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प्रधानमंत्री मोदी का जयपुर में यह कैसा जनसंवाद? हाड़ौती के किसानों का प्रवेश निषेध

शनिवार को होने वाले ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी जनसंवाद’ में उपज का सही दाम नहीं मिलने की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हाड़ौती संभाग के किसानों को अपनी मन की बात कहने का मौका नहीं मिलेगा.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया. (फोटो साभार: vasundhararaje.in)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को जयपुर में सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने वालों से संवाद करेंगे, लेकिन इस कार्यक्रम में उपज का सही दाम नहीं मिलने की वजह से आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हाड़ौती संभाग के किसान शिरकत नहीं कर पाएंगे.

राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने इस डर के चलते हाड़ौती संभाग के किसानों का प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में ‘प्रवेश निषेध’ कर दिया है कि कहीं ये मोदी के सामने अपने मन की बात न कह दें. यदि किसानों ने अपनी पीड़ा का इजहार कर दिया तो राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की किरकिरी तो होगी ही, भाजपा के किसान हितैषी होने के दावे की भी पोल खुल जाएगी.

दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी का शनिवार को जयपुर में केंद्र व राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही 12 योजनाओं के लाभार्थियों से रूबरू होने का कार्यक्रम है. सरकार का दावा है कि इन योजनाओं से प्रदेश में लाखों लोगों को लाभ पहुंचा है, जिनमें से लगभग ढाई लाख जयपुर आएंगे. हालांकि इतनी संख्या में लोगों को कार्यक्रम में लाने के लिए सरकार को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. पूरा प्रशासन कई दिनों से भीड़ का इंतजाम करने में जुटा है.

वसुंधरा सरकार के लिए ज्यादा से ज्यादा लाभार्थियों को जयपुर लाने की चुनौती तो है ही, उसे यह डर भी सता रहा है कि इनमें से कोई योजनाओं के बारे में मोदी की मंशा के उलट टिप्पणी न कर दे.

इससे बचने के लिए उन्हीं लोगों का छांटकर जयपुर बुलाया जा रहा है, जिनकी आस्था भाजपा में है. ‘द वायर’ में 4 जुलाई को प्रकाशित रिपोर्ट में विस्तार से बताया है कि राज्य सरकार पर प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में हंगामे का डर किस हद तक हावी है.

छंटनी के बंदिश लगाने पर शीर्ष अधिकारियों ने यह आशंका जाहिर की थी कि इससे भीड़ की कमी से जूझना पड़ सकता है. इससे बचने के लिए सरकार ने राजस्थान फसली ऋण माफी योजना से लाभान्वित किसानों को कार्यक्रम में बुलाने की तरकीब निकाली. मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने 23 जून को सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया कि वे कर्जमाफी का लाभ लेने वाले किसानों को कार्यक्रम में भेजें.

सूत्रों के अनुसार कोटा कलेक्टर गौरव गोयल ने इसी दिन बताया था कि उपज का सही दाम मिलने की वजह से नाराज चल रहे क्षेत्र के किसानों को कार्यक्रम में बुलाना खतरे से खाली नहीं है. लेकिन मुख्य सचिव ने न सिर्फ उन्हें अनसुना किया, बल्कि यह उनके साथ बारां, झालावाड़ व बूंदी कलेक्टरों को यह नसीहत दे डाली कि किसानों को उनकी बेहतरी के लिए उठाए गए कदमों के बादे में बताकर तैयार किया जा सकता है.

इसी पालना में हाड़ौती संभाग के चारों कलेक्टरों ने सहकारी बैंकों से कर्ज माफी के दायरे में आने वाले किसानों की सूची मंगवाई. जब प्रशासन ने इनसे संपर्क करना शुरू किया तो कोटा कलेक्टर की आशंका सही साबित हुई. ज्यादातर किसानों ने लहसुन और चने की सरकारी स्तर पर हुई खरीद की गड़बड़ियों पर अपनी नाराजगी जाहिर की.

जब यह सूचना सरकार के पास पहुंची तो आनन-फानन में यह निर्णय लिया गया कि राजस्थान फसली ऋण माफी योजना के तहत हाड़ौती संभाग के जिन किसानों के कर्ज माफ हुए हैं उन्हें कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाएगा. यानी इन किसानों को प्रधानमंत्री के सामने अपनी पीड़ा रखने का मौका नहीं मिलेगा.

गौरतलब है कि सूखा और अकाल की पहचान रखने वाले राजस्थान का हाड़ौती संभाग खेती के नजरिये से प्रदेश का सबसे उन्नत क्षेत्र है. उपजाऊ जमीन और सिंचाई की समुचित व्यवस्था की वजह से यहां भरपूर उपज होती है. इस बार भी उत्पादन तो अच्छा हुआ, लेकिन उसका दाम बहुत कम मिला.

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कार्यक्रम स्थल का जायजा लेती मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे. (फोटो: अवधेश आकोदिया/द वायर)

सबसे ज्यादा परेशानी लहसुन और चना उत्पादक किसानों को हुई. ‘द वायर’ में 9 मई को प्रकाशित रिपोर्ट में सिलसिलेवार तरीके से इसका जिक्र है कि कैसे हमारे खाने का स्वाद बढ़ाने वाला लहसुन किसानों की सेहत बिगाड़ रहा है.

गौरतलब है कि समूचे हाड़ौती संभाग में इस बार लहसुन की बंपर पैदावार हुई, लेकिन बाजार में इसका भाव 2 रुपये प्रति किलो से भी नीचे चला गया. हालांकि सरकार ने किसानों को राहत देने के नाम पर बाजार हस्तक्षेप योजना के अंतर्गत 32.57 रुपये प्रति किलो की दर से लहसुन की खरीद करने की घोषणा तो की, लेकिन इसकी शर्तें बेहद कड़ी कर दीं. वहीं, खरीद केंद्रों पर हुई गड़बड़ियों ने कोढ़ में खाज का काम किया.

सरकार की ओर से तिथि दो बार आगे बढ़ाने के बाद भी चुनिंदा किसान ही अपना लहसुन सरकारी केंद्रों पर बेच पाए. ज्यादातर किसानों को औने-पौने दामों पर ही उपज बेचनी पड़ी. यह घाटा क्षेत्र के कई किसानों के लिए जानलेवा साबित हुआ.

जानकारी के अनुसार कुल 7 लहसुन उत्पादक किसानों की आत्महत्या की जबकि दो सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए.

हाड़ौती संभाग के चना उत्पादक किसानों की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है. सरकार ने 44 रुपये किलो की दर तो चना खरीदने का ऐलान तो कर दिया, लेकिन खरीद केंद्रों पर व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं कीं.

आलम यह रहा कि पंजीकरण करवाने वाले आधे किसान भी अपनी उपज नहीं बेच पाए. किसानों के कई बार प्रदर्शन करने के बाद भी हालात नहीं सुधरे.
यदि ये किसान प्रधानमंत्री के जनसंवाद कार्यक्रम में शिरकत करने जयपुर जाते तो शायद अपना दुखड़ा उनके सामने रख पाते, लेकिन वसुंधरा सरकार ने रंग में भंग पड़ने के डर से उनका प्रवेश वर्जित कर दिया है.

किसान नेता दशरथ कुमार सरकार के इस फैसले से खफा हैं. वे कहते हैं, ‘यह लगातार दूसरा मौका है जब हाड़ौती संभाग के किसानों को प्रधानमंत्री के सामने अपनी मन की बात करने से रोका गया है. इससे पहले 20 जून को जब मोदी ने नमो एप के जरिये देश के किसानों से संवाद किया था तब प्रशासन ने तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर हाड़ौती के किसानों को प्रधानमंत्री से रूबरू नहीं होने दिया.’

‘द वायर’ ने 20 जून की घटना की पड़ताल की तो सामने आया कि स्थानीय प्रशासन ने किसानों की भीड़ इकट्ठी करने के लिए यह प्रचारित किया कि प्रधानमंत्री लहसुन और चना उत्पादक किसानों की समस्याओं पर सीधी बात करेंगे. यह सुनकर काफी किसान कोटा स्थित कॉमन सर्विस सेंटर पहुंचे, लेकिन एक भी किसान को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला.

प्रधानमंत्री ने शुरुआत में सरकार की ओर से किसान कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी दी और फिर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश के चुनिंदा किसानों से सीधा संवाद किया. राजस्थान की बारी आई तो मोदी कोटा के बजाय जोधपुर सेंटर से जुड़ गए और कार्यक्रम खत्म हो गया.

जब किसानों ने इस पर गुस्सा जाहिर किया तो अधिकारियों ने उन्हें बताया कि बीएसएनएल के नेटवर्क में समस्या आने की वजह से कोटा सेंटर प्रधानमंत्री से नहीं जुड़ पाया. उनकी यह झूठ तब पकड़ में आई जब बीएसएनएल के अधिकारियों ने यह साफ किया कि उनकी ओर से नेटवर्क की कोई समस्या नहीं थी. जानबूझकर कोटा सेंटर को नहीं जोड़ा गया.

इस कार्यक्रम में मौजूद किसान गुमानी नागर बताते हैं, ‘प्रशासन ने यह कहकर हमें बुलाया था कि प्रधानमंत्री हमारी समस्याओं का समाधान करेंगे. मैं कामकाज छोड़कर कोटा गया, लेकिन वहां नंबर ही नहीं आया. जब सरकार को हमारी तकलीफ सुननी ही नहीं है कि तो हमें उम्मीद क्यों जगाई जाती है. यह अच्छा है कि जयपुर में हमें बुलाया ही नहीं जा रहा.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.)

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