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40 कथित नक्सलियों का पुलिस ‘एनकाउंटर’ और गांव से ग़ायब बच्चे

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में सी-60 कमांडो और नक्सलियों के बीच कथित मुठभेड़ में 40 लोगों की मौत हो जाने के बाद, एक गांव अपने मृतकों की पहचान करने का इंतज़ार कर रहा है.

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महाराष्ट्र के छोटे से गांव गट्टेपल्ली के लोग पुलिस द्वारा जारी किए गए तस्वीरों में से रासू की पहचान करते हुए. (फोटो: सुकन्या शांता/द वायर)

गढ़चिरौली, महाराष्ट्र में 40 ‘नक्सलियों’ को मार गिराने के पुलिस के दावे के बाद ग्राउंड जीरो से दो रिपोर्टों की श्रृंखला की पहली कड़ी.

गट्टेपल्ली (महाराष्ट्र): पांच दिनों तक गढ़चिरौली, महाराष्ट्र के छोटे से गांव गट्टेपल्ली के निवासियों को इसकी कोई जानकारी नहीं थी कि आखिर वहां के कई बच्चे कहां गायब हो गए हैं. ये बच्चे 21 तारीख को पास के एक गांव में एक शादी में शरीक होने के लिए गए थे. आखिरकार एक संयोगवश यह त्रासद खबर उन तक पहुंची.

अगर बिसरू अताराम की नजर गलती से आगंतुक एडवोकेट लालसू सोमा नागोती के मोबाइल फोन की एक तस्वीर पर नहीं पड़ी होती, तो शायद इसके बारे में उन्हें कुछ दिन और पता नहीं चलता. बिसरू अताराम ने मोबाइल में देखकर माड़िया बोली में कहा, ‘ओह! क्या वह रासू है? लेकिन तस्वीर में तो उसके गाल फूले हुए लग रहे हैं. उसके माथे को नजदीक से देखिए, उसका माथा असाधारण रूप से चौड़ा और आंखें छोटी थीं.’

27 अप्रैल की शाम को अताराम की नजर एक बच्ची की तस्वीर पर धोखे से पड़ गई और उन्होंने उसे पहचान लिया- यह 16 साल की रासू चाको मदावी की तस्वीर थी. सदमे की हालत में, उन्होंने तत्काल यह खबर औरों को बतायी. यह तस्वीर उन 16 लोगों की सूची का हिस्सा थी, जो कुछ दिन पहले नक्सल होने के शक में एक पुलिस एनकाउंटर में मार गिराए गए थे.

रासू की बहनों- 20 वर्षीय वंजी और 18 वर्षीय जानो के लिए यह खबर दुखों का पहाड़ टूट पड़ने की तरह थी. अन्य गांव वालों के लिए भी, जो एनकाउंटर के बारे में सुनने के बाद पुलिस की तरफ से इसके बारे में किसी तरह की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार कर रहे थे, यह खबर बेहद दुखदायी थी. इस खबर ने उनके सबसे बुरे डर को सही साबित कर दिया.

पुलिस द्वारा जारी की गई सूची में रासू की तस्वीर पांचवें स्थान पर थी. उसे अज्ञात व्यक्ति की श्रेणी में रखा था, जो उस 22 अप्रैल को इंद्रावती नदी तट पर कथित ‘एनकाउंटर’ में मौजूद थी.

उसका चेहरा काफी सूज गया था. उसके गाल पर गहरे जख्मों और सूजी हुई बाईं आंख ने उसके चेहरे को काफी बिगाड़ दिया था. लेकिन, गांव वालों ने रासू को बचपन से देखा था. इसलिए उन्होंने उस चौड़े माथे और छोटी आंखों वाले चेहरे को पहचानने में थोड़ा भी वक्त नहीं लगाया.

इसके बाद रात के अंधेरे में गांव वालों ने नागोती के फोन की पीडीएफ फाइल को देखा. उन्हें डर था कि कहीं इसमें उनका कोई और परिचित चेहरा न हो. उनके बीच इस बात को लेकर बातचीत हुई कि क्या दसवें शव के तौर पर चिह्नित चित्र कहीं, गांव के किशोर नुस्से की तो नहीं है! लेकिन वे इसको लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे.

अताराम ने कहा, ‘इसका चेहरा बहुत ज्यादा सूज गया है, ऐसा लगता है जैसे इसे बुरी तरह से पीटा गया हो. इसके चेहरे की आकृति नुस्से से मिलती-जुलती लग रही है, लेकिन हम यकीन के साथ नहीं कह सकते हैं.’

उस समय तक उनके बच्चों के अता-पता या उनकी मृत्यु के बारे में कोई खबर पक्के तौर पर नहीं आयी थी. सिवाय पुलिस के सी-60 कमांडो दल की जांच के, जो गांव वालों द्वारा नजदीक के गढ़चिरौली में अपने लोगों के लापता होने की शिकायत दर्ज कराने के बाद गांव आए थे.

एनकाउंटर

गट्टेपल्ली, नागपुर से करीब 310 किलोमीटर दूर एटापल्ली तहसील में एक छोटा मगर दूरस्थ गांव है. गढ़चिरौली क्षेत्र के ज्यादातर आदिवासी गांवों की ही तरह गट्टेपल्ली के 35 परिवार अपने गुजर-बसर के लिए तेंदूपत्ते और दूसरे वन्य उत्पादों पर निर्भर हैं. गांव की तरफ जाने पर धीरे-धीरे कंक्रीट की सड़कों की जगह धूल भरी सड़कें ले लेती हैं.

सरकारी और निजी बस सेवा इस गांव को बाहरी दुनिया से जोड़ने का एकमात्र जरिया है. लेकिन ये बसें गांव से 66 किलोमीटर दूर एटापल्ली कस्बे तक के लिए ही हैं. इसके आगे का सफर सिर्फ किसी मोटरसाइकिल पर ही किया जा सकता है, लेकिन दो घंटों का यह सफर कमर तोड़ देने वाला है और अगर सफर रात का हो, तो यह और ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

इस गांव की दूरस्थता और सार्वजनिक परिवहन के अभाव में गांव वाले कभी-कभार ही कस्बे तक की यात्रा करते हैं. यहां सिर्फ कुछ परिवारों के पास ही मोटर साइकिलें हैं, जिनका इस्तेमाल सारे लोग मिलजुल कर करते हैं.

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वंजी (बाएं से दूसरी) और जानो (बीच मेें) ने पुलिस द्वारा जारी की गई तस्वीरों की सूची में रासू की पहचान की. (फोटो: सुकन्या शांता/द वायर)

किशोर उम्र की रासू और सात अन्य लोग, जिनमें से किसी की भी उम्र 21 साल से ज्यादा नहीं थी, 21 अप्रैल की शाम में 15 किलोमीटर दूर कसनसुर गांव में एक शादी में शामिल होने का कहकर अपने घरों से निकले थे. एडवोकेट नागोती, जो खुद एक माड़िया हैं, बताते हैं कि जनजाति में शादी के कार्यक्रम में सबके लिए दरवाजा खुला होता है और शादी के पूर्व के समारोहों में पास के गांवों से बिन बुलाए मेहमानों का शरीक होना यहां आम बात है.

नागोती बताते हैं कि समारोहों में अपरिचित चेहरों का स्वागत भी किसी रिश्तेदार की तरह ही किया जाता है. कसनसुर गांव से एकत्रित की गई गवाहियों के मुताबिक ये आठ लोग शादी के स्थान पर नहीं पहुंचे थे. गढ़चिरौली जिला परिषद के सदस्य नागोती कहते हैं कि ‘ऐसा हो सकता है कि वे शादी के समारोह में शामिल होने के लिए गांव से निकले हों, लेकिन उन्हें गांव से बाहर पड़ाव डाले नक्सलियों ने रोक लिया हो या उन्हें पुलिस जबरदस्ती घटना स्थल पर ले गयी हो और उन पर हमला किया गया हो.’

इसके बाद गढ़चिरौली जिले के सी-60 कमांडो दस्ते (महाराष्ट्र पुलिस की विशेष नक्सल विरोधी इकाई) द्वारा दो सफल कार्रवाइयों की खबर आयी, इनमें 40 लोग मारे गए. पुलिस का कहना है कि एनकाउंटर से दो दिन पहले, सुरक्षा एजेंसियों को इलाके में नक्सल गतिविधि की सटीक जानकारी मिली थी.

22 अप्रैल को, गढ़चिरौली के कसनसुर के आसपास के जंगलों में (जो भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के पेनगुंडा गांव में पड़ता है) सी-60 कमांडो दल ने ‘नक्सलियों के एक समूह’ पर गोलियां बरसायीं. ये नक्सली कथित तौर पर वहां आराम कर रहे थे. कुल मिलकार इस गोलीबारी में 34 लोग मारे गए.

एक दिन बाद पास के राजाराम-खांडला जंगल में छह और लोगों को मार गिराया गया. इनमें एक वरिष्ठ सदस्य भी था, जिसका नाम नंदू बताया गया. द हिंदू की खबर के मुताबिक गृह मंत्रालय में वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार के. विजय कुमार ने दावा किया कि मारे गए माओवादियों की संख्या के हिसाब से यह हाल के वर्षों के सबसे बड़े ऑपरेशनों में से एक था.

एक लंबा इंतजार

गट्टेपल्ली गांव के निवासियों ने कहा कि उन्होंने एनकाउंटरों के बारे में कुछ नहीं सुना था. उन्होंने 22 अप्रैल तक बच्चों के लौट आने का इंतजार किया. लेकिन, जब वे लौटकर नहीं आए, तब आठ परिवार करीब 140 किलोमीटर की यात्रा करके गढ़चिरौली के पुलिस मुख्यालय पहुंचे.

किसी को कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. द वायर के संवाददाता से बात करते हुए, गांववालों के पास कई सवाल थे, एक ने पूछा, ‘जब हम मंगलवार (24 अप्रैल को) उनके (पुलिस के) पास गए, तब उन्होंने हमें क्यों नहीं बताया.’

एक दूसरे व्यक्ति ने पूछा, ‘आठ लोग, हर परिवार से एक लोग डीएनए टेस्ट के लिए गढ़चिरौली में हैं. पुलिस हमें सूची दिखा सकती थी ताकि हम उनकी पहचान कर पाते और अब तक अपने बच्चों का अंतिम संस्कार कर सकते थे. यह बयान किए जाने लायक क्रूरता है.’ कोई सूचना नहीं मिलने और घटनाक्रम के सामने आने के तरीके की वजह से चारों ओर निराशा का माहौल था.

24 अप्रैल को, गांव वाले गढ़चिरौली में पुलिस मुख्यालय गए और वहां उन्होंने लोगों के लापता होने की शिकायत दर्ज करायी . गांव वालों का दावा है कि पुलिस ने सारे ब्यौरे लिखे और परिवार के सदस्यों को अगले दिन वापस लौट जाने के लिए कहा. मगर तब तक पुलिस द्वारा नामों की सूची और तस्वीरें मीडिया को जारी कर दी गई थीं.

29 वर्षीय बिज्जा चुंडू मड़ावी कहते हैं, ‘सूची दिखाने की जगह वे हमें लेकर शवगृह गए और हम से शवों के बीच अपने बच्चों को पहचानने के लिए कहा. उन शवों को मोटे पॉलिथीन के थैलों में बांध कर रखा गया था और सिर्फ उनके चेहरे को खुला छोड़ा गया था.’

बिज्जा का दावा है कि शव ‘काफी गर्म कमरे’ में बिखरे हुए थे और बहुत खराब बदबू दे रहे थे. बिज्जा ने यह भी कहा कि उनके चेहरे पूरी तरह से बिगड़ गए थे और हम उनमें से किसी की भी पहचान नहीं कर पाए. मारे गए लोग क्या वास्तव में गांव के बच्चे हैं, इसकी पुष्टि करने के लिए परिवार वाले डीएनए टेस्ट का इंतजार कर रहे हैं.

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क्रेडिट: Ita Mehrotra

बिज्जा का 16 वर्षीय भाई मंगेश उस शाम रासू के साथ गांव से गए आठ लोगों में से था. नजदीक के एटापल्ली के भगवंत राव कला एवं विज्ञान महाविद्यालय में 11वीं क्लास का छात्र मंगेश कुछ दिन पहले ही घर वापस आया था.

बिज्जा ने बताया, ‘एक आवासीय कार्यक्रम था. 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद हमने उसे वहां उच्च शिक्षा के लिए भेजा था.’ बिज्जा ने अपने भाई के बारे में बताते हुए कहा, ‘वह पढ़ने में अच्छा है’, फिर उसने कुछ सोच कर सुधारते हुए कहा, ‘वह पढ़ने में अच्छा था.’

द वायर के गांव से लौटने के एक दिन बाद गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक अभिनव देशमुख की तरफ से इस बात की पुष्टि हुई कि गांव वालों ने एक शव की शिनाख्त कर ली है. हालांकि, वे मृतक के नाम की पुष्टि नहीं कर सके.

लेकिन उन्होंने बताया, ‘परिवार वाले गढ़चिरौली (पुलिस मुख्यालय आए थे) और आठ गुमशुदा लोगों में से एक की उन्होंने शिनाख्त की थी. परिवार वालों को 28 अप्रैल को शव दे दिया गया. हम डीएनए टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद ही दूसरी पहचानों के बारे में विश्वास के साथ कुछ कह सकेंगे.’

स्थानीय अखबारों में इस ‘एनकाउंटर’ की कई कहानियां सामने आयी हैं. इन सबका आधार समय-समय पर अलग-अलग पुलिस अधिकारियों द्वारा दिए गए बयान हैं. पहले-पहल आठ को ‘खतरनाक सशस्त्र विद्रोही’ करार दिया गया था. उनकी आयु, नाम, गांव आदि का खुलासा नहीं किया गया था.

लेकिन, एक बार जब परिवार वाले पुलिस के पास गए, तो दूसरी ही कहानी पेश कर दी गयी. पुलिस ने दावा किया कि ये आठ युवा नई भर्तियों का हिस्सा थे, जो पहली बार ‘अपने कमांडर से मिलने के लिए’ गांव आए थे.

चूंकि, परमेल्ली दलाम का कथित कमांडर साईनाथ, उर्फ डोलेश माढ़ी अताराम (32) (पुलिस के मुताबिक जिन्हें हाल ही में डिविजनल कमेटी मेंबर के तौर पर पदोन्नति दी गई थी) भी गुट्टेपल्ली गांव से था, इसलिए इस कहानी को लोगों ने आसानी से स्वीकार कर लिया और स्थानीय भाषा व अंग्रेजी मीडिया ने भी पुलिस की कहानी को प्रकाशित कर दिया.

गांववालों का कहना है कि अगर कोई नक्सली संगठनों में शामिल होने की तैयारी कर रहा होता है, तो उन्हें इस बात की जानकारी पहले से हो जाती है. एक बूढ़े व्यक्ति का कहना है, ‘जब साईनाथ ने 10-15 साल पहले घर छोड़ा था, तब हमें पता था कि वह कभी घर नहीं लौटने वाला है. अगर ये बच्चे विद्रोहियों में शामिल होने वाले थे, तो वे एक साथ समूह में जाने का खतरा कभी मोल नहीं लेते.’

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक साईनाथ 2004 में विद्रोहियों में शामिल हुआ था और उस पर हत्या और अपहरण समेत 75 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे. पुलिस का दावा है कि उसके सिर पर 16 लाख का इनाम था.

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पुलिस केे अनुसार, इंद्रावती नदी के किनारे जुटे 34 सशस्त्र विद्रोहियों को कथित मुठभेड़ में मार गिराया गया. (फोटो: सुकन्या शांता/द वायर)

इस रिपोर्टर ने जिन परिवार वालों से बात की, उन्होंने दावा किया कि ये युवा अपने साथ बैग लेकर भी गए थे, जिनमें उनके तैयार होने की चीजें थीं. उन्होंने यह भी दावा किया कि इनमें से कोई भी इससे पहले कभी लापता नहीं हुआ था. यानी कभी कोई ऐसी चीज नहीं हुई थी, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वे कभी नक्सलियों के संपर्क में आए थे और किसी भी रूप में विद्रोह में शरीक हुए थे.

नक्सल प्रभावित इलाकों के आदिवासियों के लिए अपनी ‘वैध पहचान’ स्थापित करने का एकमात्र तरीका ज्यादा से ज्यादा प्रभावी कानूनी दस्तावेज जमा करके अपने पास रखना है. यहां के आदिवासी अपने आधार कार्ड और वोटिंग कार्ड जैसे दस्तावेज को काफी संभाल कर रखते हैं. चूंकि लापता होने वालों में से ज्यादातर अभी अवयस्क ही थे, इसलिए उनके पास मौजूद एकमात्र आधिकारिक दस्तावेज उनका आधार ही था. मंगेश जैसे कुछेक के पास कॉलेज का परिचय पत्र था.

गांव वालों के मुताबिक, पुलिस वाले सारे आधार कार्ड लेकर चले गए, यह कहते हुए कि आगे की जांच के लिए इसकी जरूरत है. इसने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका को जन्म दिया है. ‘अब हमारे पास पुलिस द्वारा किए जाने वाले किसी भी दावे का जवाब देने के लिए कोई दस्तावेज नहीं है.’

गढ़चिरौली के पुलिस अधीक्षक देशमुख ने दावा किया कि मारा गया नक्सली नेता साईनाथ इन बच्चों के संपर्क में था. देशमुख ने द वायर को बताया, ‘हमारी प्राथमिक जांच में पता चला है कि ये युवा साईनाथ के संपर्क में थे. वह गांव जाया करता था और उनसे मिला करता था. हो सकता है कि साईनाथ भी उनके साथ एनकाउंटर स्थल तक गया हो.’

नागोती अब गांव वालों के साथ इन हत्याओं की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘वे नक्सली गतिविधि में शामिल हों या न हों, लेकिन ठंडे दिमाग से की गयी युवाओं की हत्या को उचित नहीं ठहराया जा सकता है. उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को हमसे छीन लिया है. केवल पक्षपात रहित, स्वतंत्र जांच से ही मृतकों के परिवार वालों को न्याय मिल सकता है.’

इतने सारे बच्चों को गंवा देने के कारण इस छोटे और दूरस्थ गांव में मातम पसरा हुआ है, जिसे सरकारी उदासीनता और अधिकारियों की तरफ से संवाद की कमी ने और गहरा बना दिया है. लेकिन सबसे खराब है वह आधिकारिक कहानी जिसे मीडिया द्वारा बताया और फैलाया जा रहा है, जिसने इनके बच्चों को अपराधी घोषित कर दिया है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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