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निर्भया कोष से केवल 5 से 10 फीसद पीड़ितों को ही मुआवज़ा मिला: नालसा

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के निदेशक ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह चौंकाने वाला है कि आंध्र प्रदेश में 2017 में यौन हिंसा के 901 मामले दर्ज हुए परंतु सिर्फ एक ही पीड़ित को मुआवज़ा मिल सका.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फोटो: रायटर्स)

भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फोटो: रायटर्स)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय को मंगलवार को चौंकाने वाली जानकारी देते हुए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण ने बताया कि विभिन्न राज्यों में यौन हिंसा के सिर्फ पांच से दस फीसद पीड़ितों को ही संबंधित योजनाओं के तहत मुआवजा मिल रहा है.

न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) ने यह जानकारी दी. प्राधिकरण ने बताया कि आंध्र प्रदेश के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले साल यौन हिंसा के दर्ज 901 मामलों में से सिर्फ एक ही पीड़ित को मुआवजा मिला है.

नालसा के निदेशक एसएस राठी ने पीठ से कहा, ‘राज्यों में इस्तेमाल नहीं किए गए धन के बारे में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के आंकड़े संकलित हो गए हैं. यौन हिंसा के पीड़ितों में से बमुश्किल पांच से दस फीसदी ही मुआवजा प्राप्त कर सके हैं. यह चौंकाने वाला है कि आंध्र प्रदेश में 2017 में ऐसे 901 मामले दर्ज हुए परंतु सिर्फ एक ही पीड़ित को मुआवजा मिल सका. अधिकतम दस फीसद पीड़ितों को ही मुआवजा मिला है.’

नालसा के अनुसार, 2016 में आंध्र प्रदेश में इस तरह के 840 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ आठ पीड़ितों को ही मुआवजा मिला. इसी तरह, पॉक्सो क़ानून के तहत 2017 में 1028 मामले दर्ज हुए लेकिन सिर्फ 11 पीड़ितों को ही मुआवजा मिला.

प्राधिकरण ने कहा कि आंकड़ों से पता चलता है कि राजस्थान में 2017 में 3305 प्राथमिकी दर्ज हुईं और इन योजनाओं के अंतर्गत 140 पीड़ितों को मुआवजा मिला जबकि बिहार में यौन हिंसा के आरोपों में 1199 प्राथमिकी दर्ज हुईं लेकिन सिर्फ 82 पीड़ितों को ही मुआवजा मिल सका.

राठी ने कहा कि इस संबंध में सारे आंकड़े शीघ्र ही न्यायालय में पेश किए जाएंगे. इस मामले की सुनवाई के दौरान न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए नालसा की प्रस्तावित ‘पीड़ित मुआवजा योजना’ का जिक्र किया और कहा कि वे इसमें दो महत्वपूर्ण बिंदु जोड़ना चाहती हैं.

जयसिंह ने कहा कि पुलिस को अनिवार्य रूप से राज्य सरकार के विधिक सेवा प्राधिकरण को यौन हिंसा से संबंधित प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बारे में जानकारी देनी चाहिए ताकि पीड़ित को मुआवजा देने की प्रक्रिया तेज की जा सके.

उन्होंने कहा कि दिल्ली की भांति ही राज्यों में विधिक सेवा प्राधिकरण को स्वत: ही पीड़ितों को मुआवजा देने का अधिकार दिया जाना चाहिए. पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा कि वह दस मई को यौन हिंसा पीड़ितों और इसमें जीवित बचने वालों को मुआवजा देने की योजना के बारे में निर्देश देगी.

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा 228 (ए) से संबंधित मुद्दों पर जुलाई में विचार करेगी. ये धारा यौन हिंसा की घटना की पीड़ित की पहचान का खुलासा करने और राज्यों द्वारा निर्भया कोष के इस्तेमाल के बारे में है.

केंद्र ने दिसंबर, 2012 में राजधानी में एक युवती से सामूहिक बलात्कार और हत्या की सनसनीखेज वारदात के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा की पहल को समर्थन देने के लिए 2013 में निर्भया कोष बनाने की घोषणा की थी.

शीर्ष अदालत ने इससे पहले टिप्पणी की थी कि यदि निर्भया कोष के धन का महिलाओं के कल्याण के लिए सही तरीके से खर्च नहीं किया गया तो कुछ भी नहीं हो सकेगा. न्यायालय ने कहा था कि इस योजना के तहत धन की कमी नहीं है लेकिन इसके सही तरीके से इस्तेमाल का मुद्दा है.

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