राजनीति

गुजरात दंगों के 16 साल: उम्मीदों के निशां बाकी हैं

2002 के गुजरात दंगों में अपनी ज़िंदगी बिखरते देख चुके प्रोफेसर जेएस बंदूकवाला मानते हैं कि भले ही देश भगवाकरण की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद अच्छे भविष्य की उम्मीद फीकी नहीं हुई है.

Godhra Riot Victims Reuters

2012 में अहमदाबाद में गोधरा दंगों के दौरान मारे गए लोगों की तस्वीरों की प्रदर्शनी (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

27 फरवरी 2002 की उस दुर्भाग्यपूर्ण दोपहर की यादें अब भी मुझे अब भी डरा जाती हैं.

मैं बड़ौदा यूनिवर्सिटी की मेरी फिजिक्स लैब में था, जब एक चपरासी भागते हुए आया और बताया कि अयोध्या से कारसेवकों को ला रही एक ट्रेन पर वड़ोदरा से करीब 100 किलोमीटर दूर, गोधरा में हमला हुआ है. कई कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया. अगले दिन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा एक विशाल शवयात्रा के लिए उनके शवों को अहमदाबाद ले जाया जाना था.

मुझे एक अनजाने डर ने जकड़ लिया. मैं इस जुलूस के उन्माद से भयभीत था, जिसके बाद मुस्लिमों की हत्या और संपत्ति का नुकसान होता. ये एक ऐसा झटका होता जिससे शायद यह समुदाय कभी उबर न पाता.

आखिर देश के सभी राज्यों में गुजरात सबसे ज्यादा भगवा था. यह विडंबना ही है कि गुजरात ही अहिंसा के सबसे बड़े पैरोकार की जन्मभूमि रहा है. लेकिन यह विहिप, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा का गढ़ भी है.

1972 में अमेरिका में अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद मैं बड़ौदा यूनिवर्सिटी से जुड़ा था. मेरे मन में इस शहर की पहली छाप सांप्रदायिक रूप से बंटे एक शहर की थी. हिंदू-मुसलमानों की बीच हुई कोई छोटी-सी लड़ाई भी शहर का माहौल बिगाड़ने का माद्दा रखती थी.

पुलिस भी कानून और व्यवस्था बनाए रखने में पक्षपाती थी. इन्हीं वजहों से मैं एक्टिविज्म और विरोध के रास्ते पर उतरा. इसका नतीजा हुआ कि मैं कुछ एक बार जेल गया और भीड़ ने मेरे घर पर हमले किए. यह सब मेरी पत्नी के लिए बहुत ज्यादा था, जो कुछ दिनों बाद डिप्रेशन में चली गईं. 2001 में उनकी मौत हो गई.

मेरा इस शहर या पूरे गुजरात ही में कोई रिश्तेदार नहीं है. मेरा इकलौता बेटा दूर अमेरिका में था. मेरी 23 साल की बेटी मेरे साथ थी, जिसकी शादी एक गुजराती हिंदू से होने वाली थी.

मैं अपने उसूलों के चलते एक बहुसंख्यक क्षेत्र में रहना पसंद करता हूं. मेरा अब भी मानना है कि असली राष्ट्रीय एकता तभी आ सकती है, जब सभी जातियों और आस्था के लोग एक-दूसरे के आस-पास रहेंगे. पर बदकिस्मती से हमारे देश में लोग अपनी जाति और धर्म से जुड़े इलाकों में ही रहते हैं.

मैं यह स्वीकारना चाहूंगा कि नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग मेरे हीरो रहे हैं. इन दोनों ने ही अपने इस विश्वास कि श्वेत और अश्वेत साथ रह सकते हैं, खा सकते हैं और काम कर सकते हैं, के चलते भारी कीमत चुकाई. दूसरा पहलू यह है कि मैं सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की स्थिति में बहुत आसानी से भीड़ का निशाना बन सकता था.

उस दिन भी यही हुआ, जब गोधरा में ट्रेन जलाई गई. मेरे पड़ोसियों ने मुझसे मुंह फेर लिया. उन्मादियों की भीड़ गैस के सिलिंडर लेकर आई, उसे जलाया और 15 मिनट के भीतर खूबसूरत यादों से भरा मेरा घर मलबे में तब्दील हो गया. बस राहत की बात यही थी कि हमें मारने की कोशिशों के बावजूद मैं और मेरी बेटी जिंदा बच गए. मेरी दुनिया खत्म हो चुकी थी.

नरेंद्र मोदी- गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री के सितारे उस वक्त बुलंद थे. 2002 की सांप्रदायिक हिंसा उनके भारत की सत्ता जीतने के अभियान का पहला कदम थी. मेरी सबसे बड़ी चिंता थी कि क्या गुजरात में महात्मा गांधी के युग का अंत हो चुका था. क्या गुजरात के हिंदू इस राज्य से निकले सबसे महान व्यक्ति को यूं ही छोड़ देंगे?

किस्मत से, मेरे डर गलत थे. उसी रात मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी, जो कुछ समय में कुलपति बनने वाले थे, आगे बढ़कर मेरी बेटी को हमारे जले हुए घर लेकर गए, जिससे मलबे में पड़े पासपोर्ट आदि जैसे कुछ जरूरी सामान मिल जाएं. वे आधी रात को एक बेहद तनावपूर्ण इलाके में गए. यह बहुत जोखिम भरा था. फिर भी वे मेरी जिंदगी के इस मुश्किल दौर में मेरी मदद करना चाहते थे.

अगली सुबह टीवी एंकर बरखा दत्त को उस जगह का पता लगा, जहां हमने पनाह ले रखी थी और वो मेरी बेटी और मेरा इंटरव्यू लेने पहुंचीं. इस इंटरव्यू के दौरान मेरी बेटी को इतने कम वक्त में अपनी मां और घर खोने की भयावहता का एहसास हुआ और वो रोने लगी. मुझे आश्चर्य हुआ कि इस दौरान बरखा खुद रोने लगीं और इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग बंद करनी पड़ी.

एक मुस्लिम लड़की की स्थिति पर एक राष्ट्रीय स्तर पर जाने-पहचाने चेहरे का यूं रोना इस बात का सबूत था कि मोदी और उनके भगवा समर्थकों की पहुंच से परे भी एक भारत है.

गुजरात के तनाव से बचने के लिए हम मुंबई चले गए. इसकी अगली ही शाम मुझे सामाजिक कार्यकर्ताओं से भरे एक हॉल में बोलने के लिए बुलाया गया. मैं इनमें से ज्यादातर को जानता तक नहीं था. कहने की बात नहीं है कि उन सभी का रवैया मुझे लेकर सहानुभूतिपूर्ण था.

हम इसके बाद हम मेरे बेटे के पास अमेरिका चले गए. वहां सबसे पहले मेरे एक आईएएस अधिकारी दोस्त की विधवा पत्नी अपनी बेटी के साथ हमसे मिलने आईं. वे मेरे बेटे के घर से तकरीबन 500 किलोमीटर दूर रहती थीं. उन्हें हमारी फिक्र थी. संयोग से वे बिहार के भूमिहार थे.

इसके बाद के दिनों तक कई भारतीय अमेरिकी हमारा हाल-चाल लेने को कॉल किया करते थे. इन कॉल करने वालों में राजमोहन गांधी, सैम पित्रोदा, नोबेल सम्मानित वेंकटरमण ‘वेंकी’ रामकृष्णन के पिता प्रोफेसर रामकृष्णन शामिल थे. उन्होंने बाद में मुझे हवाई जहाज के रिटर्न टिकट भेजे, जिससे मैं लगभग  3,000 किलोमीटर दूर उनके घर जाकर उनके साथ कुछ वक्त बिता सकूं.

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साबरमती एक्सप्रेस के जलाए गए डिब्बे (फाइल फोटो: पीटीआई)

वड़ोदरा लौटने के बाद, एक प्रमुख गांधीवादी जीनाभाई दरजी यूनिवर्सिटी के नए फ्लैट पर मुझसे मिलने आये. उन्होंने मुझे देखा और बुरी तरह सुबकने लगे. मैं इन बातों का जिक्र सिर्फ यह दिखाने के लिए कर रहा हूं कि देश और बाहर के कुछ प्रभावशाली भारतीयों ने भगवा ताकत के मेरा घर जला देने के कृत्य को किस तरह देखा.

इन सब बातों का मुझ पर बहुत गहरा असर हुआ. मेरा गांधी और हिंदू साथियों में भरोसा फिर से बना. मुझे मेरे दुख और नुकसान से ऊपर उठकर देखना था. मुझे मेरे अपने समुदाय और गुजरात के हिंदुओं से जुड़ने के लिए एक रास्ता बनाना था. हम गांधी से लेकर नेहरू, टैगोर से लेकर सुभाष चंद्र बोस, गोपालकृष्ण गोखले से लेकर सी राजगोपालाचारी जैसे हमारे नायकों के सपनों को नफरत और कट्टरता के सामने मिट्टी में नहीं मिलने दे सकते.

फिर बंधती उम्मीदें

समुदाय ने जिस मुसीबत का सामना किया था, वो बहुत बड़ी थी. करीब 2,000 मुसलमान मारे गए थे. कई औरतों का बलात्कार हुआ था. ढेरों लड़के-लड़कियां उनकी ही आंखों के सामने अनाथ हो गए. संपत्ति का नुकसान हजारों करोड़ में था. लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल थी कि हजारों लोगों को अपना बसा-बसाया घर छोड़कर कहीं और जाना पड़ा था. इसका नतीजा हुआ नौकरियों, व्यापर और बच्चों की पढ़ाई का नुकसान.

पुलिस उन युवाओं को परेशान करती, जो खुद दंगों के पीड़ित थे. स्थिति और खराब तब हुई जब हममें से कुछ सामाजिक कार्यकर्ता अपना फायदा देखते हुए भाजपा की ओर पहुंच गए. यह एक चमत्कार ही है कि हम इस खराब दौर से निकाल आये.

इसका श्रेय उन हिंदुओं को जाता है जो मुस्लिमों की मदद के लिए आगे आये. गांधीवादी, समाजवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता सक्रिय हुए. उन सभी भले लोगों का नाम लिखना मुमकिन नहीं है, लेकिन फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि वड़ोदरा में किरीट भट्ट और जगदीश शाह, मुकुल सिन्हा, इंदु जानी, प्रकाश शाह और गगन सेठी ने बहुत सार्थक काम किया है.

लड़के-लड़कियां पढ़ाई न छोड़ें इसलिए वजीफे देना शुरू किया गया. शरणार्थियों को बसाने के लिए इस्लामिक रिलीफ कमेटी ने कई रिहायशी कॉलोनियां बनाईं.

कलोल की एक कमेटी ने पास के इलाके डेरोल के पीड़ितों की मदद की. इस इलाके में पूरे गुजरात में सबसे ज्यादा हत्याएं हुई थीं और जहां तक मेरी जानकारी है, इस अपराध के लिए कभी किसी को दोषी नहीं ठहराया गया.

किस्मत से गगन सेठी ने वहां एक स्कूल खोला है. कलोल के विद्यार्थियों में तीन अनाथ लड़कियां भी थीं, जिन्होंने स्कूल और बोर्ड के इम्तिहानों में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. वड़ोदरा की ज़िदनी इल्मा ट्रस्ट ने इनकी पढ़ाई का जिम्मा उठाया. आज पास के ही एक फार्म प्लांट में ये केमिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट के बतौर काम कर रही हैं.

Godhra Riot Victims 2 Reuters

2012 में अहमदाबाद में गोधरा दंगों के दौरान मारे गए लोगों की तस्वीरों की प्रदर्शनी (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

16 साल बाद यह कहा जा सकता है कि 2002 का इस समुदाय को पूरी तरह खत्म कर देने का डर गलत साबित हुआ. अगर शिक्षा की गुणवत्ता, पैसा कमाने और औरतों के उत्थान की बात करें तो मुस्लिम पहले से कहीं बेहतर स्थिति में हैं.

हर साल मई-जून में अखबार उन मुसलमान लड़के-लड़कियों की तस्वीरों से भरे होते हैं, जिन्होंने बोर्ड और यूनिवर्सिटी के इम्तिहानों में अच्छा किया. अपने बैच में अव्वल आने वाली मुस्लिम लड़कियों की तस्वीर देखना बिल्कुल सामान्य हो चुका है.

इस साल एक सैय्यद लड़की ने बोर्ड इम्तिहानों में पूरे गुजरात में टॉप किया है. एक और लड़की ने 4 कोशिशों के बाद नीट मेडिकल एग्जाम पास किया. इससे पहले न उसने हार मानी, न उसके माता-पिता ने. वड़ोदरा में ताईवाडा नाम का एक छोटा-सा इलाका है, जहां सबसे ज्यादा चार्टेड अकाउंटेंट हैं.

फिर भी हम बोर्ड इम्तिहानों में फेल होने की बढ़ी दर के बारे में परेशान हैं. जहां मध्य और उच्च वर्ग के बच्चे तो पढ़ाई में अच्छा कर रहे हैं, निम्न वर्ग के मुस्लिमों पर बोझ ज्यादा है. गुजरात में शिक्षा क्षेत्र में पैसे का बोलबाला है और गरीब इससे तालमेल नहीं बिठा सकते. उनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि समुदाय को खुद भी इससे निपटने में मुश्किलें आ रही हैं. इंशाल्लाह, इसका कोई हल जल्दी निकलेगा.

हमने कुछ गरीब इलाकों में ‘रीडिंग रूम्स’ शुरू किए हैं, जिससे लड़के-लड़कियों को यहां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके क्योंकि छोटे-छोटे घरों की कम रोशनी और बाहर के शोर में पढ़ पाना मुश्किल होता है.

2002 के का एक सकारात्मक असर यह भी रहा कि अब समुदाय के एलीट (संभ्रांत) समुदाय को आगे लाने के बारे में सोचने लगे हैं. वड़ोदरा में इतवार की सुबह लगने वाले मेडिकल कैंप आम बात हो गए हैं. सबसे अच्छे मेडिकल विशेषज्ञ यहां मुफ्त इलाज और दवाइयां देते हैं. ऐसा अन्य शहरों में भी होना चाहिए.

आखिर में अगर राजनीति की बात करें, तो मुस्लिम शायद अस्तित्व में ही नहीं हैं. पिछले तीन दशकों से गुजरात ने किसी मुस्लिम को चुनकर लोकसभा में नहीं भेजा है. हमारी आबादी 10% के अंदर है, फिर भी विधानसभा में 180 में केवल 3 मुस्लिम हैं. मोदी मुस्लिमों को राजनीति से गायब करने में कामयाब रहे.

पर क्या इससे वाकई में फर्क पड़ता है? मैं इसकी अपेक्षा अपनी ताकत बेहतर शिक्षा, पैसे कमाने और महिलाओं के उत्थान में लगाने पर ध्यान दूंगा. आखिर यही वो तरीका था जो अमेरिका में यहूदियों ने अपनाया था.

लेखक बड़ौदा यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

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