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झारखंडः अनाज वितरण में डीबीटी हुआ फेल, सरकार ने वापस लिया

झारखंड में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की व्यवस्था फेल होने के बाद राज्य सरकार ने इसे वापस ले लिया है. पिछले साल अक्टूबर में रांची के नगड़ी ब्लॉक में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया गया था.

पिछले साल चार अक्टूबर को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने डीबीटी का शुभारंभ किया था. (फाइल फोटो: नीरज सिन्हा)

पिछले साल चार अक्टूबर को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने डीबीटी का शुभारंभ किया था. (फाइल फोटो: नीरज सिन्हा)

रांची: तमाम आलोचना और जमीनी स्तर पर विरोध-आंदोलन के बीच झारखंड में सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) या प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना समाप्त कर दी गई है. इस बाबत राज्य सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग ने पत्र भी जारी कर दिया है. इस पत्र के हवाले बताया गया है कि केंद्र सरकार ने भी इस प्रस्ताव पर सहमति प्रदान कर दी है.

अब लाभुक एक रुपये किलो की दर से सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों से अनाज ले सकेंगे. डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के तहत खाद्य सुरक्षा कानून से जुड़े लाभान्वितों के खाते में अनाज के पैसे भेजे जाने का प्रावधान किया गया था, ताकि उस पैसे को निकालकर लाभुक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानदार से अनाज हासिल कर सकें.

लेकिन योजना लागू किए जाने के साथ ही एक के बाद एक कई खामियां उभरती गई और गरीब-बेबस परिवार अनाज के लिए तरसते रहे.

गौरतलब है कि पिछले साल 4 अक्टूबर को सरकार ने रांची के नगड़ी प्रखंड में इस योजना को लागू किया था. तब इसे डिजिटल व न्यू इंडिया की एक खास कड़ी के तौर पर पेश किया गया था और राज्य के मुख्यमंत्री रघुबर दास खुद योजना का उद्घाटन करने नगड़ी पहुंचे थे.

तब सरकार ने दावा किया था कि इस सिस्टम से गरीबों को अनाज उपलब्ध कराने में सहूलियत के साथ पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन दावे के उलट सिस्टम ने ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी थी.

योजना के लागू होने के कुछ ही दिनों बाद भोजन के अधिकार से जुड़े लोग तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण का काम शुरू किया. इसी साल 26 अक्तूबर को ‘डीबीटी हटाओ-राशन बचाओ’ नारे के साथ मुख्यमंत्री आवास तक सामूहिक पदयात्रा निकाली गई थी.

भोजन के अधिकार तथा सोशल ऑडिट से जुड़े जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता तथा अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने गांवों में आदिवासियों तथा गरीबों की परेशानियों पर तैयार की गई सर्वेक्षण रिपोर्ट को लेकर राज्य सरकार के मंत्री सरयू राय से मिलकर उत्पन्न हालात पर जानकारी दी थी. साथ ही इस योजना को समाप्त करने का अनुरोध किया था.

इससे पहले ज्यां द्रेज इस इलाके में लगातार बैठकें करते रहे. हालांकि शुरुआती दिनों में सरकार यह दावा करती रही कि थोड़ी-बहुत जो कमियां और खामियां हैं उन्हें जल्दी ही ठीक कर लिया जाएगा. अधिकारी भी आम लोगों को आश्वस्त करते रहे कि जल्दी ही व्यवस्था ठीक होगी. साथ ही आंकड़ों की बाजीगरी भी होने लगी. लेकिन वक्त के साथ ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ती रही. तब केंद्र सरकार के पास इसे वापस लेने का प्रस्ताव भेजा गया.

सरकार के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ज्यां द्रेज कहते हैं कि लगभग 97 प्रतिशत लोगों को डीबीटी से नाराजगी थी. महीनों के विरोध के बाद आम लोगों की आवाज सुनी गई. हताशा-निराशा के स्वर के बीच इस योजना को समाप्त करने में इतनी देर नहीं होनी चाहिए थी. तमाम जानकारी मिलने के बाद भी फैसला लेने में चार महीने का वक्त लगा.

वो आगे कहते हैं, लेकिन इसे छोटी जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि अनाज के लिए आधार कार्ड के लिंकेज और बॉयोमीट्रिक्स सिस्टम के अनिवार्य किए जाने से भी खाद्य सुरक्षा बाधित होती रही है. और इन मुश्किलों के खिलाफ आवाजें उठाई जाती रही है.

भोजन के अधिकार से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता धीरज कुमार कहते हैं कि अधिकारी ग्रासरूट पर जाने के बजाय टेबल वर्क पर ज्यादा जोर देते रहे हैं और सरकार के किसी फैसले के बारे में जमीनी रिपोर्ट देने से कतराते हैं. डीबीटी इसका प्रमाण है. नगड़ी में इसे लागू करने से पहले लोगों के साथ रायशुमारी कर योजना की बारीकियों से अवगत कराया जाना चाहिए था.

धीरज आगे कहते हैं कि वैसे भी झारखंड में भूख से होती मौतों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

गौरतलब है कि हाल ही में मांडू के एक गांव में आदिम जनजाति के राजेंद्र बिरहोर की भूख से कथित मौत होने के बाद यह मामला सामने आया है कि उसके पास राशन कार्ड नहीं था. इसलिए उसे अनाज नहीं मिलता था. जबकि राज्य में खाद्य सुरक्षा कानून लागू है.

माकपा के प्रखंड अध्यक्ष सुभाष मुंडा कहते हैं कि यह तो होना ही था. क्योंकि डिजिटल इंडिया के इस कार्यक्रम में न डायरेक्ट था और न ही बेनिफिट. अनाज के लिए लोग बैंक, प्रज्ञा केंद्र से लेकर राशन दुकानदार के दरवाजे पर लगातार चक्कर लगाते रहे.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं.)

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