसरी तरफ मर्चेंट ने चौधरी को अपना ‘परिचित’ बताया. ‘कुछ सामाजिक समारोहों में मेरी उनसे मुलाकात हुई है. अगर मुझे ठीक से याद आ रहा है, तो वे मेरे एक ऑपरेशन के बाद मेरा हाल-चाल पूछने के लिए आए थे.’

जिस समय स्वान के दफ्तरों पर छापा मारा गया था, उस समय चौधरी सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस में थे. लेकिन मर्चेंट का कहना है कि वे तब उनसे परिचित नहीं थे. ‘नहीं, जब हमारे यहां छापा मारा गया, तब मुझे नहीं पता था कि केवी चौधरी कौन हैं.’

सौदा, जो पूरा नहीं हो सका

मर्चेंट की फ्लैगशिप कंपनी स्वान एनर्जी एक लिस्टेड कंपनी है, जिसका मुख्य कारोबार टेक्स्टाइल का है. 2016-17 की इसकी सालाना रिपोर्ट से पता चलता है कि इसे 300 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री पर 1.68 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था.

स्वान एनर्जी के वित्तीय प्रदर्शन का जायजा लें, तो पता चलता है कि पिछले तीन सालों में स्वान एनर्जी ने काफी कम या लगभग न के बराबर तक मुनाफा कमाया है. 2014-15 में इसे 4.7 करोड़ का मुनाफा हुआ था, जो 2015-16 में गिरकर 58 लाख रहा गया. इसकी ज्यादातर कमाई टेक्सटाइल के कारोबार से है. यह कंपनी रियल एस्टेट के कारोबार में भी है.

पिछले वित्तीय वर्ष में, स्वान एनर्जी को कई सार्वजनिक बैंकों से अलग-अलग वर्किंग पूंजी ऋण (कैपिटल लोन्स) हासिल हुए- यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स से 48 करोड़ रुपये और देना बैंक से 5.8 करोड़ रुपये. इसे गुजरात के एक सहकारी बैंक- मेहसाणा अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक से भी 4.1 करोड़ रुपये मिले. साथ ही महाराष्ट्र सरकार के सिकॉम से भी 2.2 करोड़ रुपये हासिल हुए.

स्वान एनर्जी सिर्फ एक बार तब विवादों में आई, जब मार्च, 2009 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात सरकार ने गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोशन (जीएसपीसी) की पीपावाव पावर कंपनी लिमिटेड (जीपीपीएल) की 49 फीसदी हिस्सेदारी को 381 करोड़ रुपये में स्वान एनर्जी को हस्तांतरित करने का फैसला किया था.

राज्य सरकार ने बिक्री के लिए प्रतियोगी निविदा के लिए किसी को आमंत्रित नहीं किया था. इसने तब राज्य में एक बड़े राजनीतिक तूफान को जन्म दिया था. उस समय राज्य में विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने यह आरोप लगाया था कि ‘महज 381 करोड़ के निवेश से स्वान एनर्जी 14,296 करोड़ रुपये हथिया लेगी.’ इस आंकड़े में कार्बन क्रेडिट भी शामिल था, जो स्वान को मिलता.

एक प्रेस नोट में तब के गुजरात कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल ने स्वान एनर्जी की वित्तीय साख को लेकर भी सवाल उठाया था, क्योंकि जीपीपीएल सौदे के लिए चुने जाने से पहले के वर्षों में यह कोई उल्लेखनीय कारोबार करती हुई नजर नहीं आ रही थी:

‘सार्वजनिक तौर पर स्वान एनर्जी के उपलब्ध सालाना नतीजे ये दिखाते हैं कि 2005-2008 के बीच इसे परिचालन (ऑपरेटिंग) घाटा हुआ था. 2008 और 2007 में इसने वस्तुओं का कोई उपभोग नहीं किया और 2005, 2006 और 2007 में इसके द्वारा किया गया वस्तुओं का उपभोग औसतन एक करोड़ से भी कम रहा.

इसने 2005, 2006 और 2007 में वेतन या मजदूरी के किसी भुगतान की जानकारी नहीं दी है. 2009 में इसका खर्च सिर्फ 12 लाख रुपये था और इसने 2005 से कोई उत्पाद शुल्क नहीं चुकाया है, लेकिन जिसके अन्य खर्चे बहुत बड़े हैं.’

विपक्ष के गुजरात हाईकोर्ट जाने के बाद यह सौदा संकटों में घिर गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बचाव की मुद्रा में आने पर मजबूर हो गए. फरवरी, 2012 में मिंट ने यह खबर दी थी कि स्वान इस परियोजना से बाहर निकलने वाला था.

द वायर  के सवालों का ई-मेल से दिए गए जवाब में मर्चेंट ने कहा कि शेयर के आवंटन में देरी के कारण यह निवेश ‘2010 में’ ही रद्द कर दिया गया था. उन्होंने गुजरात सरकार को कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को गैस संयंत्रों में बदलने के स्वान के प्रस्ताव को ‘अनूठा’ बताया.

मर्चेंट का कहना है, ‘इस अनूठे प्रस्ताव के कारण स्वान को पीपावाव में अपने तरह के पहले ग्रीनफील्ड गैस आधारित बिजली संयंत्र में हिस्सेदारी का प्रस्ताव दिया गया था.’  लेकिन उनके अनुसार, स्वान के पास ‘2010 में इस परियोजना से बाहर निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. आंतरिक संसाधनों के सहारे किए गए इस निवेश ने स्वान की वित्तीय सेहत पर नकारात्मक असर डाला.’

मोदी और भाजपा नेतृत्व के साथ नजदीकी के कारण भारत के सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक होने की बात को मर्चेंट खारिज कर देते हैं. उन्होंने कहा, ‘पिछले 40 सालों से एक कारोबारी होने के नाते मैं कई कारोबारी लोगों और राजनीतिक नेताओं से मिलता हूं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरी एक राजनीतिक पार्टी और किसी राजनीतिक पार्टी के नेता के साथ नजदीकी है. उन्होंने यह भी कहा कि बड़े लोगों के साथ अपने अच्छे संबंधों का उन्हें कोई फायदा नहीं मिला है.’

टेक्सटाइल से लेकर एलएनजी तक स्वान का सफर

अगस्त, 2016 में भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनियों- ओएनजीसी, आईओसी और एचपीसीएल ने गुजरात के जाफराबाद बंदरगाह में प्रस्तावित एक एलएनजी टर्मिनल की स्थापना के मर्चेंट के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को अपना समर्थन देने का फैसला किया.

इन तीन कंपनियों ने इस टर्मिनल- जिसकी परिकल्पना एक फ्लोटिंग स्टोरेज रीगैसीफिकेशन यूनिट (एफएसआरयू) के तौर पर की गई है, की 60% क्षमता की बुकिंग करा ली. गुजरात सरकार की एक और कंपनी जीएसपीसी ने स्वान के प्रस्तावित टर्मिनल में कथित तौर पर टर्मिनल की 1.5 मिलियन टन क्षमता की बुकिंग करा ली है.

इन समझौतों के कारण यह एलएनजी परियोजना अब निखिल मर्चेंट के लिए एक तरह से जोखिम-मुक्त हो गई है. पीटीआई के मुताबिक:

‘टर्मिनल की 5 मिलियन टन क्षमता के 90 % की बुकिंग सरकारी कंपनियों ने उपयोग के लिए करवा ली है. क्षमता की बुकिंग कराने का मतलब है कि ये कंपनियां अपने लिक्विड नैचुरल गैस (एलएनजी) के आयात के लिए स्वान को पहले से तय एक शुल्क अदा करेंगी.

स्वान को एलएनजी के आयात के व्यापार से जुड़े जोखिमों की चिंता करने की जरूरत नहीं होगी और वह टर्मिनल का संचालन टोल वसूलने की जगह के तौर पर करेगा.’

स्वान ने इस परियोजना का प्रस्ताव 2013 में दिया था, जिसके बाद गुजरात मेरीटाइम बोर्ड ने तुलनात्मक निविदाएं आमंत्रित की थीं.

पिछले साल गुजरात सरकार की दो सार्वजनिक कंपनियों- गुजरात मेरीटाइम बोर्ड और गुजरात स्टेट पेट्रोनेट लिमिटेड ने 208 करोड़ में इस परियोजना की 26% हिस्सेदारी खरीद ली. जनवरी, 2017 में टाटा रियल्टी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर ने इस परियोजना में 10%हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की, लेकिन बाद में वह इससे पीछे हट गई.

पिछले साल अक्टूबर में यह घोषणा की गई थी कि मित्सुई शिपिंग ने इस प्रोजेक्ट में करीब 83 करोड़ रुपये में 11% हिस्सेदारी खरीदी है.

गुजरात सरकार ने इस बाबत कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि आखिर राज्य द्वारा नियंत्रित कंपनियां निजी क्षेत्र की परियोजना में निवेश क्यों कर रही हैं, जबकि जीएसपीसी गुजरात में खुद अपना एलएनजी टर्मिनल विकसित कर रहा है.

इन आरोपों को खारिज करते हुए, जिन्हें वे ‘पक्षपात की निराधार अफवाह’ करार देते हैं, मर्चेंट कहते हैं कि स्वान ने 2009 में ही गुजरात में एक एलएनजी टर्मिनल स्थापित करने का विचार सामने रखा था.

मर्चेंट कहते हैं, ‘एक एलएनजी टर्मिनल, एक विशेषीकृत एलएनजी आयात सुविधा होता है. एलएनजी आयात इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किसी दूसरे मकसद से नहीं किया जा सकता है. इसलिए ऐसी परियोजना के निवेश की सफलता का सारा दारोमदार भविष्य में इसके उपयोग पर होता है, जो कि उपयोगकर्ताओं द्वारा क्षमता के आरक्षण के रूप में होता है. इसलिए क्षमता का आरक्षण सामान्य व्यापार का हिस्सा है.’

‘2016 में खरीद समझौता पर दस्तखत करने में हमें 3 साल का वक्त लगा. वास्तव में छह साल से ज्यादा वक्त लगा, क्योंकि 2010 में पर्यावरणीय अनुमति के लिए हमारे आवेदन के समय से ही बातचीत शुरू हो गई थी. यह तथ्य पक्षपात के निराधार अफवाहों को खुद खारिज कर देता है.

अक्टूबर 2017 में यानी राज्य में चुनाव होने से कुछ ही महीने पहले, गुजरात के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने स्वान एनर्जी के साथ रियायती समझौते को स्वीकृति दे दी. इस समझौते की मियाद संचालन शुरू होने की तारीख से 30 सालों की है, जिसे और 20 सालों तक बढ़ाया जा सकता है.

मर्चेंट के मुताबिक ‘स्वान’ ने रियायती समझौते के प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए अप्रैल, 2015 में ही जमा कराया था, जिसे सरकार ने 2017 में स्वीकृत किया. राज्य सरकार के कई विभागों ने इसी प्रस्ताव को स्वीकृति देने में 2.5 साल से ज्यादा का समय लगाया.

टाटा द्वारा हिस्सेदारी खरीदने की बात को लेकर सवाल पूछे जाने पर मर्चेंट ने द वायर  को बताया, ‘घोषणा के बाद टाटा रियल्टी ने एलएनजी टर्मिनल परियोजना का जरूरी अध्ययन किया. स्वान एलएनजी टर्मिनल प्रोजेक्ट बुनियादी रूप से एक पोर्ट अवसंरचना प्रोजेक्ट है, जो टाटा रियल्टी ग्रुप का प्राथमिक लक्ष्य नहीं है. इसलिए कोई करार नहीं हो सका और दोनों कंपनियों के बीच किसी किस्म का वित्तीय लेन-देन नहीं हुआ.’

परियोजना में सार्वजनिक कंपनियों की है अहम भूमिका

मर्चेंट का कहना है कि सार्वजनिक कंपनियों द्वारा उनकी परियोजना में निवेश की बदौलत वे एलएनजी परियोजना के लिए 750 करोड़ के कर्ज का इंतजाम नहीं कर रहे हैं. लेकिन, द वायर  ने जिन दस्तावेजों का अध्ययन किया है, उनसे यह पता चलता है कि सरकारी सार्वजनिक कंपनियां स्वान एलएनजी द्वारा कर्ज न चुकाए जाने (डिफॉल्ट) की स्थिति में लिए जानेवाले कर्ज के एक हिस्से की जिम्मेदारी लेंगे.

सरकार के एक आंतरिक नोट में यह कहा गया है कि स्वान टेलीकॉम द्वारा कर्ज की अदायगी न किए जाने की स्थिति में इस पर पड़नेवाले कर्ज की आकस्मिक जिम्मेदारी 477.15 करोड़ रुपये होगी.

गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के स्वान एलएनजी टर्मिनल परियोजना में प्रस्तावित निवेश को लेकर गुजरात सरकार के नोट के पेज 6 का अंश.

गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के स्वान एलएनजी टर्मिनल परियोजना में प्रस्तावित निवेश को लेकर गुजरात सरकार के नोट के पेज 6 का अंश.

हाल ही में रिटायर हुए एक वरिष्ठ एसबीआई अधिकारी ने द वायर  को बताया कि मर्चेंट का यह कहना भले तकनीकी तौर पर सही हो कि ‘मुख्य प्रमोटर की हैसियत से परियोजना के लिए कर्जे का इंतजाम करने की जिम्मेदारी सिर्फ स्वान पर है,’ लेकिन यह भी सही है कि उन्होंने जिस तरह से इस क्षेत्र में बिना किसी अनुभव के सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी तेल कंपनियों को अपने निश्चित ग्राहकों के तौर पर जोड़कर दिखाया है, उससे उनके लिए बैंकों से कर्ज हासिल करना आसान हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘अगर नकद की ढेर पर बैठी तेल कंपनियों को आपके निष्ठावान ग्राहक के तौर पर दिखाया जाए, जो आपकी बिक्री का बड़ा हिस्सा खरीदने का वादा कर चुकी हैं, तो ऐसी परियोजनाओं को कर्ज देने में बैंकों को आसानी होती है. बैंकों द्वारा कर्ज दिए जाते वक्त आगे के कई सालों तक संभावित राजस्व एक महत्वपूर्ण पैमाना होता है. और अगर संभावित राजस्व के एक बड़े हिस्से की गारंटी सार्वजनिक कंपनियां ले रही हों, तो परियोजना काफी भरोसेमंद हो जाती है.’

मर्चेंट के बारे में कोई बात नहीं करता

द वायर  ने जिनसे भी संपर्क किया, उनमें से लगभग सभी ने मर्चेंट या स्वान एनर्जी के बारे में बात करने से इनकार कर दिया. केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले तो सरकारी तेल कंपनियों के तेल क्षेत्र के नौसिखिए स्वान एनर्जी के साथ लेन-देन को लेकर द वायर  द्वारा भेजी गई प्रश्नावली का जवाब देने के लिए राजी हो गए, लेकिन अंत में उन्होंने कोई जवाब न देना ही मुनासिब समझा.

स्वान एलएनजी के साथ गुजरात सरकार के रियायती समझौते को स्वीकृति देनेवाले नितिन पटेल ने भी उन्हें भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया. गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने भी स्वान एनर्जी के साथ उनकी सरकार की लेन-देन को लेकर पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया.

मर्चेंट के साथ काॅलेज और हॉस्टल के साथी, गुजरात के ऊर्जा मंत्री सौरभ पटेल ने स्वान एनर्जी के साथ किसी विशेष बर्ताव की बात से इनकार किया.

मर्चेंट और उनके विभिन्न कारोबारों के बारे में विस्तार से जानने के लिए द वायर  ने उनके कुछ सहयोगियों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन, वहां से भी हमें बैरंग लौटना पड़ा. उदाहरण के लिए मर्चेंट स्किल इंफ्रास्ट्रक्चर के स्वामित्व वाले नवी मुंबई स्मार्ट सिटी इंफ्रास्ट्रक्चर के निदेशक हैं. मगर, स्किल के निखिल गांधी ने मैसेज का जवाब देते हुए कहा कि वे ‘हार्ट रिहैबिलिटेशन सेशन’ में हैं और बाद में जवाब देंगे.

नामी-गिरामी लोगों के साथ संपर्क के बारे में पूछने पर मर्चेंट ने 35 साल से भी ज्यादा वक्त से कारोबार की दुनिया में होने का हवाला दिया. ‘कारोबारी जीवन में आपको स्वाभाविक ढंग से व्यापारिक मंचों या सामाजिक समारोहों में विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध लोगों से मिलने का मौका मिलता है. यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इतने लंबे समय से कारोबारी जगत में होने और लोगों के साथ दोस्ताना संबंधों के बावजूद हमें एलएनजी टर्मिनल के निर्माण के लिए जरूरी इजाजत और लाइसेंस हासिल करने में 10 साल लग गए. और यह अब भी पूरा होने से दूर है. इतना लंबा समय लगने के कारण हम और भी ज्यादा कर्ज में चले गए हैं और हमें इससे बाहर आने में संभवतः अभी और साल लगेंगे. इसलिए यह कहना कि इनमें से किसी व्यक्ति के कारण मुझे कोई फायदा पहुंचा है या मेरे मौजूदा कारोबारी परियोजना में उनकी कोई भूमिका है, अपने आप में बेबुनियाद काल्पनिक धारणा के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता.’

अपनी बात करते हुए उन्होंने जोड़ा, ‘मैं आपको इन निराधार अफवाहों को मेरी जानकारी में लाने के लिए धन्यवाद देता हूं और मैं पूरी ईमानदारी के साथ यह आशा करता हूं कि ऊपर दिए गए मेरे जवाबों से सारे भ्रमों का स्पष्टीकरण हो जाएगा. यह स्वान एनर्जी की फ्लैगशिप परियोजना है और भारत में यह अपने तरह की कुछ परियोजनाओं में से एक है. हमें यह लगता है कि यह रोजगार, तकनीक, और ऊर्जा क्षेत्र के हिसाब से देश के लिए फायदेमंद होगा.

इसलिए यह हमारे आपसी हित में होगा कि इस मामले पर जल्द से जल्द पूर्ण विराम लगाया जाए और निराधार अफवाहों पर ध्यान न दिया जाए.’

सत्ता के साथ मर्चेंट की नजदीकियों और उनके प्रभाव की अफवाहें, बेबुनियाद हो सकती हैं. लेकिन, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि स्वान एनर्जी की दो फ्लैगशिप परियोजनाएं- पीपावाव में बिजली संयंत्र का असफल सौदा हो या अब गुजरात के जाफ़राबाद में एलएनजी टर्मिनल परियोजना हो, दोनों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का उन्हें वरदहस्त हासिल था.

दुनियाभर में, जहां भी सरकारी कंपनियां या संस्थाएं निजी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए राजस्व का मुख्य स्रोत बन जाती हैं, वहां थोड़ी-बहुत विनियामक जांच का होना स्वाभाविक ही नहीं, अनिवार्य भी है. इससे पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जाता है और इस दिशा में भारत को अभी लंबी दूरी तय करने की जरूरत है.

रोहिणी सिंह दिल्ली में कार्यरत पत्रकार हैं.

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